भारतकोश
संग्रह पर लौटें

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 7/99-109 सातवाँ अध्याय 223

तो कृष्णका नाम लेते हैं—यह क्या कोई धर्म है?"99-100 ॥ मीमांसाके लिये श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा साक्षात् धर्मके विग्रह महाप्रभुको दिखाना :- आचार्य कहे,—“आगे तोमार 'धर्म' मूर्त्तिमान्। इँहारे पुछह, इँह करिबेन प्रमाण॥” 101 ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यने कहा,—“आपके सामने मूर्त्तिमान 'धर्म' (महाप्रभु) विराजमान हैं। आप इन्हींसे पूछिये, ये ही आपको इसका प्रमाण देंगे॥” 101 ॥ श्रीवल्लभके ऊपर कृपा और नित्य-मङ्गलका प्रदर्शन करनेके लिये ही महाप्रभुके द्वारा बहुत कठोर किन्तु सत्य उत्तर देना; पतिरूपी श्रीकृष्णके उद्देश्यसे ही प्रकृतिरूपी जीवके लिये सदैव श्रीकृष्णनामको ग्रहण करनेकी विधि :- प्रभु कहेन,—“तुमि ना जानह धर्माधर्म। स्वामी-आज्ञा पाले,—एइ पतिव्रता-धर्म॥ 102 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“तुम धर्म-अधर्मके विषयमें नहीं जानते हो। पतिकी आज्ञाका पालन करना ही पतिव्रता स्त्रीका धर्म होता है॥ 102 ॥ पतिर आज्ञा,—निरन्तर ताँर नाम लइते। पतिर आज्ञा पतिव्रता ना पारे लङ्घिते॥ 103 ॥ अनुवाद—उनका निरन्तर नाम ग्रहण करना ही पतिकी (कृष्णकी) आज्ञा है। इसलिये पतिव्रता स्त्रीको (जीवको) निरन्तर नाम कीर्तन करना चाहिये, क्योंकि वह अपने पतिकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकती॥ 103 ॥ पतिरूपी श्रीकृष्णनाम उच्चारणके फलसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय :- अतएव नाम लय, नामेर 'फल' पाय। नामेर फले कृष्णपदे 'प्रेम' उपजाय॥” 104 ॥ अनुवाद—इसलिये [भक्त] जीव कृष्णनामका सदा कीर्तन करके नामके फलको प्राप्त करता है। नामके फलस्वरूप उसका कृष्णके चरणोंमें प्रेम उत्पन्न होता है॥” 104 ॥ प्रतिष्ठाके क्षय होनेपर श्रीवल्लभ-भट्ट अवाक् और चिन्तासे व्याकुल :- शुनिया वल्लभभट्ट हैल निर्वचन। घरे याइ' मने दुःखे करेन चिन्तन॥ 105 ॥ भविष्यमें जयकी आशाकी कल्पनासे प्रतिष्ठाशा-प्रिय श्रीवल्लभका हर्ष-स्वप्न :- 'नित्य आमार एइ सभाय हय कक्षा-पात। एकदिन उपरे यदि हय मोर बात्॥ 106 ॥ तबे सुख हय, आर सब लज्जा याय। स्व-वचन स्थापिते आमि कि करि उपाय??' 107 ॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीवल्लभ भट्ट मौन हो गये। वे मनमें दुःखी होकर घर गये और विचार करने लगे,—'प्रतिदिन इस सभामें मेरी पराजय होती है, एकदिन भी यदि मेरी बात सबकी बातके ऊपर स्थापित हो जाय, तभी मुझे प्रसन्नता होगी और मेरी समस्त लज्जा दूर होगी। परन्तु मैं अपने वचनोंको स्थापित करनेके लिये क्या करूँ?' 105-107 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'कक्षा-पात',—पराजय॥ 106 ॥ अनुभाष्य—'कक्षा-पात',—कक्षा (प्रतियोगिता)+पात (नाश), पराजय; 'उपरे हय',—सभीकी उक्तियोंका खण्डन करके स्थापित हो॥ 106 ॥ एकदिन सभामें सपरिकर महाप्रभुके सामने श्रीवल्लभके द्वारा श्रीधरस्वामीकी निन्दा :- आर दिन आसि' बसिला प्रभुरे नमस्करि'। सभाते कहेन किछु मने गर्व करि'॥ 108 ॥ “भागवते स्वामीर व्याख्यान करियाछि खण्डन। लइते ना पारि ताँर व्याख्यान-वचन॥ 109 ॥

224 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/108-113 ] श्रीस्वामिपादकी पहले और बादवाली उक्तिमें सामञ्जस्य अथवा समन्वयके अभावका वर्णन करके उसपर मिथ्या दोषारोपण :- सेइ व्याख्या करेन याँहा येइ पड़े आनि' । एकवाक्यता नाहि, ताते 'स्वामी' नाहि मानि ॥" 110 ॥ अनुवाद-वे अगले दिन आकर महाप्रभुको प्रणाम करके बैठ गये और बड़े गर्वसे कुछ कहने लगे, - “मैंने स्वरचित भागवतकी टीकामें श्रीधरस्वामी कृत भागवतकी व्याख्याका खण्डन किया है। मैं उनकी व्याख्याको स्वीकार नहीं कर पाता। जहाँ जो प्रसङ्ग आता है, उसी प्रकारसे वे वहाँ व्याख्या करते हैं। इस प्रकार उनकी व्याख्यामें सङ्गति नहीं होती, इसलिये मैं उन्हें प्रमाणिक नहीं मानता ॥ 108-110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- जहाँ जिस प्रकारकी बात आयी, श्रीधरस्वामीने उस प्रकारसे मानकर व्याख्या की। अतएव सर्वत्र उनकी एकवाक्यता (अथवा सामञ्जस्य) नहीं रहती, इसलिये मैं श्रीधरस्वामीको नहीं मानता ॥ 110 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'भक्तिके एक रक्षक' श्रीधरस्वामिपादकी भक्तिके अनुकूल व्याख्याका समर्थन; श्रीधरका ही चित्-समन्वयरूप चिदेकविष्णु-स्वामित्व, श्रीधरके विरोधीकी ही चित्-जड़-समन्वय पोषणरूपी मनमानी :- प्रभु हासि' कहे, – “स्वामी ना माने येइ जन। वेश्यार भितरे तारे करिये गणन ॥" 111 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा, - “जो स्वामीको [पतिको] प्रमाणिक नहीं मानती, मैं उसकी गणना वेश्याओंमें करता हूँ।" [पक्षान्तरमें - 'जो श्रीधर स्वामीको नहीं मानता, उसकी गणना मैं व्यभिचारियोंमें करता हूँ'] ॥ 111 ॥ महाप्रभुके वचन सुनकर सभी भक्तोंको आनन्द :- एत कहि' महाप्रभु मौन धरिला। शुनिय़ा सबार मने सन्तोष हइला ॥ 112 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने मौन धारण कर लिया। महाप्रभुके वचन सुनकर समस्त उपस्थित भक्तोंके मनमें सन्तोष हुआ ॥ 112 ॥ अविद्या-नाश करनेवाले भुवनमङ्गल परमदयालु अवतारी अन्तर्यामी श्रीगौरसुन्दर :- जगतेर हित लागि' गौर-अवतार। अन्तरेर अभिमान जानेन ताहार ॥ 113 ॥ अनुवाद-जगत्के हितके लिये ही श्रीगौर-अवतार हुआ है। महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके भीतरके अभिमानको जानते थे ॥ 113 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीवल्लभ भट्टसे महाप्रभुकी भेंट सबसे पहले प्रयागमें आड़ाइल ग्राममें हुई थी। तब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम गोस्वामी, दोनों भाई भी महाप्रभुके साथ थे। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करनेके लिये महाप्रभु प्रयागमें पधारे थे। श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके आगमनका समाचार सुनकर उनके दर्शन करनेके लिये आये और निमन्त्रण करके उन्हें अपने घरमें ले गये। श्रीवल्लभ भट्ट आयुमें महाप्रभुसे बहुत बड़े थे, किन्तु वह अभिमान छोड़कर उन्होंने अपने हाथोंसे महाप्रभुके चरणोंको धोया। उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने मस्तकपर धारण किया। उन्होंने गन्ध-पुष्प-धूप-दीपसे महाप्रभुकी पूजा की। तब महाप्रभुने निष्कपट रूपसे उनपर कृपा की। श्रीवल्लभ भट्टने भागवतकी 'सुबोधिनी'-नामक एक टीका लिखी थी और वे देश-विदेशमें उसका प्रचार कर रहे थे। एक बार वे दक्षिण देशमें भ्रमण करते हुए विजयनगरमें पधारे। वहाँ एक बार सभामें शङ्कराचार्य-सम्प्रदायके शङ्करका अवतार कहलानेवाले दिग्गज विद्वानके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। श्रीवल्लभ भट्टने उनसे पूछा, - "क्या आप 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- इस वाक्यको मानते हैं?" उन शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वानने कहा, - “अवश्य ही हम इसे महावाक्य मानते हैं।" श्रीवल्लभ भट्टने कहा, - "शङ्कराचार्यजीने कहा है-

