श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2243, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें226 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/116-126 ] अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट अपने घर आकर रात्रिके समयमें विचार करने लगे,—“महाप्रभु पहले प्रयागमें तो मेरे प्रति बहुत कृपालु थे और उन्होंने अपने गणों सहित मेरे निमन्त्रणको भी स्वीकार किया था, किन्तु अब पुरीमें उनका मन मुझसे क्यों हट गया है ? 'मैं अपनी विद्याके अभिमानके कारण सोचता हूँ कि मैं विजयी होऊँ, किन्तु महाप्रभु विचार करते हैं,-'इनका चित्त इस अभिमानसे रहित हो जाय।' ईश्वरका स्वभाव ही होता है कि वे सभीका हित करते हैं। मुझमें अपने आपको बड़ा विद्वान दिखानेका अभिमान है, महाप्रभु मेरे उस अभिमानको चूर करनेके लिये ही मेरा अपमान करते हैं। महाप्रभु मेरा अपमान करके मेरा हित करते हैं, किन्तु मैं ऐसा हूँ कि उसे अपना दुःख मानता हूँ, जैसे महामूर्ख इन्द्रने भी उसके हितकारी श्रीकृष्णके ऊपर क्रोध किया था॥” 116-120 ॥ अगले दिन प्रातःकाल श्रीवल्लभके द्वारा महाप्रभुके चरणोंमें शरण-ग्रहण :- एत चिन्ति' प्राते आसि' प्रभुर चरणे। दैन्य करि' स्तुति करि' लइल शरणे ॥ 121 ॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके श्रीवल्लभ भट्ट अगले दिन प्रातःकाल महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित हुए। उन्होंने अति दीनतापूर्वक महाप्रभुकी स्तुति की और उनकी शरण ग्रहण की ॥ 121 ॥ श्रीवल्लभकी आर्त्ति, दैन्य और अनुतापपूर्ण उक्ति :- “आमि अज्ञ जीव, -अज्ञोचित कर्म कैलुँ। तोमार आगे मूर्ख आमि पाण्डित्य प्रकाशिलुँ ॥ 122 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने अपने दोषको स्वीकार करते हुए कहा,-“मैं अज्ञानी मूर्ख जीव हूँ, मैंने मूर्खतावाला कार्य ही किया है। मैंने मूर्ख होनेपर भी आपके आगे अपने पाण्डित्यको प्रकाशित करनेका प्रयास किया है॥ 122 ॥ अनुभाष्य—दो भिन्न पाठान्तर—"तोमार आगे आमि मूर्ख पाण्डित्य प्रकाशिलुँ” और “तोमार आगे मूर्ख हञा पाण्डित्य प्रकाशिलुँ।” 'मूर्ख-पाण्डित्य',-मूर्खकी चतुरता ॥ 122 ॥ भक्तिरक्षक-श्रीस्वामीके विरोधीके प्रति अवज्ञा और उपेक्षाके द्वारा ही महाप्रभुकी महाकृपाका प्रदर्शन :- तुमि-ईश्वर, निजोचित कृपा कैला। अपमान करि' सर्व गर्व खण्डाइला ॥ 123 ॥ अनुवाद—किन्तु आप ईश्वर हैं। आपने अपने स्वभावके अनुरूप ही मुझपर कृपा की है। आपने मेरा अपमान करके मेरे सम्पूर्ण गर्वको चूर्ण कर दिया है ॥ 123 ॥ इन्द्रकी मूर्खताका दृष्टान्त; पहले दुःख प्रतीत होनेवाली, किन्तु नित्यमङ्गलकारी भगवत्-कृपामें उनका अनिष्ट-भ्रम :- आमि-अज्ञ, 'हित'-स्थाने मानि 'अपमाने'। इन्द्र येन कृष्णेर निन्दा करिल अज्ञाने ॥ 124 ॥ अनुवाद—मैं अज्ञानी मूर्ख हूँ, क्योंकि मैं अपने हितको अपना अपमान समझ रहा था, जैसे इन्द्रने अज्ञानतावश श्रीकृष्णकी निन्दा की थी॥ 124 ॥ भगवत्-कृपाके अञ्जनसे अहङ्कार-तमोरूपी अन्धताका नाश :- तोमार कृपा-अञ्जने गर्व-आन्ध्य गेल। तुमि एत कृपा कैला, -एबे 'ज्ञान' हैल ॥ 125 ॥ अनुवाद—आपकी कृपाके अञ्जनसे मेरी अहङ्कार- तमोरूपी अन्धताका नाश हो गया है। आपने मुझपर इतनी महत् कृपा की है, उसे मैं अब समझा हूँ, मेरा अज्ञान अब दूर हो गया है॥ 125 ॥ महाप्रभुके चरणोंमें श्रीवल्लभके द्वारा शरण-ग्रहण और क्षमा-भिक्षा :- अपराध कैलु, क्षम, लइनु शरण। कृपा करि' मोर माथे धरह चरण ॥” 126 ॥