भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2238

[ 7/86-94 सातवाँ अध्याय 221

अनुभाष्य—'पण्डित-गोसाञि'—श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी ॥ 86 ॥ महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा करनेके कारण भक्तोंकी उनके द्वारा की गयी व्याख्याके प्रति उदासीनता :- प्रभुर उपेक्षाय सब नीलाचलेर जन। भट्टेर व्याख्यान किछु ना करे श्रवण ॥ 87 ॥ अनुवाद—महाप्रभुके द्वारा उपेक्षा किये जानेके कारण नीलाचलका कोई भी व्यक्ति श्रीवल्लभ भट्टकी किसी भी व्याख्याको श्रवण नहीं करता था॥ 87 ॥ श्रीभट्टका लज्जित होना और श्रीगदाधरकी चाटुकारी :- लज्जित हैल भट्ट, हैल अपमाने। दुःखित हञा गेल पण्डितेर स्थाने ॥ 88 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट लज्जित, अपमानित और दुःखी होकर श्रीगदाधर पण्डितके पास गये ॥ 88 ॥ दैन्य करि' कहे,—“निलुँ तोमार शरण। तुमि कृपा करि' राख आमार जीवन ॥ 89 ॥ श्रीगदाधरको स्वरचित कृष्णनाम-व्याख्याके श्रवणके लिये प्रार्थना करना :- कृष्णनाम व्याख्या यदि करह श्रवण। तबे मोर लज्जा-पङ्क हय प्रक्षालन ॥” 90 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट बड़ी दीनतासे कहने लगे,—“मैंने आपकी शरण ग्रहण की है। आप कृपा करके मेरे जीवनकी रक्षा कीजिये। यदि आप मेरे द्वारा की गयी कृष्णनामकी व्याख्याका श्रवण करेंगे, तभी मुझपर लगा लज्जारूपी कीचड़ धुलेगा॥” 89–90 ॥ अनुभाष्य—'निलुँ',—पाठान्तरमें 'लैलूँ' ॥ 89 ॥ श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट :- सङ्कटे पड़िला पण्डित, करये संशय। कि करिबेन,—इहा करिते नारेन निश्चय ॥ 91 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डित दुविधामें पड़ गये। उन्हें संशय होने लगा कि मैं क्या करूँ—इसका वे निश्चय नहीं कर पा रहे थे ॥ 91 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुने वल्लभभट्टकी उपेक्षा की है, फिर यदि मैं उनसे (वल्लभभट्टसे) नामव्याख्या-मूलक रचना आदि श्रवण करूँ, तो महाप्रभुके मनमें क्लेश होगा। इन दोनोंमें-से किस पक्षकी रक्षा करूँ, यही चिन्ता करके पण्डित गोस्वामी दुविधामें पड़ गये ॥ 91 ॥ श्रीगदाधरकी पहले श्रीवल्लभरचित व्याख्याका श्रवण करनेमें असम्मति; तथापि श्रीभट्टका अनुरोध :- यद्यपि पण्डित ना कैला अङ्गीकार। भट्ट याइ, तबु पड़े करि' बलात्कार ॥ 92 ॥ अनुवाद—यद्यपि श्रीगदाधर पण्डित सुनना नहीं चाहते थे, तथापि श्रीवल्लभ भट्ट हठपूर्वक उन्हें स्वरचित कृष्णनामकी व्याख्याको पढ़कर सुनाने लगे ॥ 92 ॥ अनुभाष्य—पण्डित गोस्वामीने प्रकटरूपसे श्रीवल्लभकी रचना सुननेकी इच्छा प्रकाशित नहीं की, तो भी श्रीवल्लभ उनके साथ प्रीतिकी डोरकी कल्पना करके उनके नहीं माननेपर भी उनके सामने पाठ करने लगे ॥ 92 ॥ सबको मान देनेवाले और उद्वेग देनेमें अनिच्छुक श्रीगदाधरका दोनों ओर सङ्कट देखकर श्रीकृष्णकृपाकी याचना :- आभिजात्ये पण्डित करिते नारे निषेधन। “ए सङ्कटे कृष्ण राख, लइलाङ शरण ॥ 93 ॥ भीतरमें अनिच्छुक होनेपर भी श्रीभट्टकी मर्यादाको देखते हुए महाप्रभुके द्वारा उपेक्षित व्याख्याके श्रवण-हेतु अन्तर्यामी महाप्रभुके विचारमें पण्डितका विश्वास, किन्तु महाप्रभुके भक्तोंसे आशङ्का :- अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर मन। ताँरे भय नाहि किछु, 'विषम' ताँर गण ॥” 94 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट समाजमें सम्मानित होनेके कारण श्रीगदाधर पण्डित उन्हें बलपूर्वक सुनानेसे मना नहीं कर पाये। इसलिये वे भगवान् श्रीकृष्णसे मन-ही-मनमें प्रार्थना करने लगे,—“हे कृष्ण! इस सङ्कटमें आप मेरी