[ 7/113-120 सातवाँ अध्याय 225 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः', यदि सब कुछ ब्रह्म है, तो आप इस जगत्को मिथ्या क्यों कहते हैं?" शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वान उसका जो भी उत्तर दे रहे थे, श्रीवल्लभ भट्ट उसका खण्डन कर देते। अन्तमें जब उनको परास्त कर दिया, तब श्रीवल्लभ भट्टका एक सौ आठ सोनेके घड़ोंके जलसे अभिषेक किया गया। इसको 'कनक-अभिषेक' कहते हैं। यह सम्मान पानेके बाद उनमें कुछ अभिमान आ गया था, जैसे दक्ष प्रजापतिके प्रसङ्गमें भी देखा जाता है। (भाः 4/3/2)— “यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना। प्रजापतीनां सर्वेषामधिपत्ये स्मयोऽभवत्॥” “जब परमदेवता ब्रह्माजीने दक्षको समस्त प्रजापतियोंके अधिपतिके रूपमें अभिषिक्त किया, तब दक्षके हृदयमें गर्व उत्पन्न हुआ।” महाप्रभु उनके हृदयमें स्थित अभिमानको जानते थे, इसलिये उनका शोधन करनेके लिये उनकी उपेक्षा कर रहे थे।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 113 ॥ अधोक्षज महाप्रभुके द्वारा उपेक्षासे ही जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अहङ्कारी 'भक्ति-रक्षक'के (श्रीधरस्वामीके) विरोधीकी अविद्या-हरणरूपी कृपाका वर्णन :- नाना अवज्ञाने भट्टे शोधेन भगवान्। कृष्ण यैछे खण्डिलेन इन्द्रेर अभिमान॥ 114 ॥ अनुवाद-भगवान् महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टकी अनेक प्रकारसे बात न मानकर और खण्डन करके उनका शोधन किया जैसे श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिमानको तोड़ा था॥ 114 ॥ अनुभाष्य-कृष्णोत्तर इन्द्रकी पूजाको परिवर्तित करके कृष्णने व्रजमें गिरिराज गोवर्धनकी पूजा प्रवर्तित करवायी। इसके द्वारा मायामुग्ध विमूढात्मा इन्द्रने क्रोधित होकर भीषण वर्षणके द्वारा गोकुलको नष्ट करनेका प्रयास किया। तब कृष्णने गोवर्धन धारण करके वर्षाके द्वारा प्लावित गोकुलकी रक्षा की, जिससे इन्द्रका जड़ीय अभिमान खण्डित और चूर्ण हुआ ॥ 114 ॥ अविद्याग्रस्त अक्षजज्ञानीका प्रेयको ही श्रेय मानना और मनोधर्मके प्रतिकूल कल्याणकारी भगवान्की कृपाको अमङ्गल और दुःख मानना :- अज्ञ जीव निज-'हिते' 'अहित' करि' माने। गर्व चूर्ण हैले, पाछे उघाड़े नयने॥ 115 ॥ अनुवाद-अज्ञानी जीव अपने हितको अहित मानता है, किन्तु गर्वके चूर्ण होनेपर उसके नेत्र खुलते हैं अर्थात् वह अपने वास्तविक हितको देख पाता है॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उघाड़े नयने', - नेत्र खोलता है (नेत्र खुलते हैं) ॥ 115 ॥ रात्रिमें श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुकी पूर्व कृपाके इतिहासका स्मरण :- घरे आसि' रात्र्ये भट्ट चिन्तिते लागिल। “पूर्वे प्रयागे मोरे महा-कृपा कैल॥ 116 ॥ स्वगण-सहिते मोर मानिला निमन्त्रण। एबे केने प्रभुर मोते फिरि' गेल मन?? 117 ॥ समस्त जीवोंके नित्य कल्याणका सम्पादन करना ही ईश्वरका स्वभाव :- 'आमि जिति', - एइ गर्व-शून्य हउक इँहार चित्त। ईश्वर-स्वभाव, - करेन सबाकार हित ॥ 118 ॥ उपेक्षा और अपमानादि इन्द्रियोंको दुःख प्रदान करनेवाले कार्यके द्वारा ही समदर्शी अधोक्षजके द्वारा उनके विमुख अक्षज-ज्ञानीके मद-मात्सर्यका हरण :- आपना जानाइते आमि करि अभिमान। से-गर्व खण्डाइते मोर, करेन अपमान॥ 119 ॥ पहले दुःख देनेवाले, परिणाममें मङ्गलमय कर्मफलको भगवान्की कृपा माननेमें ही बुद्धिमता :- आमार 'हित' करेन, - इहो आमि मानि 'दुःख'। कृष्णेर उपरे येन कैल इन्द्र मूर्ख॥” 120 ॥

226 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/116-126 ] अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट अपने घर आकर रात्रिके समयमें विचार करने लगे,—“महाप्रभु पहले प्रयागमें तो मेरे प्रति बहुत कृपालु थे और उन्होंने अपने गणों सहित मेरे निमन्त्रणको भी स्वीकार किया था, किन्तु अब पुरीमें उनका मन मुझसे क्यों हट गया है ? 'मैं अपनी विद्याके अभिमानके कारण सोचता हूँ कि मैं विजयी होऊँ, किन्तु महाप्रभु विचार करते हैं,-'इनका चित्त इस अभिमानसे रहित हो जाय।' ईश्वरका स्वभाव ही होता है कि वे सभीका हित करते हैं। मुझमें अपने आपको बड़ा विद्वान दिखानेका अभिमान है, महाप्रभु मेरे उस अभिमानको चूर करनेके लिये ही मेरा अपमान करते हैं। महाप्रभु मेरा अपमान करके मेरा हित करते हैं, किन्तु मैं ऐसा हूँ कि उसे अपना दुःख मानता हूँ, जैसे महामूर्ख इन्द्रने भी उसके हितकारी श्रीकृष्णके ऊपर क्रोध किया था॥” 116-120 ॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें शरण-ग्रहण :- एत चिन्ति' प्राते आसि' प्रभुर चरणे। दैन्य करि' स्तुति करि' लइल शरणे ॥ 121 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके श्रीवल्लभ भट्ट अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। उन्होंने अति दीनतापूर्वक महाप्रभुकी स्तुति की और उनकी शरण ग्रहण की ॥ 121 ॥ श्रीवल्लभकी आर्त्ति, दैन्य और अनुतापपूर्ण उक्ति :- “आमि अज्ञ जीव, -अज्ञोचित कर्म कैलुँ। तोमार आगे मूर्ख आमि पाण्डित्य प्रकाशिलुँ ॥ 122 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने अपने दोषको स्वीकार करते हुए कहा,-“मैं अज्ञानी मूर्ख जीव हूँ, मैंने मूर्खतावाला कार्य ही किया है। मैंने मूर्ख होनेपर भी आपके आगे अपने पाण्डित्यको प्रकाशित करनेका प्रयास किया है॥ 122 ॥ अनुभाष्य—दो भिन्न पाठान्तर—"तोमार आगे आमि मूर्ख पाण्डित्य प्रकाशिलुँ” और “तोमार आगे मूर्ख हञा पाण्डित्य प्रकाशिलुँ।” 'मूर्ख-पाण्डित्य',-मूर्खकी चतुरता ॥ 122 ॥ भक्तिरक्षक-श्रीस्वामीके विरोधीके प्रति अवज्ञा और उपेक्षाके द्वारा ही महाप्रभुकी महाकृपाका प्रदर्शन :- तुमि-ईश्वर, निजोचित कृपा कैला। अपमान करि' सर्व गर्व खण्डाइला ॥ 123 ॥ अनुवाद—किन्तु आप ईश्वर हैं। आपने अपने स्वभावके अनुरूप ही मुझपर कृपा की है। आपने मेरा अपमान करके मेरे सम्पूर्ण गर्वको चूर्ण कर दिया है ॥ 123 ॥ इन्द्रकी मूर्खताका दृष्टान्त; पहले दुःख प्रतीत होनेवाली, किन्तु नित्यमङ्गलकारी भगवत्-कृपामें उनका अनिष्ट-भ्रम :- आमि-अज्ञ, 'हित'-स्थाने मानि 'अपमाने'। इन्द्र येन कृष्णेर निन्दा करिल अज्ञाने ॥ 124 ॥ अनुवाद—मैं अज्ञानी मूर्ख हूँ, क्योंकि मैं अपने हितको अपना अपमान समझ रहा था, जैसे इन्द्रने अज्ञानतावश श्रीकृष्णकी निन्दा की थी॥ 124 ॥ भगवत्-कृपाके अञ्जनसे अहङ्कार-तमोरूपी अन्धताका नाश :- तोमार कृपा-अञ्जने गर्व-आन्ध्य गेल। तुमि एत कृपा कैला, -एबे 'ज्ञान' हैल ॥ 125 ॥ अनुवाद—आपकी कृपाके अञ्जनसे मेरी अहङ्कार- तमोरूपी अन्धताका नाश हो गया है। आपने मुझपर इतनी महत् कृपा की है, उसे मैं अब समझा हूँ, मेरा अज्ञान अब दूर हो गया है॥ 125 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवल्लभके द्वारा शरण-ग्रहण और क्षमा-भिक्षा :- अपराध कैलु, क्षम, लइनु शरण। कृपा करि' मोर माथे धरह चरण ॥” 126 ॥

[ 7/126–135 सातवाँ अध्याय 227 अनुवाद—मैंने बहुत अपराध किये हैं। आप मुझे क्षमा कीजिये, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। आप कृपा करके अपने चरणकमल मेरे सिरपर रख दीजिये॥” 126॥ मानद महाप्रभुकी स्तुतिके द्वारा श्रीभट्टको सान्त्वना प्रदान :— प्रभु कहे,—“तुमि 'पण्डित' 'महाभागवत'। दुइगुण याँहा, ताँहा नाहि गर्व-पर्वत ॥ 127 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभका 'भक्तिरक्षक' सर्वजगद्गुरु श्रीधर स्वामीके विरोधके कारण तिरस्कार :— श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका कर ! श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 'गर्व' धर ! ! 128 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीधरकी यथोचित मर्यादाका प्रचार :— श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' जानि। जगद्गुरु श्रीधरस्वामी, 'गुरु' करि' मानि ॥ 129 ॥ 'भक्तिरक्षक' श्रीधरका अतिक्रम करनेके फलसे लोक-निन्दित भागवतके अर्थकी विपरीतता :— श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु लिखिबे। 'अर्थव्यस्त' लिखन सेइ, लोके ना मानिबे ॥ 130 ॥ चिद्वस्तु विष्णु-स्वामी [सम्प्रदायमें निष्णात] श्रीधरके आनुगत्यमें शुद्धाद्वैतपरक अद्वय-ज्ञानानुकूल भक्ति-व्याख्या ही सर्वमान्य :— श्रीधरेर अनुगत ये करे लिखन। सब लोक मान्य करि' करिबे ग्रहण ॥ 131 ॥ एकमात्र कृष्ण-सेवामें तत्पर श्रीधरके आनुगत्यमें ही भागवत-व्याख्याकी कर्त्तव्यता :— श्रीधरानुगत कर भागवत-व्याख्यान। अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण भगवान् ॥ 132 ॥ दस प्रकारके नामापराधसे रहित श्रीकृष्णकीर्त्तनके फलसे श्रीकृष्णपदकी प्राप्ति :— अपराध छाड़ि' कर कृष्णसङ्कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तब कृष्णेर चरण॥” 133 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप पण्डित हैं और महाभागवत भी हैं। जहाँपर ये दो गुण विराजमान रहते हैं, वहाँ अहङ्काररूपी पर्वत नहीं रह सकता। आपने श्रीधरस्वामीकी टीकाकी निन्दा करके भागवतकी अपनी टीकाकी रचना की है ! आपमें इतना मिथ्या अभिमान है कि आप श्रीधरस्वामीको प्रमाणिक नहीं मानते ! ! जगद्गुरु श्रीधरस्वामीकी कृपासे ही भागवतको जान सकते हैं। मैं श्रीधरस्वामीको अपना गुरु मानता हूँ। आप गर्व करके श्रीधरस्वामीके विचारके ऊपर जाकर जो कुछ भी लिखोगे, वह वास्तविक अर्थके विपरीत ही होगा और लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे। जो श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करेगा, उसे सभी लोग प्रामाणिक मानकर ग्रहण करेंगे। आप श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करो। अपने अभिमानको त्यागकर भगवान् कृष्णका भजन करो। आप अपराधोंको त्याग करके श्रीकृष्ण सङ्कीर्तन करो, तभी आपको अतिशीघ्र श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी॥” 127–133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अर्थव्यस्त',—विपरीत अर्थ॥ 130 ॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— भट्ट कहे,—“यदि मोरे हइला प्रसन्न। एकदिन पुनः मोर मान' निमन्त्रण ॥” 134 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“यदि आप मेरे प्रति प्रसन्न हो गये हैं, तब पुनः एकदिन मेरे निमन्त्रणको स्वीकार कीजिये॥” 134 ॥ जीवके प्रति भुवनपावन महाप्रभुकी अहैतुकी कृपाका उदाहरण :— प्रभु अवतीर्ण हैला जगत् तारिते। मानिलेन निमन्त्रण, तारे सुख दिते ॥ 135 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सम्पूर्ण जगत्का उद्धार करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये उन्होंने श्रीवल्लभ भट्टकी प्रसन्नताके लिये उनके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया॥ 135 ॥

