श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 7/99-109 सातवाँ अध्याय 223
तो कृष्णका नाम लेते हैं—यह क्या कोई धर्म है?"99-100 ॥ मीमांसाके लिये श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा साक्षात् धर्मके विग्रह महाप्रभुको दिखाना :- आचार्य कहे,—“आगे तोमार 'धर्म' मूर्त्तिमान्। इँहारे पुछह, इँह करिबेन प्रमाण॥” 101 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आपके सामने मूर्त्तिमान 'धर्म' (महाप्रभु) विराजमान हैं। आप इन्हींसे पूछिये, ये ही आपको इसका प्रमाण देंगे॥” 101 ॥ श्रीवल्लभके ऊपर कृपा और नित्य-मङ्गलका प्रदर्शन करनेके लिये ही महाप्रभुके द्वारा बहुत कठोर किन्तु सत्य उत्तर देना; पतिरूपी श्रीकृष्णके उद्देश्यसे ही प्रकृतिरूपी जीवके लिये सदैव श्रीकृष्णनामको ग्रहण करनेकी विधि :- प्रभु कहेन,—“तुमि ना जानह धर्माधर्म। स्वामी-आज्ञा पाले,—एइ पतिव्रता-धर्म॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम धर्म-अधर्मके विषयमें नहीं जानते हो। पतिकी आज्ञाका पालन करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म होता है॥ 102 ॥ पतिर आज्ञा,—निरन्तर ताँर नाम लइते। पतिर आज्ञा पतिव्रता ना पारे लङ्घिते॥ 103 ॥ अनुवाद—उनका निरन्तर नाम ग्रहण करना ही पतिकी (कृष्णकी) आज्ञा है। इसलिये पतिव्रता स्त्रीको (जीवको) निरन्तर नाम कीर्तन करना चाहिये, क्योंकि वह अपने पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकती॥ 103 ॥ पतिरूपी श्रीकृष्णनाम उच्चारणके फलसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय :- अतएव नाम लय, नामेर 'फल' पाय। नामेर फले कृष्णपदे 'प्रेम' उपजाय॥” 104 ॥ अनुवाद—इसलिये [भक्त] जीव कृष्णनामका सदा कीर्तन करके नामके फलको प्राप्त करता है। नामके फलस्वरूप उसका कृष्णके चरणोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 104 ॥ प्रतिष्ठाके क्षय होनेपर श्रीवल्लभ-भट्ट अवाक् और चिन्तासे व्याकुल :- शुनिया वल्लभभट्ट हैल निर्वचन। घरे याइ' मने दुःखे करेन चिन्तन॥ 105 ॥ भविष्यमें जयकी आशाकी कल्पनासे प्रतिष्ठाशा-प्रिय श्रीवल्लभका हर्ष-स्वप्न :- 'नित्य आमार एइ सभाय हय कक्षा-पात। एकदिन उपरे यदि हय मोर बात्॥ 106 ॥ तबे सुख हय, आर सब लज्जा याय। स्व-वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय??' 107 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीवल्लभ भट्ट मौन हो गये। वे मनमें दुःखी होकर घर गये और विचार करने लगे,—'प्रतिदिन इस सभामें मेरी पराजय होती है, एकदिन भी यदि मेरी बात सबकी बातके ऊपर स्थापित हो जाय, तभी मुझे प्रसन्नता होगी और मेरी समस्त लज्जा दूर होगी। परन्तु मैं अपने वचनोंको स्थापित करनेके लिये क्या करूँ?' 105-107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कक्षा-पात',—पराजय॥ 106 ॥ अनुभाष्य—'कक्षा-पात',—कक्षा (प्रतियोगिता)+पात (नाश), पराजय; 'उपरे हय',—सभीकी उक्तियोंका खण्डन करके स्थापित हो॥ 106 ॥ एकदिन सभामें सपरिकर महाप्रभुके सामने श्रीवल्लभके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा :- आर दिन आसि' बसिला प्रभुरे नमस्करि'। सभाते कहेन किछु मने गर्व करि'॥ 108 ॥ “भागवते स्वामीर व्याख्यान करियाछि खण्डन। लइते ना पारि ताँर व्याख्यान-वचन॥ 109 ॥