भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2237, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2237

220 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/81-86 ] अभिन्न-चिद्विलासी वाचक कृष्णनाम और स्व-सुखपरक जड़विद्या, बुद्धि या मेधाकी सहायतासे वाच्य गोकुलपति श्रीकृष्ण-विग्रह :- श्रीकृष्णनाम और श्रीकृष्ण-अभिन्न भागवत-व्याख्यादिमें प्रभु कहे,-'कृष्णनामेर बहु अर्थ ना मानि। श्रीकृष्णसुखके अभावको जानकर महाप्रभुकी घृणा :- 'श्यामसुन्दर' 'यशोदानन्दन', -एइमात्र जानि ॥ 81 ॥ फल्गुप्राय भट्टेर नामादि सब व्याख्या। सर्वज्ञ प्रभु जानि' तारे करेन उपेक्षा ॥ 84 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"मैं कृष्णनामके बहुतसे अनुवाद-महाप्रभु सर्वज्ञ हैं, इसलिये वे जानते थे अर्थोंको नहीं मानता, कृष्ण 'श्यामसुन्दर' और 'यशोदानन्दन' कि श्रीवल्लभ भट्टके द्वारा की गयी कृष्णनाम और हैं-मैं केवल इतना ही जानता हूँ॥ 81 ॥ भागवतकी समस्त व्याख्याएँ निस्सार और निरर्थक हैं। कृष्णनामका 'रूढ़ि' अर्थ :- इसलिये महाप्रभु उन व्याख्याओंकी उपेक्षा कर रहे कृष्णसन्दर्भमें उद्धृत श्रीलक्ष्मीधर-कृत नामकौमुदी-श्लोक- थे॥ 84 ॥ तमालश्यामलत्विषि श्रीयशोदास्तनन्धये। अमृतप्रवाह भाष्य-'फल्गुप्राय', -तुच्छप्राय ॥ 84 ॥ कृष्णनाम्नो रूढिरिति सर्वशास्त्र-विनिर्णयः ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें- 'फल्गु वलुप्राय' एवं 'फल्गु अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 82 ॥ वलानप्राय'; 'फल्गु',-तुच्छ; 'वलान अथवा वलु',- अमृतप्रवाह भाष्य-तमाल-श्यामलवर्ण और यशोदा- वाक्-आडम्बर ॥ 84 ॥ स्तनपायी, -इन दो कृष्णनामोंमें समस्त शास्त्रोंमें विनिर्णीत दुःखी मनसे श्रीभट्टका प्रस्थान और गर्वके नष्ट होनेके रूढ़ि अर्थात् मुख्य अर्थ विद्यमान है ॥ 82 ॥ कारण महाप्रभुके प्रति भक्तिकी कमी :- अनुभाष्य- विमना हञा भट्ट गेला निज घर। तमाल-श्यामल-त्विषि (तमालवृक्षवत् श्यामला त्विट् कान्तिः प्रभु-विषये भक्ति किछु हइल अन्तर ॥ 85 ॥ यस्य तस्मिन्) श्रीयशोदास्तनन्धये (श्रीयशोदायाः स्तनन्धये अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट दुःखी मनसे अपने घर स्तनपायिनि शिशुस्वरूपे) कृष्णनाम्नः (कृष्णोति नाम, तस्य) लौट गये। महाप्रभुके प्रति उनकी भक्तिमें कुछ कमी रूढ़िः (मुख्या, प्रसिद्धा वृत्तिः) इति सर्वशास्त्रविनिर्णयः (सर्वेषां आ गयी ॥ 85 ॥ शास्त्राणां विशेषेण निर्णयः सकलशास्त्रसिद्धान्तः इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। अमृतप्रवाह भाष्य-महाप्रभुके विषयमें उनकी जो रूढ़िः-प्रकृति-प्रत्ययके अर्थकी अपेक्षा नहीं करके भक्ति थी, वह कुछ दूर हो गयी ॥ 85 ॥ समुदायके अर्थका बोध करानेवाली शब्द-शक्ति ॥ 82 ॥ अनुभाष्य-श्रीमन्महाप्रभुके चरणकमलोंमें उनकी गाढ़ 'रूढ़ि' अर्थ ही सिद्ध और स्वीकार्य; भक्तिका ह्रास हो गया ॥ 85 ॥ अन्य अर्थ अस्वीकार्य :- श्रीगदाधरकी चाटुता आरम्भ :- एइ अर्थ आमि मात्र जानिये निर्द्धार। तबे भट्ट गेला पण्डित-गोसाञिर ठाञि। आर सर्व-अर्थे मोर नाहि अधिकार ॥" 83 ॥ नाना मते प्रीति करि' करे आसि-याइ ॥ 86 ॥ अनुवाद-मैं कृष्णनामके श्यामसुन्दर और अनुवाद-तब श्रीवल्लभभट्ट श्रीगदाधर पण्डितके यशोदानन्दन-केवल इन्हीं अर्थोंको ही शास्त्रके द्वारा वासस्थानपर गये। वे अनेक प्रकारसे उनसे प्रीति निर्धारित मानता हूँ, अन्य सभी अर्थोंमें मेरा अधिकार दिखाकर उनके पास आना-जाना करके उनसे सम्बन्ध नहीं है ॥" 83 ॥ बनाये रखने लगे ॥ 86 ॥