228 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/136-139 ] अक्षज्ञानी अभिमानीको दण्ड प्रदान करके उसका उद्धार करना :- जगतेर 'हित' हउक, -एइ प्रभुर मन। दण्ड करि' करे तार हृदय शोधन ॥ 136 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी हार्दिक इच्छा है कि सम्पूर्ण जगत्का हित हो। श्रीवल्लभ भट्टके हृदयको शुद्ध करनेके लिये ही महाप्रभुने उनको दण्ड प्रदान किया॥ 136॥ परिकरों सहित महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभके घरमें भिक्षा-स्वीकार :- स्वगण-सहिते प्रभुर निमन्त्रण कैला। महाप्रभु तारे तब प्रसन्न हइला ॥ 137 ॥ अनुवाद-जब श्रीवल्लभ भट्टने महाप्रभुको उनके परिकरों सहित निमन्त्रित किया, तब महाप्रभु उनके प्रति प्रसन्न हो गये ॥ 137 ॥ सत्यभामाके अवतार श्रीजगदानन्दके वृत्तान्तका वर्णन; उनका वाम्य-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- जगदानन्द-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। सत्यभामा-प्राय प्रेम 'वाम्य-स्वभाव' ॥ 138 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके साथ प्रणय-कलह :- बार बार प्रणय-कलह करे प्रभु-सने। अन्योऽन्ये खट्मटि चले दुइजने ॥ 139 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितका महाप्रभुके प्रति शुद्ध प्रगाढ़ भाव था। उनका प्रेम प्रायः श्रीसत्यभामाके प्रेमकी भाँति वाम्य-स्वभाववाला था। श्रीजगदानन्द पण्डित बार-बार महाप्रभुके साथ प्रेम-कलह करते थे। उन दोनोंमें सदा विवाद चलता ही रहता था॥ 138-139 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृत पूः खः सातवें अध्यायमें, श्रीसनातनप्रभु,- “ततोऽन्याभिश्च देवीभिरेतदेवानुमोदितम्। सात्राजिती परं मानगेहं तदसहायविशत् ॥ 85 ॥ श्रीमद्गोपीजन-प्राणनाथः सक्रोधमादिशत्। सा समानीयतामत्र मूर्खराजसुता द्रुतम् ॥ 86 ॥ स्तम्भेऽन्तर्धाय देहं स्वं स्थिता लज्जाभयान्विता ॥89क। अरे सात्राजिति क्षीणचित्ते मानो यथा त्वया।90क। अवरे किं न जानासि मां तदिच्छानुसारिणम् ॥ ”91ख ॥ तासामभावे पूर्वं मे वसतो मथुरापुरे। विवाहकरणे काचिदिच्छाप्यासीन्न मानिनि ॥ 100 ॥ [अर्थात् “(गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णका प्रेम अधिक होना उचित ही है, -इस प्रकार) तदुपरान्त अन्य महिषियोंने भी श्रीरुक्मिणीदेवीके विचारोंका अनुमोदन किया, किन्तु सत्राजितकी पुत्री श्रीसत्यभामादेवी उसको सहन न कर पायीं और मान-गृहमें प्रवेश कर गयीं। (यह सुनकर) श्रीगोपीजन-प्राणनाथ श्रीकृष्णने क्रोधपूर्वक आदेश दिया,-'उस महामूढ़ सत्राजित-राजाकी पुत्री सत्यभामाको शीघ्र ही यहाँ ले आओ।' इसके द्वारा सत्यभामा लज्जित और भगवान्‌के क्रोधसे भयभीत होकर स्तम्भके पीछे ही अपनेको छुपाकर खड़ी रहीं। (श्रीकृष्णने सत्यभामाको लक्ष्य करके कहा,-) अरी संकीर्णचित्तवाली सत्राजितकी कन्या ! तुमने मान किया है, किन्तु तुम क्या नहीं जानती कि मैं तो व्रजवासियोंकी इच्छाके वशीभूत हूँ? अयि मानिनि ! पहले मथुरामें वास करनेके समयमें गोपियोंसे विच्छेद होनेपर भी मेरी विवाह करनेकी कदापि इच्छा नहीं थी।”] ॥ 138-139 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीजगदानन्द पण्डित स्वरचित श्रीश्रीप्रेमविवर्त ग्रन्थमें कहते हैं कि इसी प्रकारसे महाप्रभुके साथमें उनका बहुत प्रकारसे प्रेम-कलह होता रहता था। उनका प्रेम-कलह कैसा होता था?-परिकरके समान। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये सिरमें लगानेके लिये नवद्वीपसे सुगन्धित तेल लेकर आये। परन्तु महाप्रभुने कहा कि संन्यासीको तेल लगाना शोभा नहीं देता है, इसे श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें प्रदीप जलानेके लिये दे दो। पुनः-पुनः कहनेपर भी जब महाप्रभु नहीं माने, तो श्रीजगदानन्द पण्डितने वह तेलकी मटकी फोड़ दी और मान करके बैठ गये। इस प्रकारसे उनमें दिन-रात प्रेम-कलह होता है। प्रेम-कलह क्यों होता है-इसके लिये श्रीभक्तिविनोद ठाकुरने एक दर्शन दिया है। सूर्य अपनी धुरिपर है

[ 7/139-140 सातवाँ अध्याय 229 और सभी ग्रहोंका आकर्षण करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि सभी ग्रहों-उपग्रहोंमें भी आकर्षण शक्ति है और इनका अपना कुछ अस्तित्व है। सूर्य सभी ग्रह-नक्षत्रोंको अपनी ओर आकर्षित करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रह-उपग्रह सूर्यकी ओर खिंचते तो हैं, परन्तु अपने अस्तित्वकी रक्षाके लिये दूर भी रहना चाहते हैं, परिणामस्वरूप वे सूर्यके चारों ओर घूमने लगते हैं। चिद्-जगत्में एकमात्र सूर्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं। कृष्णका अर्थ है जो सभीको आकर्षित करते हैं। वे अपने रूपसे, अपने गुणोंसे, अपनी लीलाओंके माधुर्यसे समस्त जीवोंको अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किन्तु जीवोंका भी अपना कुछ व्यक्तित्व है। जीवका अपना व्यक्तित्व उसको पृथक् रखना चाहता है, वह खिंचकर नहीं जाना चाहता। इसलिये वह दूर तो नहीं जाता, किन्तु प्रेम कलह होता है। इस प्रकार जीव अपना पृथक् व्यक्तित्व रखकर उसी प्रकारसे कृष्णकी प्रेममयी सेवा करता है। इस दर्शनको कोई-कोई भाग्यवान् जीव ही समझ पाता है। महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र हैं—वे सर्वाकर्षक हैं और सूर्यके समान हैं और श्रीजगदानन्द पण्डित ग्रहके समान हैं। श्रीजगदानन्द आकृष्ट तो हैं, वे महाप्रभुके निकट भी जाना चाहते हैं, किन्तु पृथक् व्यक्तित्व रहनेके कारण अपने अनुसार महाप्रभुकी सेवा करना चाहते हैं। वे स्वतन्त्र रूपमें उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं, किन्तु वैसा नहीं कर पानेके कारण उनका प्रेम-कलह होता है। इसलिये उन्हें विरह हो जाता है। वे महाप्रभुके विरहमें उनके निकट तो घूमते हैं, किन्तु कुछ पृथक् भी रहना चाहते हैं।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 139 ॥ रुक्मिणीके अवतार श्रीगदाधरका दक्षिण-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- गदाधर-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। रुक्मिणी-देवीरे यैछे 'दक्षिण-स्वभाव' ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितका भी महाप्रभुके प्रति शुद्ध गाढ़ भाव था। उनका श्रीरुक्मिणी देवीकी भाँति दक्षिण स्वभाव था॥ 140 ॥ अमृतानुकम्पा—यहाँपर श्रील गदाधर पण्डितके शुद्ध गाढ़ भावकी श्रीरुक्मिणीदेवीके 'दक्षिण'-स्वभावके साथ तुलना की है, यह देखकर उनको कृष्णलीलामें रुक्मिणी स्वरूपा जानकर वैसा भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (147) में उनके सम्बन्धमें कहा गया है,— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥” अर्थात् “पहले जो साक्षात् प्रेमरूपा वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधा हैं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय गदाधर पण्डितके नामसे विख्यात हैं।” श्रीगदाधर पण्डित-सभी प्रकारसे मूलस्वरूपा श्रीमती राधाठाकुराणी ही हैं, इसलिये उनके भीतरमें श्रीरुक्मिणीदेवीका 'दक्षिण-स्वभाव' भी विद्यमान है। श्रीराधाके वाम्यभावके विषय एकमात्र व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं, अन्य कोई नहीं- “गोपेन्द्रसुत बिना तेंहों ना स्पर्शे अन्यजन।” (मध्यलीला 8/286), इसलिये गौरलीलामें श्रीगदाधर कभी भी उनके स्वरूपगत 'वाम्यभाव'को प्रकाश नहीं करते हैं। गौरलीलामें उन श्रीकृष्णने स्वयं ही जब अपने विषयभावको त्यागकर श्रीराधा-भावका अवलम्बन किया है, तब वे गदाधररूपी श्रीराधाके वाम्यभावके विषय नहीं रहे। दूसरी बात, गौरलीलामें गदाधररूपमें स्वयं श्रीराधा ही श्रीकृष्णको अपने राधाभावका आस्वादन करवानेके लिये उनकी नित्य सङ्गिनी हैं, क्योंकि “शक्ति-शक्तिमत्तोरभेदः।” वहाँपर उनके द्वारा अपना वाम्य-स्वभाव प्रकट करनेपर श्रीगौरका प्रच्छन्न अवतारत्व न रहकर व्रजेन्द्रनन्दन-स्वरूप प्रकाशित हो जायेगा और इस कारण उनका राधाभाव आस्वादन भी असम्भव हो जायेगा। तीसरी बात, श्रीगदाधरने महाप्रभुको 'गौरनागर'-रूपमें स्थापित करनेका किसी प्रकारका प्रयास नहीं किया। चौथी बात, श्रीगदाधरने श्रीराधाभावयुक्त

