भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2239, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2239

222 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/93–100 ] रक्षा करो, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। अन्तर्यामी होनेके कारण महाप्रभु अवश्य ही मेरे मनकी स्थितिको समझ लेंगे, मुझे उनसे कोई भय नहीं है, किन्तु उनके पार्षद 'विषम' हैं अर्थात् उन्हें अपने मनकी बात समझाना कठिन होगा॥" 93-94 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'आभिजात्ये', -कुलीनताके कारण अर्थात् पण्डितकुलमें श्रीवल्लभ भट्टका सम्मान होनेके कारण ॥ 93 ॥ अनुभाष्य- 'आभिजात्ये', - (1) लज्जाके कारण, (2) नितान्त भक्तिविरोधी पाण्डित्य नहीं होनेके कारण और (3) सामाजिक-सम्मानके कारण। स्वयं भगवान् श्रीमहाप्रभु सभीके हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं; गदाधर पण्डितगोस्वामी किस प्रकारकी अवस्थामें श्रीवल्लभके साथ किस प्रकारका व्यवहार करनेके लिये बाध्य हुए हैं, वह भगवान् गौरसुन्दरके लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये महाप्रभुके विरागके पात्र होनेके सम्बन्धमें उन्हें कोई आशङ्का नहीं थी; परन्तु महाप्रभुके आश्रित वैष्णवोंमें-से कोई-कोई भीतरकी सब बातोंको नहीं समझकर बादमें 'वल्लभके सङ्गकारी' कहकर पण्डित गोस्वामीके प्रतिकूल कोई अभिप्राय प्रकाशित करें, - यही आशङ्काका विषय है॥ 93-94 ॥ श्रीवल्लभ-रचित व्याख्याके श्रवणसे अन्याय नहीं होनेपर भी श्रीपण्डितके साथ महाप्रभुके भक्तोंका प्रेम-कलह :- यद्यपि विचारे पण्डितेर नाहि दोष। तथापि प्रभुर गण करे प्रणय-रोष ॥ 95 ॥ अनुवाद-इस विषयमें विचार करनेपर यद्यपि श्रीगदाधर पण्डितका कोई दोष नहीं था, तथापि महाप्रभुके भक्त उनके प्रति प्रणय-रोष करने लगे ॥ 95 ॥ श्रीअद्वैताचार्य आदिके साथ श्रीवल्लभभट्टका कुतर्क :- प्रत्यह वल्लभ-भट्ट आइसे प्रभु-स्थाने। 'उद्ग्राहादि' प्राय करे आचार्यादि-सने ॥ 96 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट प्रतिदिन महाप्रभुके वासस्थानपर आते और श्रीअद्वैताचार्य आदिसे वितर्क करते ॥ 96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'उद्ग्राहादि' - वितर्कादि ॥ 96 ॥ अनुभाष्य - 'उद्ग्राहादि प्राय',- आक्रमणके जैसे अर्थात् विद्याविचार-जैसे तर्कोंका प्रदर्शन। 'आचार्यादि',- श्रीअद्वैताचार्य अथवा आचार्य दामोदरस्वरूप आदिके साथ ॥ 96 ॥ श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा श्रीवल्लभके समस्त अभक्तिसिद्धान्तोंका खण्डन :- येइ किछु करे भट्ट 'सिद्धान्त' स्थापन। शुनितेइ आचार्य ताहा करेन खण्डन ॥ 97 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जिस किसी भी सिद्धान्तको स्थापित करते, श्रीअद्वैताचार्य सुनते ही उसका खण्डन कर देते ॥ 97 ॥ गौरभक्तोंके मध्य श्रीभट्ट-जैसे हंसोंके मध्य बगुला :- आचार्यादि-आगे भट्ट यबे यबे याय। राजहंस-मध्ये येन रहे बकप्राय ॥ 98 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट जब-जब श्रीअद्वैताचार्य आदिके बीचमें जाते, वे राजहंसोंके मध्य बगुलेकी भाँति ही होते ॥ 98 ॥ प्रकृतिरूपी जीवके लिये उनके नित्य पति श्रीकृष्णके नामोंके उच्चारण करनेके अधिकारमें श्रीवल्लभके द्वारा आपत्ति जतलाना :- एकदिन भट्ट पुछिल आचार्येरे। “जीव-‘प्रकृति’ ‘पति’ करि’ मानये कृष्णेरे ॥ 99 ॥ पतिव्रता हञा पतिर नाम नाहि लय। तोमरा कृष्णनाम-लह, - कोन् धर्म हय?? ” 100 ॥ अनुवाद-एकदिन श्रीवल्लभ भट्टने श्रीअद्वैताचार्यसे पूछा,- “जीव प्रकृति अर्थात् स्त्री है और श्रीकृष्णको पति मानती है। पतिव्रता होनेके कारण पत्नी अपने पतिके नामका उच्चारण नहीं करती, किन्तु आप लोग