भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2233, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2233

216 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/44-53 ] उसका आदर करते हुए इस श्लोकमें उनके चिरदास्यकी प्रार्थना कर रहे हैं,- याः (गोप्यः) [कृष्णभजनाय] स्वजनं (पतिपुत्रादीन् आत्मीयान्) दुस्त्यजं (दुष्परिहरम्) आर्यपथम् (आर्याणां मार्गं धर्मं पातिव्रत्यमिति यावत्) च हित्वा (परित्यज्य) श्रुतिभिः (वेदैः) विमृग्याम् (अन्वेष्टव्याम् उपास्यां) मुकुन्दपदवीं (कृष्णसरणीं) भेजुः (अन्वगच्छन्), अहो (भाग्यवर्णने) वृन्दावने (अस्मिन् व्रजे) आसां (तासां) चरणरेणुजुषां (पदररेणुभाजां) गुल्मलताौषधीनां (गुल्मादीनां मध्ये यत्) किमपि अहं स्यां (भवेयमित्याशंसा)। अर्थात् “जिन्होंने अति कठिनाईसे त्यागे जानेवाले पति-पुत्रादि निजजन और आर्यपथका परित्याग करके वेदोंके द्वारा खोजे जा रहे मुकुन्दके चरणकमलोंका भजन किया है, इस वृन्दावनमें स्थित समस्त गुल्म, लता और औषधियाँ उन गोपियोंकी चरणरेणुकी सेवामें नियुक्त हैं, अहो! मैं (महासौभाग्यशाली होकर) उनमेंसे कोई एक बन सकूँ॥”44-45॥ (6) महाभागवत आचार्य ठाकुर श्रीहरिदासकी गुणावली :- हरिदास ठाकुर-महाभागवत-प्रधान। प्रतिदिन लय तैं ह तिनलक्ष नाम ॥ 46 ॥ नामेर महिमा आमि ताँर ठाञि शिखिलुँ। ताँर प्रसादे नामेर महिमा जानिलुँ ॥ 47 ॥ अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुर महाभागवतोंमें प्रधान हैं, वे प्रतिदिन तीन लाख नाम ग्रहण करते हैं। मैंने उनसे ही नामकी महिमाको सीखा है और उनकी कृपासे ही मैंने नामकी महिमाको जाना है॥ 46-47॥ अन्यान्य नाम-प्रेम-प्रचारक गौरभक्तगण :- आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, पण्डित-गदाधर। जगदानन्द, दामोदर, शङ्कर, वक्रेश्वर ॥ 48 ॥ काशीश्वर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि। आर यत भक्तगण गौड़े अवतरि' ॥ 49 ॥ शुद्धभक्तिका आचार और प्रचार करनेवाले साधुओंके सङ्गसे ही जीवको कृष्णभक्तिकी प्राप्ति :- कृष्ण-नाम-प्रेम कैला जगते प्रचार। इँहा सबार सङ्गे कृष्णभक्ति ये आमार ॥ ”50 ॥ अनुवाद-आचार्यरत्न (श्रीचन्द्रशेखर), आचार्यनिधि (पुण्डरीक विद्यानिधि), गदाधर पण्डित, जगदानन्द पण्डित, दामोदर पण्डित, शङ्कर पण्डित, वक्रेश्वर पण्डित, काशीश्वर पण्डित, मुकुन्द दत्त, वासुदेव दत्त और मुरारि गुप्त आदि जो सब भक्त गौड़देशमें अवतरित हुए हैं, उन्होंने ही जगत्में कृष्णनामके द्वारा कृष्णप्रेमका प्रचार किया है। इन सबके सङ्गसे ही मुझमें कृष्णभक्ति उत्पन्न हुई है॥”48-50॥ श्रीवल्लभके गर्वका हरण करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा उनकी अपेक्षा अधिक गुण-सम्पन्न भक्तोंके गुणोंका वर्णन :- भट्टेर् हृदये दृढ़ अभिमान जानि'। भङ्गी करि' महाप्रभु कहे एत वाणी ॥ 51 ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें दृढ़ अभिमानको जानते थे, इसलिये उसे इङ्गित करते हुए उन्होंने यह सब कहा॥ 51 ॥ अधोक्षजके विषयमें अक्षज-ज्ञानी श्रीवल्लभकी प्राकृत अहङ्कार-चेष्टा; भागवतके आनुगत्यको त्यागकर श्रीवल्लभके द्वारा भागवतकी टीकाकी रचना :- “आमि से ‘वैष्णव',-भक्तिसिद्धान्त सब जानि। आमि से भागवत-अर्थ उत्तम बाखानि ॥”52 ॥ महाप्रभुकी कृपासे श्रीवल्लभका अहङ्कार-चूर्ण :- भट्टेर् मनेते एइ छिल दीर्घ गर्व। प्रभुर वचन शुनि' से हइल खर्व ॥ 53 ॥ अनुवाद-“मैं उन्नत वैष्णव हूँ, मैं समस्त भक्तिसिद्धान्तोंको जानता हूँ, मैं भागवतके अर्थोंको