230 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/140-144 ] तनु श्रीगौरचन्द्रके सदा वशीभूत-भावके प्रदर्शनके द्वारा श्रीराधादास्योचित-स्वभावकी प्रतिष्ठा की है। श्रीजगदानन्द प्रभु सत्यभामाके समान 'वाम्य-स्वभाव'युक्त होकर महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे ही उनके साथ प्रणयकलहमें आबद्ध रहते थे। यहाँपर श्रीजगदानन्दके 'वाम्य-स्वाभाव'के कारण उनको श्रीगदाधरकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननेका कारण नहीं है। अपितु कहा जा सकता है कि महाप्रभुके संन्यास-आश्रमोचित कठोर साधनको देखकर श्रीगदाधर ही उनके सत्यभामारूप-अवतार श्रीजगदानन्दके द्वारा प्रणयकलहके माध्यमसे महाप्रभुको अति कठोर साधनसे विरत रखते हैं॥ 140 ॥ महाप्रभुके प्रति श्रीगदाधरका स्वाभाविक ऐश्वर्य-भाव-मिश्रित स्निग्ध-प्रेम, नम्रतावशतः क्रोधका अभाव :- ताँर प्रणय-रोष देखिते प्रभुर इच्छा हय। ऐश्वर्य-ज्ञाने ताँर रोष नाहि उपजाय ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी कभी श्रीगदाधर पण्डितके प्रणय-रोषको देखनेकी इच्छा होती, किन्तु महाप्रभुके प्रति ऐश्वर्य-ज्ञान होनेके कारण उनमें रोष उत्पन्न नहीं होता था ॥ 141 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृतके पूः खः 7/119 श्लोकमें श्रीसनातन प्रभु- “सर्वा महिष्यः सह सत्यभामया भैष्म्यादयो द्रागभिसृत्य मूर्द्धभिः। पादौ गृहीत्वा रुदितार्द्रकाकुभिः संस्तुत्य भर्तारमशीश-मच्छनैः॥” [अर्थात् “श्रीउद्धवके सङ्केतके अनुसार श्रीरुक्मिणी आदि महिषियोंने श्रीसत्यभामा सहित प्रभु श्रीकृष्णके सम्मुख जाकर अपने-अपने मस्तकको उनके श्रीचरणकमलोंपर रख दिया और क्रन्दन करते हुए विनयपूर्वक वचनोंके द्वारा उन्हें धीरे-धीरे शान्त किया।”] द्वारकामें एक बार श्रीकृष्णके द्वारा श्रीरुक्मिणीको श्लेषपूर्वक (ऐसे वाक्य जिनके एकसे अधिक अर्थ हों) अन्य किसी गुणवान् पतिको ग्रहण करनेका उपदेश देनेपर रुक्मिणी भयभीत होकर दक्षिण-स्वभाववशतः उनके चरणोंमें गिर पड़ीं। गौरलीलामें श्रीजगदानन्द पण्डितगोस्वामी-वाम्य-स्वभावशाली प्रणयकलहशील सत्यभामाके भावयुक्त हैं और गदाधर पण्डितगोस्वामी- दक्षिण-स्वभावशाली रुक्मिणीकी भाँति प्रणय-कलहके स्थानपर आशङ्कित होकर सर्वदा महाप्रभुके आज्ञाकारी थे॥ 141 ॥ श्रीवल्लभके प्रति प्रीतिके उपलक्ष्यमें बाहरसे कृत्रिम क्रोध दिखलाकर श्रीगदाधरके प्रेमकी परीक्षा; श्रीगदाधरका भय :- एइ लक्ष्य पाना प्रभु कैला रोषाभास। शुनि' पण्डितेर चित्ते उपजिल त्रास ॥ 142 ॥ अनुवाद-[श्रीगदाधर पण्डितके द्वारा श्रीवल्लभ भट्टके प्रति प्रीति करनेकी बातसे] महाप्रभुको अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने श्रीगदाधर पण्डितके प्रति रोषाभास प्रदर्शित किया। महाप्रभुके रोषपूर्ण वचन सुनकर श्रीगदाधर पण्डितके हृदयमें बहुत भय उत्पन्न हुआ ॥ 142 ॥ द्वापरयुगमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका दृष्टान्त :- पूर्वे येन कृष्ण यदि उपहास कैल। शुनि' रुक्मिणीर मने त्रास उपजिल ॥ 143 ॥ अनुवाद-पहले कृष्णलीलामें जब श्रीकृष्णने श्रीरुक्मिणीके साथ उपहास किया था, तब उसे सुनकर श्रीरुक्मिणीके हृदयमें भी बहुत भय उत्पन्न हुआ था ॥ 143 ॥ श्रीवल्लभभट्टका पहले वात्सल्य-रसमें भजन :- वल्लभभट्टेरे हय वात्सल्य-उपासन। बालगोपाल-मन्त्रे तेंहो करेन सेवन ॥ 144 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट वात्सल्य रसमें उपासना करते थे। वे श्रीकृष्णकी बालगोपाल-मन्त्रसे उपासना करते थे ॥ 144 ॥

[ 7/145-154 सातवाँ अध्याय 231 श्रीगदाधरके सङ्गसे मधुररसमें भजन करनेकी प्रवृत्ति :- पण्डितेर सने तार मन फिरि' गेल। किशोरगोपाल-उपासनाय मन दिल ॥ 145 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके सङ्गसे श्रीवल्लभ भट्टका मन परिवर्तित हो गया और उन्होंने अपने मनको किशोरगोपालकी उपासनामें लगा दिया ॥ 145 ॥ श्रीगदाधरसे मन्त्र प्राप्तिकी अभिलाषा, श्रीगदाधरके द्वारा अस्वीकार करना :- पण्डितेर ठाञि चाहे मन्त्रादि शिखिते। पण्डित कहे,—“एइ कर्म नहे आमा हैते ॥ 146 ॥ श्रीगौराङ्ग ही जिनकी एकमात्र गति है, उन श्रीगदाधरकी श्रीगौर-वश्यता :- आमि—परतन्त्र, आमार प्रभु—गौरचन्द्र। ताँर आज्ञा बिना आमि ना हइ 'स्वतन्त्र' ॥ 147 ॥ श्रीवल्लभको मन्त्र-दानके विरुद्धमें युक्ति दिखलाना :- तुमि ये आमार ठाञि कर आगमन। ताहातेइ प्रभु मोरे देन ओलाहन ॥”148 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट श्रीगदाधर पण्डितसे किशोरगोपालकी उपासनाके मन्त्रकी दीक्षा लेना चाहते थे। किन्तु श्रीगदाधर पण्डितने श्रीवल्लभ भट्टसे कहा,–“यह कार्य मुझसे नहीं होगा। मैं परतन्त्र हूँ, मेरे प्रभु श्रीगौरचन्द्र हैं, उनकी आज्ञाके बिना मैं स्वतन्त्र रूपसे कुछ नहीं कर सकता हूँ। आप जो मेरे पास आते रहते हो, उसीके लिये महाप्रभु मुझे उलाहना देते हैं॥”146-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘ओलाहन,’—वाक्यदण्ड ॥ 148 ॥ अनुभाष्य—‘मन्त्रादि शिखितेँ,’—दीक्षा ग्रहण करने॥ 146 ॥ श्रीवल्लभको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :- एइमत भट्टेर कतेक दिन गेल। शेषे यदि प्रभु तारे सुप्रसन्न हैल ॥ 149 ॥ भिक्षाके दिन महाप्रभुके कृत्रिम क्रोधसे दुःखी श्रीगदाधरको महाप्रभुके द्वारा स्नेहसे प्रेमपूर्वक बुलाना :- निमन्त्रणेर दिने पण्डिते बोलाइला। स्वरूप, जगदानन्द, गोविन्दे पाठाइला ॥ 150 ॥ अनुवाद—इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत होनेपर जब अन्तमें महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके प्रति सुप्रसन्न हुए, तब श्रीवल्लभ भट्टके निमन्त्रणके दिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीगोविन्दको भेजकर श्रीगदाधर पण्डितको बुलवाया ॥ 149-150 ॥ श्रीपण्डितको श्रीस्वरूपके द्वारा सान्त्वना प्रदान और सारा वृत्तान्त बतलाना :- पथे पण्डितेरे स्वरूप कहेन वचन। “परीक्षिते प्रभु तोमारे कैला उपेक्षण ॥ 151 ॥ श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीगदाधरकी प्रतिवाद करनेकी उत्तेजना-चेष्टाके द्वारा परीक्षा :- तुमि केने आसि' ताँरे ना दिला ओलाहन? भीतप्राय हञा केने करिला सहन??”152 ॥ अनुवाद—मार्गमें श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीगदाधर पण्डितसे कहा,–“महाप्रभुने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये ही तुम्हारी उपेक्षा की थी। किन्तु तुमने आकर उनकी बातका प्रतिवाद करते हुए उलाहना क्यों नहीं दिया? कायर बनकर तुमने उनके अत्याचारको सहन क्यों कर लिया?”151-152 ॥ महाप्रभुके प्रेममें स्निग्ध श्रीपण्डितकी ऐश्वर्यज्ञानमयी वश्यता :- पण्डित कहेन,—“प्रभु सर्वज्ञ-शिरोमणि। ताँर सने ‘हठ’ करि,—भाल नाहि मानि ॥ 153 ॥ श्रीपण्डितकी अपने प्रियतम महाप्रभुके सब प्रकारके स्नेहरूपी अत्याचारको सहन करनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति :- येइ कहे, सेइ सहि निज-शिर धरिं। आपने करिबेन कृपा गुण-दोष विचारिं ॥”154 ॥

