श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 7/52-62 सातवाँ अध्याय 217 भली-भाँति जानकर उत्तमरूपसे व्याख्या करता हूँ”—श्रीवल्लभ भट्टके मनमें यह बहुत बड़ा गर्व था, किन्तु महाप्रभुके वचनोंको सुनकर वह खण्डित हो गया ॥ 52-53 ॥ अनुभाष्य—‘दीर्घ गर्व’,–अति पुष्ट, अति उच्च अभिमान ॥ 53 ॥ महाप्रभुके मुखसे सुने गौरभक्त वैष्णवोंके दर्शनकी इच्छा :— प्रभुर मुखे वैष्णवता शुनिया सबार। भट्टेर इच्छा हैल सबारे देखिबार॥ 54॥ अनुवाद—महाप्रभुके मुखसे सब भक्तोंकी वैष्णवताके विषयमें सुनकर श्रीवल्लभ भट्टके मनमें उन सबके दर्शनकी इच्छा जाग्रत हुई॥ 54॥ भट्ट कहे,—“ए सब वैष्णव रहे कोन् स्थाने? कोन् प्रकारे पाइमु इँहा-सबार दर्शने??”55॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“ये सब वैष्णव कहाँ रहते हैं? किस प्रकार मुझे इन सबके दर्शन प्राप्त होंगे?” 55॥ महाप्रभुके द्वारा उनके अवस्थानका वर्णन :— प्रभु कहे,—“केह गौड़े, केह देशान्तरे। सब आसियाछे रथयात्रा देखिबारे॥ 56॥ श्रीभट्टको भक्तोंके दर्शनके लिये प्रतीक्षाके लिये आश्वासन देना :— इँहाइ रहेन सबे, वासा—नाना—स्थाने। इँहाइ पाइबा तुमि सबार दर्शने॥”57॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“कुछ तो गौड़देशमें और कुछ अन्य स्थानोंपर रहते हैं, किन्तु अभी सभी रथयात्राके दर्शनके लिये श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये हुए हैं। सभी भक्त यहाँपर ही भिन्न-भिन्न स्थानोंपर रह रहे हैं। आपको यहींपर सभी भक्तोंके दर्शन प्राप्त होंगे॥” 56-57॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— तबे भट्ट कहे बहु विनय वचन। बहु यत्न करि’ प्रभुरे कैल निमन्त्रण॥ 58॥ अनुवाद—तब श्रीवल्लभभट्टने बहुत विनीत वचन कहे और बहुत आग्रह करके महाप्रभुको निमन्त्रित किया॥ 58॥ महाप्रभुके निकट भक्तोंका आगमन और श्रीभट्टके साथ मिलन :— आर दिन सब वैष्णव प्रभुस्थाने आइला। सबा—सने महाप्रभु भट्टे मिलाइला॥ 59॥ अनुवाद—अगले दिन जब सब भक्त महाप्रभुके स्थानपर आये, तब महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टको उन सबसे मिलवाया॥ 59॥ दीप्त सूर्यके आगे निस्तेज जुगनूकी भाँति गौरभक्तोंके सामने श्रीवल्लभभट्ट :— ‘वैष्णवेर’ तेज देखि’ भट्टेर चमत्कार। ताँ—सबार आगे भट्ट—खद्योत—आकार॥ 60॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट वैष्णवोंके तेजको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उन सबके आगे श्रीवल्लभ भट्ट जुगनूकी भाँति प्रतीत होने लगे॥ 60॥ श्रीभट्टके द्वारा सपरिकर महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :— तबे भट्ट बहु महाप्रसाद आनाइल। गण—सह महाप्रभुरे भोजन कराइल॥ 61॥ अनुवाद—तब श्रीवल्लभ भट्टने श्रीजगन्नाथ मन्दिरसे बहुत-सा महाप्रसाद मँगवाया और महाप्रभुको उनके भक्तों सहित भोजन करवाया॥ 61॥ श्रीपरमानन्दपुरीके सङ्गमें संन्यासी-भक्तोंका एक पंक्तिमें बैठना :— परमानन्द पुरी—सङ्गे संन्यासीर गण। एकदिके कैसे सब करिते भोजन॥ 62॥