भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2244

[ 7/126–135 सातवाँ अध्याय 227 अनुवाद—मैंने बहुत अपराध किये हैं। आप मुझे क्षमा कीजिये, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। आप कृपा करके अपने चरणकमल मेरे सिरपर रख दीजिये॥” 126॥ मानद महाप्रभुकी स्तुतिके द्वारा श्रीभट्टको सान्त्वना प्रदान :— प्रभु कहे,—“तुमि 'पण्डित' 'महाभागवत'। दुइगुण याँहा, ताँहा नाहि गर्व-पर्वत ॥ 127 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभका 'भक्तिरक्षक' सर्वजगद्गुरु श्रीधर स्वामीके विरोधके कारण तिरस्कार :— श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका कर ! श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 'गर्व' धर ! ! 128 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीधरकी यथोचित मर्यादाका प्रचार :— श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' जानि। जगद्गुरु श्रीधरस्वामी, 'गुरु' करि' मानि ॥ 129 ॥ 'भक्तिरक्षक' श्रीधरका अतिक्रम करनेके फलसे लोक-निन्दित भागवतके अर्थकी विपरीतता :— श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु लिखिबे। 'अर्थव्यस्त' लिखन सेइ, लोके ना मानिबे ॥ 130 ॥ चिद्वस्तु विष्णु-स्वामी [सम्प्रदायमें निष्णात] श्रीधरके आनुगत्यमें शुद्धाद्वैतपरक अद्वय-ज्ञानानुकूल भक्ति-व्याख्या ही सर्वमान्य :— श्रीधरेर अनुगत ये करे लिखन। सब लोक मान्य करि' करिबे ग्रहण ॥ 131 ॥ एकमात्र कृष्ण-सेवामें तत्पर श्रीधरके आनुगत्यमें ही भागवत-व्याख्याकी कर्त्तव्यता :— श्रीधरानुगत कर भागवत-व्याख्यान। अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण भगवान् ॥ 132 ॥ दस प्रकारके नामापराधसे रहित श्रीकृष्णकीर्त्तनके फलसे श्रीकृष्णपदकी प्राप्ति :— अपराध छाड़ि' कर कृष्णसङ्कीर्त्तन। अचिरात् पाबे तब कृष्णेर चरण॥” 133 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप पण्डित हैं और महाभागवत भी हैं। जहाँपर ये दो गुण विराजमान रहते हैं, वहाँ अहङ्काररूपी पर्वत नहीं रह सकता। आपने श्रीधरस्वामीकी टीकाकी निन्दा करके भागवतकी अपनी टीकाकी रचना की है ! आपमें इतना मिथ्या अभिमान है कि आप श्रीधरस्वामीको प्रमाणिक नहीं मानते ! ! जगद्गुरु श्रीधरस्वामीकी कृपासे ही भागवतको जान सकते हैं। मैं श्रीधरस्वामीको अपना गुरु मानता हूँ। आप गर्व करके श्रीधरस्वामीके विचारके ऊपर जाकर जो कुछ भी लिखोगे, वह वास्तविक अर्थके विपरीत ही होगा और लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे। जो श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करेगा, उसे सभी लोग प्रामाणिक मानकर ग्रहण करेंगे। आप श्रीधरस्वामीके अनुगत होकर भागवतकी व्याख्या करो। अपने अभिमानको त्यागकर भगवान् कृष्णका भजन करो। आप अपराधोंको त्याग करके श्रीकृष्ण सङ्कीर्तन करो, तभी आपको अतिशीघ्र श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होगी॥” 127–133 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अर्थव्यस्त',—विपरीत अर्थ॥ 130 ॥ श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :— भट्ट कहे,—“यदि मोरे हइला प्रसन्न। एकदिन पुनः मोर मान' निमन्त्रण ॥” 134 ॥ अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्टने कहा,—“यदि आप मेरे प्रति प्रसन्न हो गये हैं, तब पुनः एकदिन मेरे निमन्त्रणको स्वीकार कीजिये॥” 134 ॥ जीवके प्रति भुवनपावन महाप्रभुकी अहैतुकी कृपाका उदाहरण :— प्रभु अवतीर्ण हैला जगत् तारिते। मानिलेन निमन्त्रण, तारे सुख दिते ॥ 135 ॥ अनुवाद—महाप्रभु सम्पूर्ण जगत्का उद्धार करनेके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं, इसलिये उन्होंने श्रीवल्लभ भट्टकी प्रसन्नताके लिये उनके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया॥ 135 ॥