232 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/153-162 ] अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितने कहा, - "महाप्रभु तो सर्वज्ञ शिरोमणि हैं। मैं उनके साथ किसी भी प्रकारके हठ करनेको अच्छा नहीं समझता। वे जो कुछ भी कहते हैं, मैं उसे नतमस्तक होकर सहन करता हूँ। वे स्वयं मेरे गुणों और दोषोंका विचार करके मुझपर कृपा करेंगे॥" 153-154॥ श्रीपण्डितका महाप्रभुके निकट आगमन और क्रन्दन :- एत बलि' पण्डित प्रभुर स्थाने आइला। रोदन करिया प्रभुर चरणे पड़िला ॥ 155 ॥ अनुवाद-यह कहकर श्रीगदाधर पण्डित महाप्रभुके स्थानपर पहुँचे और वे रोते हुए महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े॥ 155॥ श्रीपण्डितके प्रेमके वशीभूत महाप्रभुके द्वारा स्नेह-प्रेमपूर्वक श्रीगदाधरका आलिङ्गन और आश्वासन :- ईषत् हासिया प्रभु कैला आलिङ्गन। सबारे शुनाञा कहेन मधुर वचन ॥ 156 ॥ स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीगदाधरके अतुलनीय स्निग्ध सुदृढ़ गौरप्रेमका वर्णन :- “आमि चालाइलुँ तोमा, तुमि ना चलिला। क्रोधे किछु ना कहिला, सकल सहिला ॥ 157 ॥ आमार भङ्गीते तोमार मन ना चलिला। सुदृढ़ सरलभावे आमारे किनिला ॥ " 158 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए श्रीगदाधर पण्डितका आलिङ्गन किया और सभीको सुनाते हुए उन्होंने मधुर वचन कहे, - "हे गदाधर ! मैं तुम्हें रोषपूर्ण व्यवहारके द्वारा उत्तेजित करना चाहता था, किन्तु तुम उत्तेजित नहीं हुए। तुमने क्रोधमें कुछ भी नहीं कहा, अपितु सब कुछ सहन कर लिया। मेरी इस चालके द्वारा भी तुम्हारा मन विचलित नहीं हुआ और तुम अपने इसी सरल भावमें सुदृढ़ रहे। इसी भावसे तुमने मुझे खरीद लिया है॥ " 156-158॥ अनुभाष्य- 'चालाइलुँ', - रोषपूर्ण व्यवहार प्रदर्शित किया ॥ 157 ॥ महाप्रभुका “गदाधर-प्राणनाथ"-नाम :- पण्डितेर भाव-मुद्रा कहन ना याय। 'गदाधर-प्राणनाथ' नाम हैल याय ॥ 159 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके भाव और उनके उपलक्षणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिये महाप्रभुका अन्य नाम 'गदाधर-प्राणनाथ' है॥ 159 ॥ भक्तोंके द्वारा नित्य 'गदाइ-गौराङ्ग' नामका गान :- पण्डिते प्रभुर प्रसाद कहन ना याय। 'गदाइ-गौराङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय ॥ 160 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डितके प्रति महाप्रभुकी कृपाका वर्णन नहीं किया जा सकता। लोग महाप्रभुको 'गदाइ-गौराङ्ग' अर्थात् 'गदाधरके गौराङ्ग' कहकर पुकारते हैं॥ 160 ॥ अचिन्त्य चैतन्यलीलासिन्धुकी प्रत्येक-तरङ्गमें अनेक उद्देश्योंका सम्पादन :- चैतन्यप्रभुर लीला के बुझिते पारे? एकलीलाय बहे गङ्गार शत शत धारे ॥ 161 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंको कौन समझ सकता है? उनकी एक-एक लीलामें गङ्गाकी भाँति सैकड़ों-सैकड़ों धाराएँ बहती हैं ॥ 161 ॥ महाप्रभुके द्वारा-(1) श्रीपण्डितके गौरप्रेमका प्रचार, (2) श्रीवल्लभका गर्वनाश और उद्धार, (3) अक्षजज्ञानी जीवकी बाहरीरूपसे उपेक्षा ही उसके प्रति अधोक्षज-कृपा एवं (4) वैसे दुःखरूपी दण्डको भगवान्की कृपा माननेमें ही जीवके नित्यमङ्गल और बुद्धिमत्ताका प्रचार :- पण्डितेर सौजन्य, ब्रह्मण्यता-गुण। दृढ़ प्रेममुद्रा लोके करिला क्षेपण ॥ 162 ॥ अनुवाद-उपरोक्त लीलाके माध्यमसे महाप्रभुने श्रीगदाधर पण्डितकी सज्जनता, उनके ब्राह्मणोचित गुणों, दृढ़ प्रेम

[ 7/162-168 सातवाँ अध्याय 233 और उपलक्षणोंको समस्त भक्तोंके निकट प्रकाशित किया ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'लोके करिला क्षेपण',— समस्त भक्तोंके निकट महाप्रभुने विस्तार किया ॥ 162 ॥ सातवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अभिमान-पङ्क धुञा भट्टेरे शोधिला। सेइद्वारा आर सब लोके शिखाइला ॥ 163 ॥ अनुवाद—इसी लीलाके द्वारा महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टके अभिमानरूपी कीचड़को धोकर उन्हें शुद्ध किया। उन्हींके माध्यमसे अन्य सभी लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 163 ॥ बाह्यद्रष्टा बाहरी अर्थको माननेवालेका ही अधःपतन :— अन्तरे 'अनुग्रह', बाह्ये 'उपेक्षार प्राय'। बाह्यार्थ येइ लय, सेइ नाश याय ॥ 164 ॥ अनुवाद—वास्तवमें महाप्रभुके हृदयमें तो श्रीवल्लभ भट्ट और श्रीगदाधर पण्डितके प्रति कृपा थी, किन्तु उन्होंने बाहरमें उनके प्रति कुछ उपेक्षा जैसा भाव प्रदर्शित किया। जो केवल महाप्रभुके बाहरी आचरणको ही ग्रहण करता है, वास्तविक तथ्यमें प्रवेश नहीं कर पानेके कारण वह अपराध करके पतित हो जाता है॥ 164 ॥ अनुभाष्य—श्रीवल्लभ भट्टके मङ्गलाकाङ्क्षी होकर परमदयालु पतितपावन महाप्रभुने बाहरी रूपसे उनकी उपेक्षा करके उनके पण्डित-वैष्णव-अभिमानका शोधन किया; गदाधर पण्डितके द्वारा श्रीवल्लभका सम्पूर्ण रूपसे त्याग नहीं करनेपर महाप्रभुने कुछ दिनोंके लिये गदाधरके प्रति भी उपेक्षा प्रदर्शित की; वास्तविकरूपमें महाप्रभु कभी भी अपने स्वरूप-शक्ति-विग्रह श्रील गदाधरके प्रति अप्रसन्न-चित्त नहीं हुए, हो भी नहीं सकते। जो इस लीलाके निगूढ़ भावको समझनेमें असमर्थ होंगे, वे बाहरी बातोंको लेकर व्यस्त रहनेके कारण, वास्तविक अर्थको नहीं समझकर श्रीगदाधरके श्रीचरणोंमें श्रद्धाहीन होकर नरकगामी होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ 164 ॥ सातवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। श्रीचैतन्यके प्रति अचला भक्ति ही चैतन्यलीला-तत्त्वको जाननेका कारण :— निगूढ़ चैतन्यलीला बुझिते कां'र शक्ति? सेइ बुझे, गौरचन्द्रे याँर दृढ़ भक्ति ॥ 165 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी निगूढ़ लीलाको समझनेकी शक्ति किसमें है? इन लीलाओंको तो केवल वही समझ सकता है जिसकी श्रीगौरचन्द्रके प्रति दृढ़ भक्ति है ॥ 165 ॥ श्रीगदाधरके द्वारा सपरिकर महाप्रभुको भिक्षा-प्रदान :— दिनान्तरे पण्डित कैल प्रभुर निमन्त्रण। प्रभु ताँहा भिक्षा कैल लञा भक्तगण ॥ 166 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितने भी अन्य एक दिन महाप्रभुको निमन्त्रण किया। महाप्रभुने अपने भक्तों सहित श्रीगदाधर पण्डितके वासस्थानपर प्रसाद ग्रहण किया ॥ 166 ॥ वहींपर श्रीगदाधरसे श्रीवल्लभके द्वारा मधुररसमें किशोर-गोपाल-मन्त्रमें दीक्षा-प्राप्ति :— ताँहाइ वल्लभ-भट्ट प्रभुर आज्ञा लैल। पण्डित-ठाञि पूर्व-प्रार्थित सब सिद्धि हैल ॥ 167 ॥ अनुवाद—वहीं श्रीवल्लभ भट्टने महाप्रभुसे आज्ञा ली और उनकी श्रीगदाधर पण्डितसे दीक्षा ग्रहण करनेकी पूर्व प्रार्थना सफल हुई ॥ 167 ॥ श्रीगदाधर-श्रीवल्लभके मिलनसे गौर-प्रीतिकी प्राप्ति :— एइ त' कहिलुँ वल्लभ-भट्टेरे मिलन। याहार श्रवणे पाय गौरप्रेमधन ॥ 168 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने महाप्रभुका श्रीवल्लभ

234 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/168-169 ] भट्टसे मिलनका वर्णन किया, जिसके श्रवणसे गौरप्रेमरूपी अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी धनकी प्राप्ति होती है॥ 168 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 169 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 169 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे वल्लभभट्टमिलनं नाम श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें वल्लभभट्टमिलन नामक सप्तमः परिच्छेदः। सातवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

आठवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें रामचन्द्रपुरीका इतिहास वर्णित हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेपर भी उन्होंने शुष्कज्ञानियोंके सम्प्रदायके सङ्गसे दूषित सिद्धान्तको लेकर अधर्मका उपदेश दिया था। उसीके कारण पुरी-गोसांईने उन्हें 'अपराधी' कहकर उनका त्याग किया; तबसे दूसरोंकी निन्दा, दूसरोंके दोषोंका अनुसन्धान, शुष्कज्ञानका उपदेश, —इन समस्त कार्योंको करनेके कारण वे वैष्णवोंके द्वारा उपेक्षित हुए। इसके उपरान्त महाप्रभुके भोजन आदिकी निन्दा करनेपर भी महाप्रभुने उन्हें गुरु-सम्बन्ध-बुद्धिके कारण कुछ भी नहीं कहकर मौन रूपसे केवलमात्र (अपने भोजन) प्रसाद-अन्नको सङ्कुचित (कम) कर दिया। रामचन्द्रपुरीके पुरुषोत्तमसे चले जानेपर महाप्रभुने उस सङ्कोचको दूर कर दिया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) रामचन्द्रपुरीके भयसे भिक्षा ग्रहण करनेमें सङ्कोच करनेवाले महाप्रभुकी वन्दना :— तं वन्दे कृष्णचैतन्यं रामचन्द्रपुरीभयात्। लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं समकोचयत्॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने रामचन्द्रपुरीके भयसे प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (कृष्णचैतन्यदेवः) रामचन्द्रपुरीभयात् (रामचन्द्रपुरीत्याख्य- हरिगुरुवैष्णवनिन्दकवाक्यजन्यलौकिकाशङ्काप्रदर्शनात्) लौकिकाहारतः (लोकदर्शन-परिमित-भोज्यान्नात्) स्वं (निजं) भिक्षान्नं (भोजनपरिमाणं युक्ताहार्यम् अपि) समकोचयत् (खर्वीचकार) तं कृष्णचैतन्यम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने हरि-गुरु-वैष्णव निन्दक रामचन्द्रपुरीके वाक्यसे लौकिक आशङ्का प्रदर्शन करनेके लिये प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य करुणासिन्धु-अवतार। ब्रह्मा-शिवादिक भजे चरण याँहार ॥ 2 ॥ अनुवाद—करुणासिन्धु-अवतार श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो जिनके चरणकमलोंका श्रीब्रह्मा-शिव आदि भी भजन करते हैं॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु—याँर प्राणधन ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जिनके प्राणधन हैं, उन श्रीवास पण्डितादि समस्त भक्तोंकी जय हो, जय हो॥ 3 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें, — “जय जय अवधूतचन्द्र नित्यानन्द। जगत् बाधिल येंहो दिया प्रेम फाँद॥ जय जय श्रीअद्वैत ईश्वर-अवतार। कृष्ण अवतारि' कैला जगत् निस्तार ॥” [अर्थात् “अवधूतचन्द्र उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो, जिन्होंने प्रेमरूपी डोरीके द्वारा समस्त जगत्वासियोंको बाँध दिया। ईश्वरके अवतार उन श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो, जिन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाके जगत्का उद्धार कर दिया।”] ॥ 3 ॥ नीलाचलमें भक्तोंके साथ श्रीगौरचन्द्रकी लीला :— एइमत गौरचन्द्र निजभक्त-सङ्गे। नीलाचले क्रीड़ा करे कृष्णप्रेमरङ्गे ॥ 4 ॥

