श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2236, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/71-80 सातवाँ अध्याय 219 पण्डित और श्रीगदाधर पण्डित—ये सात भक्त पृथक्-पृथक् सात मण्डलियोंमें जाकर नृत्य करने लगे और महाप्रभु 'हरिबोल' बोलते हुए इन सात मण्डलियोंमें भ्रमण करने लगे॥ 71-72॥ चौदह मृदङ्ग :— चौद्द मादल बाजे उच्च सङ्कीर्त्तन। एक एक नर्त्तकेर प्रेमे भासिल भुवन ॥ 73 ॥ अनुवाद—चौदह मृदङ्ग बज रहे थे, उच्च स्वरमें हरिनाम सङ्कीर्त्तन हो रहा था, प्रत्येक मण्डलीमें एक-एक नर्तकके प्रेमसे सम्पूर्ण जगत् आप्लावित हो गया ॥ 73 ॥ श्रीवल्लभका विस्मय और परमानन्द :— देखि' वल्लभ-भट्टेरे हैल चमत्कार। आनन्दे विह्वल, नाहि आपन-साम्भाल ॥ 74 ॥ अनुवाद—यह सब देखकर श्रीवल्लभ भट्ट अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। वे आनन्दमें विह्वल होनेके कारण स्वयंको सम्भाल भी नहीं पा रहे थे ॥ 74 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'साम्भाल',—सम्भालना ॥ 74 ॥ नृत्य-कीर्त्तनके बाद महाप्रभुके प्रेम-वैभवको देखकर श्रीवल्लभको विस्मय :— तबे महाप्रभु सबार नृत्य राखिल। प्रभुर चरित्रे भट्टेर चमत्कार हैल ॥ 75 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभुने सभी भक्तोंसे नृत्यको विराम देनेके लिये कहा। महाप्रभुकी लीलाको देखकर श्रीवल्लभ भट्टके हृदयमें चमत्कार हुआ ॥ 75 ॥ महाप्रभुसे श्रीवल्लभका निवेदन :— यात्रान्तरे भट्ट याय महाप्रभु-स्थाने। प्रभु-चरणे किछु कैल निवेदने ॥ 76 ॥ अपने द्वारा पूर्नलिखित टीकाके श्रवणके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना :— “भागवतेर टीका किछु करियाछि लिखन। आपने महाप्रभु यदि करेन श्रवण ॥ ”77॥ अनुवाद—श्रीरथयात्राके समाप्त होनेके बाद एक दिन श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके वासस्थानपर गये और उन्होंने महाप्रभुके चरणकमलोंमें कुछ निवेदन किया,—“मैंने भागवतकी कुछ टीका लिखी है। हे महाप्रभु! आप कृपापूर्वक उसे श्रवण करें ॥ ”76-77 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'यात्रान्तरे',—अन्य यात्रामें, अन्य दिनमें ॥ 76 ॥ स्वयंको अनधिकारी मानकर महाप्रभुका दैन्य और छलपूर्ण उक्ति; कृष्ण-कार्ष्णके सुख-तात्पर्यके अतिरिक्त जड़विद्या और पाण्डित्यसे भागवतके अर्थ दुर्बोध्य :— प्रभु कहे,—“भागवतार्थ बुझिते ना पारि। भागवतार्थ शुनिते आमि नहि अधिकारी ॥ 78 ॥ थकानरहित निरन्तर शुद्धकृष्णनाम ग्रहण करनेमें निष्ठा और रुचिसे ही भागवत-पाठ श्रवण करनेकी सफलता, इन्द्रिय-तर्पण परायण जड़ीय विद्या और पाण्डित्यको प्रदर्शित करनेके उद्देश्यसे श्रवण-पठनादि वृथा समय व्ययमात्र :— बसि' कृष्णनाम मात्र करिये ग्रहणे। संख्या-नाम पूर्ण मोर नहे रात्रि-दिने ॥ ”79 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं भागवतके अर्थोंको समझ नहीं पाता। मैं भागवतके अर्थको सुननेका अधिकारी भी नहीं हूँ। मैं तो बैठकर केवल कृष्णनामका कीर्त्तन करता हूँ। दिन-रात नाम कीर्त्तन करनेपर भी मेरी नाम-संख्या पूर्ण नहीं होती ॥ ”78-79 ॥ श्रीवल्लभभट्टके द्वारा स्वरचित श्रीकृष्णनामकी व्याख्याके श्रवण हेतु महाप्रभुसे अनुरोध :— भट्ट कहे,—“कृष्णनामेर अर्थ-व्याख्याने। विस्तार करियाछि, ताहा करह श्रवणे ॥ ”80 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“मैंने कृष्णनामके अर्थकी व्याख्याका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उस व्याख्याको आप श्रवण कीजिये ॥ ”80 ॥