भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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218 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/62-72 ]

[बायाँ स्तम्भ] अनुवाद—एक ओर श्रीपरमानन्दपुरीके साथ बहुतसे संन्यासी भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६२ ॥ महाप्रभुके दोनों ओर दो प्रभु :— अद्वैत, नित्यानन्द-राय—पार्श्वे दुइजन। मध्ये महाप्रभु बसिला, आगे-पाछे भक्तगण ॥ ६३ ॥ अनुवाद—महाप्रभु भक्तोंके बीचमें बैठे, महाप्रभुके दोनों ओर श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द प्रभु बैठे और उनके आगे-पीछे अन्यान्य समस्त भक्त बैठ गये ॥ ६३ ॥ गौड़ीय भक्तोंका श्रेणीबद्धरूपमें बैठना :— गौड़ेर भक्त यत कहिते ना पारि। अङ्गने बसिला सब हञा सारि सारि ॥ ६४ ॥ अनुवाद—श्रीगौड़देशके कितने भक्त थे, इस विषयमें मैं (ग्रन्थकार) कह नहीं सकता, वे सभी आङ्गनमें पंक्ति बनाकर बैठ गये ॥ ६४ ॥ गौरभक्तोंको देखकर श्रीभट्टके द्वारा प्रणाम :— प्रभुर भक्तगण देखि' भट्टेर चमत्कार। प्रत्यक्षे सबार पदे कैल नमस्कार ॥ ६५ ॥ अनुवाद—महाप्रभुके भक्तोंको देखकर श्रीवल्लभ भट्ट आश्चर्यचकित रह गये, उन्होंने प्रत्यक्ष रूपसे सभीके चरणोंमें नमस्कार किया ॥ ६५ ॥ छह भक्तोंके द्वारा प्रसाद वितरण :— स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर। परिवेशना करे, आर राघव, दामोदर ॥ ६६ ॥ अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीकाशीश्वर पण्डित, श्रीशङ्कर पण्डित, श्रीराघव पण्डित और श्रीदामोदर पण्डित—ये प्रसाद परोस रहे थे ॥ ६६ ॥ श्रीवल्लभ-भट्टके द्वारा भक्तों सहित महाप्रभुको प्रसादके द्वारा सन्तुष्ट करना :— महाप्रसाद वल्लभ-भट्ट बहु आनाइल। प्रभु-सह संन्यासिगण भोजने बसिल ॥ ६७ ॥

[दायाँ स्तम्भ] अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने बहुत अधिक मात्रामें महाप्रसाद मँगवाया था। सभी संन्यासी महाप्रभुके साथ भोजन करनेके लिये बैठे ॥ ६७ ॥ सभीके द्वारा एकसाथ हरिध्वनि :— प्रसाद पाय वैष्णवगण बोले, 'हरि' 'हरि'। हरिध्वनि उठिल सब ब्रह्माण्ड भरि' ॥ ६८ ॥ अनुवाद—सभी वैष्णव प्रसाद ग्रहण करते समय 'हरि', 'हरि' बोल रहे थे। उस हरिध्वनिसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भर गया ॥ ६८ ॥ आचमनके बाद सभीको अभिनन्दन :— माला, चन्दन, गुवाक, पान अनेक आनिल। सबा' पूजा करि' भट्ट आनन्दित हैल ॥ ६९ ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बहुत-सी माला, चन्दन, सुपारी और पान लेकर आये। ये सब सामग्री सभीको भेंट करके उनकी पूजा करके श्रीवल्लभ भट्ट बहुत आनन्दित हुए ॥ ६९ ॥ रथयात्राके समय सात मण्डलियोंके कीर्तनका वर्णन :— रथयात्रादिने प्रभु कीर्त्तन आरम्भिला। पूर्ववत् सातसम्प्रदाय पृथक् करिला ॥ ७० ॥ अनुवाद—रथयात्राके दिन महाप्रभुने कीर्तन आरम्भ किया। पूर्व वर्षोंकी भाँति उन्होंने सात पृथक् मण्डलियाँ बनायीं ॥ ७० ॥ सात मण्डलियोंमें सात कीर्तन करनेवाले :— अद्वैत, नित्यानन्द, हरिदास, वक्रेश्वर। श्रीवास, राघव, पण्डित-गदाधर ॥ ७१ ॥ अलातचक्रकी भाँति महाप्रभुके द्वारा कीर्तनमें भ्रमण :— सातजन सात ठाञि करेन नर्त्तन। 'हरिबोल' बलि' प्रभु करेन भ्रमण ॥ ७२ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीवक्रेश्वर पण्डित, श्रीवास पण्डित, श्रीराघव