236 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/4-7 ] अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र अपने भक्तोंके साथ कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें नीलाचलमें लीलाएँ कर रहे थे॥4॥ रामचन्द्रपुरीका आगमन :- हेनकाले रामचन्द्रपुरी-गोसाञि आइला। परमानन्द-पुरीरे आर प्रभुरे मिलिला॥5॥ अनुवाद—तब रामचन्द्रपुरी गोसाईं नीलाचलमें आये और वे श्रीपरमानन्द पुरी और महाप्रभुसे मिले॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रामचन्द्रपुरी',—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेके कारण महाप्रभु और श्रीपरमानन्दपुरीने इनका सम्मान किया था॥5॥ अमृताणुकणा—श्रीगौरगणोद्देश दीपिका (92)में श्रीरामचन्द्रपुरीके सम्बन्धमें कहा गया है,— “विभीषणो यः प्रागासीद्रामचन्द्रपुरी स्मृतः। जटिला राधिका-श्वश्रूः कार्यतोऽविशदेव तम्। अतो महाप्रभुर्भिक्षासङ्कोचादि ततोऽकरोत् ॥ ” “जो पहले विभीषण थे, वे गौरलीलामें रामचन्द्रपुरीके नामसे विख्यात हैं। श्रीराधाकी सास 'जटिला'ने कार्यवशतः उनमें प्रवेश किया था, इसलिये ही महाप्रभुने उनके भयसे भिक्षामें सङ्कोचादि किया।” श्रीमन्महाप्रभु वाराणसीमें दो मास रहनेके समय श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें कुछ समयके लिये छिपे थे। (चैतन्यभागवत मध्यखण्ड 19/05में)— “रामचन्द्रपुरीर मठेते लुकाइया। रहिलेन दुइमास वाराणसी गिया।” श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपादने यह 'गौड़ीय भाष्य'में जनाया है,—“श्रीगौरसुन्दर वाराणसीमें श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे थे। श्रीचैतन्यभागवतके लेखक ठाकुर वृन्दावन श्रीमन्महाप्रभुके श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें छिपे रहनेकी बातसे अवगत थे। रामचन्द्रपुरी माधवेन्द्रपुरीके एक कपट शिष्य थे, उनका मायावादके प्रति बहुत आग्रह था। लोगोंमें श्रीमन्महाप्रभुने प्रचार किया कि वे रामचन्द्रपुरीके मठमें रहते हैं, परन्तु वे कृष्णभक्तोंके साथ कहीं और रहे। रामचन्द्रपुरी साम्प्रदायिक संन्यासी थे, इसलिये यति-जीवनमें उस मठमें रहनेपर बाहरके लोगोंको उनपर दोषारोपण करनेका अवसर नहीं था॥5॥ श्रीपरमानन्दपुरी और महाप्रभुके द्वारा रामचन्द्रपुरीको यथोचित पदमर्यादा देना :- परमानन्दपुरी कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि कैल ताँरे दृढ़ आलिङ्गन॥6॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरीने रामचन्द्रपुरीके चरणोंकी वन्दना की और रामचन्द्रपुरी गोसाईंने उन्हें दृढ़ आलिङ्गन किया॥6॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी स्वभावसे ईर्ष्यालु और हरि-गुरु-वैष्णव विरोधी होनेपर भी वे बाहरी दृष्टिकोणसे गृहत्यागी अथवा संन्यासीके वेषधारी होनेके कारण ही लोकसमाजमें उस समय 'गोसाईं' (गोस्वामी) नामसे जाने जाते थे। आजकल समाजमें प्रचलित विकृत प्रथाकी भाँति उस समय जाति, कुल अथवा वंशपरम्परामें (गृहस्थोंके लिये) गृहत्यागी व्यक्तियोंकी यह (गोस्वामी) उपाधि व्यवहृत नहीं होती थी, उसका प्रमाण यहाँपर मिलता है॥5-6॥ वैष्णव-संन्यासियोंका साम्प्रदायिक व्यवहार :- महाप्रभु कैला ताँरे दण्डवत् नति। आलिङ्गन करि' तेंहो कैल कृष्णस्मृति॥7॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको दण्डवत् प्रणाम किया और रामचन्द्रपुरीने श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए उन्हें आलिङ्गन किया॥7॥ अनुभाष्य—महाप्रभुको ईश्वरपुरीका अनुगत जानकर आलिङ्गन करके वैष्णव-संन्यासी मात्रके ही योग्य- सम्भाषण 'कृष्ण'को स्मरण किया। संन्यासियोंका अभिवादन करनेपर संन्यासी 'ॐ नमो भगवते नारायणाय' कहकर कृष्णका स्मरण करते हैं। संन्यासियोंके लिये जीवको आशीर्वाद और नमस्कार करनेकी विधि नहीं है; स्मृति

[ 8/7-16 आठवाँ अध्याय 237

कहती हैं,—'संन्यासी—निराशीर्निर्नमष्क्रियः।'॥ 7॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा भिक्षा-दान :— तिनजने इष्टगोष्ठी कैला कतक्षण। जगदानन्द-पण्डित ताँरे कैला निमन्त्रण॥ 8॥ अनुवाद—तीनोंने कुछ समय तक इष्ट-गोष्ठी की और तब श्रीजगदानन्द पण्डितने रामचन्द्रपुरीको भोजनके लिये निमन्त्रण किया॥ 8॥ स्वयं आवश्यकतासे अधिक भोजन करनेके बाद भिक्षा करानेवाले अथवा परिवेशण करनेवालेकी निन्दा :— जगन्नाथेर प्रसाद आनिला भिक्षार लागिया। यथेष्ठ भिक्षा करिला तेंहो निन्दार लागिया॥ 9॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित रामचन्द्रपुरीको भोजन करानेके लिये श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लेकर आये, रामचन्द्रपुरीने निन्दा करनेके उद्देश्यसे बहुत भोजन किया॥ 9॥ स्वयं श्रीजगदानन्दको प्रचुर भोजन करवाकर 'अत्याहारी' जानकर गौरगणोंकी निन्दा :— भिक्षा करि' कहे पुरी,—“शुन जगदानन्द। अवशेष प्रसाद तुमि करह भक्षण॥”10॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् रामचन्द्रपुरीने कहा,—“हे जगदानन्द, सुनो! तुम बचे हुए प्रसादको खा लो॥”10॥ आग्रह करिया ताँरे बसि' खाओयाइल। आपने आग्रह करि' परिवेशन कैल॥ 11॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीने आग्रह करके श्रीजगदानन्द पण्डितको खानेके लिये बैठाया और स्वयं ही बहुत आग्रह करके प्रसाद परोसा॥ 11॥ आग्रह करिया पुनः पुनः खाओयाइल। आचमन करि निन्दा करिते लागिल॥ 12॥

वास्तविक शुद्धवैराग्यवान् गौरभक्तोंको वैराग्यहीन समझकर उनकी निन्दा :— “शुनि, चैतन्यगण करे बहुत भक्षण। 'सत्य' सेइ वाक्य,—साक्षात् देखिलुँ एखन॥ 13॥ संन्यासीरे एत खाओयाञा करे धर्मनाश। वैरागी हञा एत खाय, वैराग्येर नाहि 'भास'॥”14॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी आग्रह करके उनको बार बार खिलाते रहे और जैसे ही श्रीजगदानन्द पण्डितने आचमन किया, रामचन्द्रपुरी उनकी निन्दा करने लगे,—“मैंने सुना था कि चैतन्य महाप्रभुके अनुयायी बहुत अधिक खाते हैं। आज मैंने साक्षात् रूपसे देख लिया कि वह बात सत्य ही है। और वे संन्यासियोंको भी इतना अधिक खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करवाते हैं। वे स्वयं वैरागी होकर इतना अधिक खाते हैं, उनमें तो वैराग्यका आभासमात्र भी नहीं है।”12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'भास',—आभासमात्र भी॥ 14॥ रामचन्द्रपुरीका स्वभाव :— एइ त' स्वभाव ताँर आग्रह करिया। पिछे निन्दा करे, आगे बहुत खाओयाञा॥ 15॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका स्वभाव ही ऐसा था कि वे पहले तो बहुत आग्रह करके खिलाते और बादमें निन्दा करते॥ 15॥ गुरुके द्वारा त्यक्त रामचन्द्रपुरीके पूर्व वृत्तान्तका वर्णन; गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रपुरीके अप्रकट होनेके समय रामचन्द्रका आगमन :— पूर्वे यबे माधवेन्द्रपुरी करेन अन्तर्धान। रामचन्द्रपुरी तबे आइला ताँर स्थान॥ 16॥ अनुवाद—पूर्वकालमें जब श्रीमाधवेन्द्रपुरी अन्तर्धान लीला कर रहे थे, तब रामचन्द्रपुरी उनकी भजनस्थलीपर आये थे॥ 16॥

238 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/17-24 ] श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अप्राकृत विप्रलम्भरसमें कृष्णकीर्तन :— पुरी-गोसाञि करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन। ‘मथुरा ना पाइनु’ बलि’ करेन क्रन्दन॥17॥ अनुवाद—उस समय श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोसाईं कृष्णनाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे और कभी कभी ‘मुझे मथुराका आश्रय नहीं प्राप्त हुआ’ कहकर क्रन्दन कर रहे थे॥17॥ शुष्कज्ञानी रामचन्द्रका मर्त्यबुद्धिसे गुरु-मर्यादा-लङ्घन :— रामचन्द्रपुरी तबे उपदेशे ताँरे। शिष्य हञा गुरुके कहे, भय नाहि करे॥18॥ रामचन्द्रके द्वारा चिद्विलासका विरोध :— “तुमि—पूर्ण-ब्रह्मानन्द, करह स्मरण। ब्रह्मवित् हञा केने करह रोदन??”19॥ अनुवाद—उस समय रामचन्द्रपुरी शिष्य होकर गुरुको उपदेश देनेमें भी कोई भय नहीं करके उनको उपदेश देते कहने लगे,—“आप पूर्ण ब्रह्मानन्दमें हैं, ब्रह्मका स्मरण कीजिये, आप ब्रह्मको जाननेवाले होनेपर भी रो क्यों रहे हैं?”18-19॥ गुरु माधवेन्द्रपुरीके द्वारा रामचन्द्रको अपराधी मानकर क्रोधसे भरकर उसकी उपेक्षा और भर्त्सना :— शुनि’ माधवेन्द्र-मने क्रोध उपजिल। “दूर दूर, पापी” बलि’ भर्त्सना करिल॥20॥ “कृष्णकृपा ना पाइनु, ना पाइनु ‘मथुरा’। आपन-दुःखे मरौं,—एइ दिते आइल ज्वाला॥21॥ मोरे मुख ना देखाबि तुइ, याउ यथि-तथि। तोरे देखि’ मैले मोर हबे असद्गति॥22॥ कृष्ण ना पाइनु, मरौं आपनार दुःखे। मोरे ‘ब्रह्म’ उपदेशे एइ छार मूर्खे॥”23॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीमाधवेन्द्र पुरीके मनमें बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ और “दूर हो जा, दूर हो जा, पापी” कहकर उसकी भर्त्सना की तथा कहा,—“मैं श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त नहीं कर पाया, मैं मथुराको प्राप्त नहीं कर पाया—एक तो मैं अपने ऐसे ही दुःखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे तू मुझे जलानेके लिये आ गया है। मुझे अपना मुख मत दिखला। तेरी जहाँ इच्छा हो, तू वहाँ चला जा। तुझे देखकर मरनेसे मेरी असद्गति होगी। मैं श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण मर रहा हूँ, इसलिये मैं दुःखी हूँ और यह दुष्ट मूर्ख मुझे ब्रह्मका उपदेश दे रहा है॥”20-23॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी अपने गुरु श्रीमाधवेन्द्रको श्रीकृष्ण-विरह-कातर देखकर भी उनकी अप्राकृत विप्रलम्भ स्फूर्त्तिको समझनेमें असमर्थ हुए। उन्होंने लौकिक-विचारके अनुसार श्रीमाधवेन्द्रपुरीको साधारण मरणशील व्यक्ति मानकर उन्हें सांसारिक अभावके लिये शोकसे कातर समझा। इसलिये वे उन्हें निर्विशेष-ब्रह्मकी अनुभूति करानेमें लग गये। उनके ऐसा करनेसे श्रीमाधवेन्द्रपुरी अपने शिष्यकी मूर्खता और गुरु-अवज्ञाको समझकर उसके मङ्गलकी आकाङ्क्षासे उदासीन हो गये और उसे त्यागकर निकाल दिया॥20॥ गुरु-अवज्ञारूपी अपराधके कारण विषयभोग अथवा संसार-वासना :— एइ ये श्रीमाधवेन्द्र उपेक्षा करिल। सेइ अपराधे इँहार ‘वासना’ जन्मिल॥24॥ अनुवाद—गुरुमें मर्त्यबुद्धिरूपी अपराधके कारण श्रीमाधवेन्द्रपुरीने रामचन्द्रपुरीकी जो उपेक्षा की, उसी अपराधके फलस्वरूप उनमें संसार-वासना उत्पन्न हुई॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासना’,—शुष्क ज्ञान-वासना, उसके कारण भक्तोंकी निन्दा॥24॥ अनुभाष्य—इस विषयमें भक्तिसन्दर्भ (111 संख्या)में ‘वासनाभाष्य’ धृत भगवान्‌के परिशिष्ट वचन— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” अथवा भाः 10/2/32 श्लोककी श्रीजीवगोस्वामिकृत

[ 8/24-30 आठवाँ अध्याय 239 लघुतोषणी टीकामें इस वासनाभाष्य-धृत भगवत्-परिशिष्टका ही पाठान्तरमें,— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्बन्धनं यान्ति कर्मभिः। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” [अर्थात् “अचिन्त्य महाशक्ति सम्पन्न श्रीभगवान्के निकट अपराध होनेपर जीवन्मुक्त व्यक्ति भी पुनः संसारवासनाको प्राप्त होते हैं (पाठान्तरमें—कर्मके द्वारा पुनः बन्धनको प्राप्त होते हैं)।”] एवं रथयात्रा प्रसङ्गमें श्रीविष्णुभक्तिचन्द्रोदयमें उद्धृत पुराणान्तर-वचन आदि शास्त्र-वचन देखें— “जीवन्मुक्ताः प्रपद्यन्ते क्वचित् संसारवासनाम्। योगिनो न विलिप्यन्ते कर्मभिर्भगवत्पराः॥” [अर्थात् “जीवन्मुक्त भी कभी-कभी संसार-वासनाको प्राप्त होते हैं, किन्तु भगवत्-परायण एकान्तिक योगी कभी भी कर्मवासनामें लिप्त नहीं होते।”] ॥ २४ ॥ श्रीकृष्ण-कृष्णभक्त अथवा स्वरूप-तद्रूपवैभवादि चिद्विलास-दर्शनविहीन विष्णुनिन्दा आरम्भ :- शुष्क-ब्रह्मेते नाहि कृष्णेर 'सम्बन्ध'। सर्व-लोक निन्दा करे, निन्दाते निर्बन्ध ॥ २५ ॥ अनुवाद—शुष्क ब्रह्मज्ञानीका श्रीकृष्णसे कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसलिये रामचन्द्रपुरीकी निष्ठाके साथ सभी लोगोंकी निन्दामें आसक्ति थी ॥ २५ ॥ अनुभाष्य—‘निर्बन्ध’,—निष्ठाके साथ परनिन्दामें आसक्ति। निर्विशेष मायावादी लोग सम्बन्धज्ञानमें कुशल नहीं होनेके कारण कृष्णसे सम्बन्धको ग्रहण नहीं कर पाते। वे जड़ीय-वितर्कके बलपर ब्रह्मके विषयमें जड़ीय तर्क प्रयोग करते हैं। वे कृष्णभक्तिको मोक्ष-साधकके फलभोग-पिपासा-मूलक कर्मकाण्डके अन्तर्गत अन्य एक कार्य समझते हैं। वे भगवद्भक्तको और उनके अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनको चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) प्रदान करनेवाला कर्मसाधनमात्र जानकर उनकी निन्दा करते हैं। अधोक्षज गुरु अथवा भक्तोंके चरणोंमें अपराध होनेपर ही जीव ऐसे भयानक अज्ञानमें पतित होते हैं ॥ २५ ॥ श्रील ईश्वरपुरीकी एकान्तिकी गुरुभक्ति :- ईश्वरपुरी करे श्रीपाद-सेवन। स्वहस्ते करेन मलमूत्रादि मार्जन ॥ २६ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा करते थे, वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्र आदिको साफ कर देते थे ॥ २६ ॥ अनुभाष्य—‘श्रीपाद-सेवन’,—श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा ॥ २६ ॥ आदर्श गुरु-सेवाका उदाहरण :- निरन्तर कृष्णनाम करये स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला शुनाय अनुक्षण ॥ २७ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीको निरन्तर कृष्णनामका स्मरण कराते और उन्हें प्रतिक्षण कृष्णनाम तथा कृष्णलीला श्रवण कराते थे ॥ २७ ॥ श्रीईश्वरपुरीको गुरुकृपाकी प्राप्ति :- तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैला आलिङ्गन। वर दिला,—“कृष्णे तोमार हउक प्रेमधन ॥”२८ ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने सन्तुष्ट होकर श्रीईश्वरपुरीको आलिङ्गन किया और उन्हें वरदान देते हुए कहा,—“तुम्हें श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति हो ॥”२८ ॥ गुरुसे एकको कृपारूपी लाभके फल, दूसरेको वञ्चना प्राप्तिके फलमें तारतम्य :- सेइ हैते ईश्वरपुरी—'प्रेमेर सागर'। रामचन्द्रपुरी हैल सर्वनिन्दाकर ॥ २९ ॥ हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपा और दण्ड प्राप्तिके दो दृष्टान्तोंके द्वारा लोगोंको शिक्षा :- महदनुग्रह-निग्रहेर साक्षी दुइजने। एइ दुइद्वारे शिखाइला जगजने ॥ ३० ॥ अनुवाद—तभीसे श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' बन

240 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/29-37 ] गये और रामचन्द्रपुरी सबकी निन्दा करनेवाले बन गये। इस प्रकार ये दोनों क्रमशः महान् व्यक्तिके अनुग्रह और दण्डके पात्र होनेके साक्षी हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इन दोनोंके माध्यमसे जगत्वासियोंको शिक्षा प्रदान की॥29-30॥ अनुभाष्य—महात्मा श्रील माधवेन्द्रपुरीसे श्रीईश्वरपुरीने प्रचुर कृपा प्राप्त की थी और रामचन्द्रपुरीको केवल मात्र निग्रह (दण्ड) प्राप्त हुआ॥30॥ अप्राकृत विप्रलम्भ-अवस्थामें श्रीमाधवेन्द्र गोस्वामीका अप्राकट्य :- जगद्गुरु माधवेन्द्र करि' प्रेमदान। एइ श्लोक पड़ि' तेंहो कैल अन्तर्धान॥३१॥ अनुवाद—जगद्गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जगत्में कृष्णप्रेमका दान किया। निम्नलिखित श्लोकका पाठ करते हुए उन्होंने अन्तर्धान लीला प्रकाशित की॥31॥ पद्यावली 330 अङ्कमें उद्धृत श्रीमाधवेन्द्रपुरी-वचन— अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥३२॥ अनुवाद—ओहे दीनदयार्द्रनाथ! ओहे मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन करूँगी? तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा कातर हृदय अस्थिर हो गया है। हे दयित (प्रियतम)! अब मैं क्या करूँ?32॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 4/197 संख्या देखें॥32॥ श्लोकका मर्मार्थ अथवा तात्पर्य-व्याख्या :- एइ त' श्लोके कृष्णप्रेम करे उपदेश। कृष्णेर विरह, भक्तेर भावविशेष॥३३॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कृष्णप्रेम कैसे प्राप्त किया जाय इसका उपदेश दिया है। श्रीकृष्णके विरहमें भक्तोंके चित्तमें विप्रलम्भ-भावकी स्फूर्ति ही कृष्णप्रेम प्राप्तिका उपाय है॥३३॥ अनुभाष्य—'भावविशेष'—विप्रलम्भ-भावस्फूर्ति; प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें सम्भोगके नामपर साधकोंमें अनेक प्रकारके उपद्रव आकर विप्रलम्भके स्वरूपकी अनुभूतिमें बाधा उत्पन्न करते हैं॥३३॥ श्रीमाधवेन्द्र-कृष्णप्रेमकल्पवृक्षके अङ्कुर, श्रीचैतन्य स्वयं अङ्कुरसे प्रस्फुटित परिवर्धित मूल-वृक्ष :- पृथिवीते रोपण करि' गेला प्रेमाङ्कुर। सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष—चैतन्यठाकुर॥३४॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरी पृथ्वीपर प्रेमका अङ्कुर रोपित कर गये, उसी प्रेमके अङ्कुरसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूपी वृक्ष प्रकाशित हुआ॥34॥ श्रीमाधवेन्द्रके अन्तर्धानके श्रवणसे जीवको श्रीकृष्णविरहसे उत्पन्न सेवाकी शिक्षा :- प्रस्तावे कहिलुँ पुरी-गोसाञिर निर्याण। येइ इहा शुने, सेइ बड़ भाग्यवान्॥३५॥ अनुवाद—मैंने प्रसङ्गवशतः श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीकी अप्रकट लीलाका वर्णन किया है। जो भी इसका श्रवण करता है, वह बड़ा भाग्यवान् है॥35॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्याण'—अप्रकट॥३५॥ रामचन्द्रपुरीका शुष्क-वैराग्य :- रामचन्द्रपुरी ऐछे रहिला नीलाचले। विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले॥३६॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी इस प्रकार श्रीनीलाचलमें रहने लगे। वे विरक्त स्वभावके थे, इसलिये वे कभी किसी एक स्थानपर रहते और कभी किसी अन्य स्थानपर चले जाते॥36॥ दूसरोंके दोषोंको ढूँढ़नेवाले रामचन्द्रपुरी :- अनिमन्त्रण भिक्षा करे, नाहिक निर्णय। अन्येर भिक्षार स्थितिर लयेन निश्चय॥३७॥

[ 8/37-44 आठवाँ अध्याय 241 अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका कुछ भी निर्धारित नहीं अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके रहन-सहन, उनकी होता था कि वे कहाँ भोजन करेंगे, वे बिना निमन्त्रणके भजनकी रीति, उनके भोजन, शयन और आवागमन ही भोजन करनेके लिये पहुँच जाते थे। किन्तु आदि समस्त विषयका अनुसन्धान करते रहते॥40॥ अन्यान्य भक्त लोग कहाँ और कितना भोजन करते हैं, वे उस विषयमें पूरी जानकारी रखते थे॥37॥ अधोक्षज स्वयं भगवान् पूर्ण और निर्दोष :— प्रभुर यतेक गुण स्पर्शितॆ नारिल। अमृतप्रवाह भाष्य—'अन्येर भिक्षार स्थिति',—अन्य छिद्र चाहि' बुले, काँहा छिद्र ना पाइल॥41॥ लोग जो भिक्षा (भोजन) करते, उसके नियमको समझ लेते॥37॥ संन्यासीके लिये विधि और निषेध :— “संन्यासी हञा करे मिष्टान्न-भक्षण। अनुभाष्य—'अन्यान्य संन्यासी कहाँ किस परिमाणमें एइ भोगे हय कैछे इन्द्रिय-वारण??” 42॥ भोजन करते हैं, कहाँ वास करते हैं, आदि अन्योंकी सर्वत्र महाप्रभुकी निन्दा, दूसरी ओर चर्चा अथवा ब्योरा लेकर रामचन्द्रपुरी दिन-यापन प्रतिदिन महाप्रभुका दर्शन :— करते।' 'निश्चय',—हिसाब या ब्योरा॥37॥ एइ निन्दा करि' कहे सर्वलोक-स्थाने। प्रभुरे देखितेह अवश्य आइसे प्रतिदिने॥43॥ महाप्रभुकी दैनिक भिक्षाका विवरण—महाप्रभुके साथ श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्द और अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके दोषोंको ही ढूँढ़ते श्रीकाशीश्वरकी एक साथ भिक्षा :— रहते थे, इसलिये वे उनके गुणोंको लेशमात्र भी स्पर्श प्रभुर निमन्त्रणे लागे कौड़ि चारि पण। नहीं कर पाये। वे महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना चाहते थे, कभु काशीश्वर, गोविन्द खाय तिनजन॥38॥ परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी उनमें कोई भी दोष अनुवाद—उन दिनों महाप्रभुके निमन्त्रणमें चार पण नहीं ढूँढ़ पाये। तो अन्तमें वे कहने लगे,—“कृष्णचैतन्य कौड़ी (चार आने) लगते थे, कभी-कभी तो उसीमें ही संन्यासी होकर भी मिष्ठान्न खाता है, इस प्रकारके महाप्रभु, श्रीकाशीश्वर पण्डित तथा श्रीगोविन्द—ये तीनों भोगोंको ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे इन्द्रियोंके विकारोंको प्रसाद पाते थे॥38॥ रोका जा सकता है?” इस प्रकार वे सभीके सामने महाप्रभुकी निन्दा करते, किन्तु वे प्रतिदिन महाप्रभुके प्रत्यह प्रभुर भिक्षा इति-उति हय। दर्शन करने भी अवश्य ही आते॥41-43॥ केह यदि मूल्य आने, चारिपण-निर्णय॥39॥ महाप्रभुके द्वारा मर्यादा प्रदान, रामचन्द्रके अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभुका भोजन पृथक् स्थानपर द्वारा निन्दारूपी विष उगलना :— होता था और यदि कोई महाप्रभुके भोजनका मूल्य प्रभु गुरुबुद्धये करेन सम्भ्रम, सम्मान। चुकाना चाहता तो वह मूल्य चार आना ही निर्धारित तेंहो छिद्र चाहि' बुले,—एइ तार काम॥44॥ था॥39॥ स्वयं महाप्रभुको भी मर्त्य जानकर अनुवाद—महाप्रभु रामचन्द्रपुरीको गुरुबुद्धिसे (गुरुका उनके दोषोंको ढूँढ़ना :— गुरुभ्राता मानकर) उनका आदर और सम्मान करते। प्रभुर स्थिति, रीति, भिक्षा, शयन, प्रयाण। परन्तु महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना ही रामचन्द्रपुरीका काम रामचन्द्रपुरी करे सर्वानुसन्धान॥40॥ था॥44॥

242 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/45-52 ] अपनी निन्दाको सुननेपर भी महाप्रभुके द्वारा पदोचित सम्मान प्रदान करते हुए पुरीकी वञ्चना :- यत निन्दा करे, ताहा प्रभु सब जाने। तथापि आदर करे बड़इ सम्भ्रमे ॥ 45 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु सब जानते थे कि रामचन्द्रपुरी सबके सामने उनकी निन्दा करते हैं, तथापि महाप्रभु उनका गौरवपूर्वक आदर करते थे॥ 45 ॥ एक बार प्रातःकालमें महाप्रभुके घरमें चींटियोंकी कतारको देखकर स्वयं-भगवान् महाप्रभुके वैराग्यकी निन्दा करके वहाँसे प्रस्थान :- एकदिन प्रातःकाले आइला प्रभुर घर। पिपीलिका देखि' किछु कहेन उत्तर ॥ 46 ॥ अनुवाद-एकदिन प्रातःकालमें रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके वासस्थानपर आये। वहाँ बहुतसी चींटियोंको देखकर वे महाप्रभुकी निन्दा करते कुछ कहने लगे ॥ 46 ॥ रामचन्द्रपुरीके वचन- “रात्रावत्र ऐक्षवमासीत्, तेन पिपीलिकाः सञ्चरन्ति। अहो! विरक्तानां संन्यासिनामियमिन्द्रियलालसेति ब्रुवन्नुत्थाय गतः॥”47 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रात्रिके समय इस स्थानपर गन्नेसे बना गुड़ था, इसी कारण यहाँपर बहुत-सी चींटियाँ घूम रही हैं। अहो, विरक्त संन्यासियोंकी ऐसी इन्द्रिय-लालसा!”-ऐसा कहकर वे उठ खड़े हुए ॥ 47 ॥ अनुभाष्य-प्राकृत-तुच्छत्व आदि गुणोंसे अतीत पूर्ण निर्दोष-विग्रह स्वयं भगवान् महाप्रभुके किसी-न-किसी दोषको पानेकी आशासे रामचन्द्र अनेक प्रयत्न करनेपर भी जब सफल नहीं हो पाये और महाप्रभुके घरमें किसी भी प्रकारकी मिठाईको नहीं देखनेपर भी बहुतसी चींटियोंको घूमते देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि रात्रिके समय यहाँपर गुड़ था; किसी दोषका उल्लेख करके अपने माहात्म्यको वर्धित करना [रामचन्द्रपुरीका] उद्देश्य था ॥ 47 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने कानोंसे पुरीके द्वारा की गयी मिथ्या-निन्दाका श्रवण :- प्रभु पूर्व पूर्व निन्दा करियाछेन श्रवण। एबे साक्षात् शुनिलेन 'कल्पित' निन्दन ॥ 48 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरी पहले जो उनकी निन्दा करते थे, महाप्रभुने उसे दूसरोंके मुखसे सुना था, किन्तु अब उन्होंने रामचन्द्रपुरीके द्वारा कल्पित निन्दाको साक्षात् अपने कानोंसे श्रवण किया ॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कल्पित निन्दन'-मिथ्या-आरोपित निन्दा ॥ 48 ॥ विवर्त्तबुद्धिके कारण ही भगवान्‌के प्रति दोषारोपण :- सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र बेड़ाय। ताहाते तर्क उठाञा दोष लागाय ॥ 49 ॥ अनुवाद-चींटियाँ तो प्रायः सभी स्थानोंपर घूमती रहती हैं, किन्तु रामचन्द्रपुरी उन्हींको देखकर तर्क करते हुए महाप्रभुपर दोष लगाने लगे कि उनके घरमें गुड़ आदि मिष्ठान्न है ॥ 49 ॥ अपनी निन्दाको सुनकर जगद्गुरु आचार्यरूपी महाप्रभुका भय और लज्जा :- शुनि' ताहा प्रभुर सङ्कोच-भय मने। गोविन्दे बोलाञा किछु कहेन वचने ॥ 50 ॥ अपनी दैनिक भिक्षाको कम करना और श्रीगोविन्दसे उसके परिमाणको निर्धारित करना :- “आजि हैते भिक्षा आमार एइ त' नियम। पिण्डाभोगेरे एक चौठि, पाँचगण्डार व्यञ्जन ॥ 51 ॥ परिमाणसे अधिक लानेपर स्थानको छोड़कर जानेरूपी भय दिखलाना :- इहा बइ अधिक आर किछु ना लइबा। अधिक आनिले आमा एथा ना देखिबा ॥” 52 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके वचन सुनकर महाप्रभुके