श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें228 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/136-139 ] अक्षज्ञानी अभिमानीको दण्ड प्रदान करके उसका उद्धार करना :- जगतेर 'हित' हउक, -एइ प्रभुर मन। दण्ड करि' करे तार हृदय शोधन ॥ 136 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी हार्दिक इच्छा है कि सम्पूर्ण जगत्का हित हो। श्रीवल्लभ भट्टके हृदयको शुद्ध करनेके लिये ही महाप्रभुने उनको दण्ड प्रदान किया॥ 136॥ परिकरों सहित महाप्रभुके द्वारा श्रीवल्लभके घरमें भिक्षा-स्वीकार :- स्वगण-सहिते प्रभुर निमन्त्रण कैला। महाप्रभु तारे तब प्रसन्न हइला ॥ 137 ॥ अनुवाद-जब श्रीवल्लभ भट्टने महाप्रभुको उनके परिकरों सहित निमन्त्रित किया, तब महाप्रभु उनके प्रति प्रसन्न हो गये ॥ 137 ॥ सत्यभामाके अवतार श्रीजगदानन्दके वृत्तान्तका वर्णन; उनका वाम्य-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- जगदानन्द-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। सत्यभामा-प्राय प्रेम 'वाम्य-स्वभाव' ॥ 138 ॥ श्रीजगदानन्दका महाप्रभुके साथ प्रणय-कलह :- बार बार प्रणय-कलह करे प्रभु-सने। अन्योऽन्ये खट्मटि चले दुइजने ॥ 139 ॥ अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डितका महाप्रभुके प्रति शुद्ध प्रगाढ़ भाव था। उनका प्रेम प्रायः श्रीसत्यभामाके प्रेमकी भाँति वाम्य-स्वभाववाला था। श्रीजगदानन्द पण्डित बार-बार महाप्रभुके साथ प्रेम-कलह करते थे। उन दोनोंमें सदा विवाद चलता ही रहता था॥ 138-139 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृत पूः खः सातवें अध्यायमें, श्रीसनातनप्रभु,- “ततोऽन्याभिश्च देवीभिरेतदेवानुमोदितम्। सात्राजिती परं मानगेहं तदसहायविशत् ॥ 85 ॥ श्रीमद्गोपीजन-प्राणनाथः सक्रोधमादिशत्। सा समानीयतामत्र मूर्खराजसुता द्रुतम् ॥ 86 ॥ स्तम्भेऽन्तर्धाय देहं स्वं स्थिता लज्जाभयान्विता ॥89क। अरे सात्राजिति क्षीणचित्ते मानो यथा त्वया।90क। अवरे किं न जानासि मां तदिच्छानुसारिणम् ॥ ”91ख ॥ तासामभावे पूर्वं मे वसतो मथुरापुरे। विवाहकरणे काचिदिच्छाप्यासीन्न मानिनि ॥ 100 ॥ [अर्थात् “(गोपियोंके प्रति श्रीकृष्णका प्रेम अधिक होना उचित ही है, -इस प्रकार) तदुपरान्त अन्य महिषियोंने भी श्रीरुक्मिणीदेवीके विचारोंका अनुमोदन किया, किन्तु सत्राजितकी पुत्री श्रीसत्यभामादेवी उसको सहन न कर पायीं और मान-गृहमें प्रवेश कर गयीं। (यह सुनकर) श्रीगोपीजन-प्राणनाथ श्रीकृष्णने क्रोधपूर्वक आदेश दिया,-'उस महामूढ़ सत्राजित-राजाकी पुत्री सत्यभामाको शीघ्र ही यहाँ ले आओ।' इसके द्वारा सत्यभामा लज्जित और भगवान्के क्रोधसे भयभीत होकर स्तम्भके पीछे ही अपनेको छुपाकर खड़ी रहीं। (श्रीकृष्णने सत्यभामाको लक्ष्य करके कहा,-) अरी संकीर्णचित्तवाली सत्राजितकी कन्या ! तुमने मान किया है, किन्तु तुम क्या नहीं जानती कि मैं तो व्रजवासियोंकी इच्छाके वशीभूत हूँ? अयि मानिनि ! पहले मथुरामें वास करनेके समयमें गोपियोंसे विच्छेद होनेपर भी मेरी विवाह करनेकी कदापि इच्छा नहीं थी।”] ॥ 138-139 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीजगदानन्द पण्डित स्वरचित श्रीश्रीप्रेमविवर्त ग्रन्थमें कहते हैं कि इसी प्रकारसे महाप्रभुके साथमें उनका बहुत प्रकारसे प्रेम-कलह होता रहता था। उनका प्रेम-कलह कैसा होता था?-परिकरके समान। श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके लिये सिरमें लगानेके लिये नवद्वीपसे सुगन्धित तेल लेकर आये। परन्तु महाप्रभुने कहा कि संन्यासीको तेल लगाना शोभा नहीं देता है, इसे श्रीजगन्नाथके मन्दिरमें प्रदीप जलानेके लिये दे दो। पुनः-पुनः कहनेपर भी जब महाप्रभु नहीं माने, तो श्रीजगदानन्द पण्डितने वह तेलकी मटकी फोड़ दी और मान करके बैठ गये। इस प्रकारसे उनमें दिन-रात प्रेम-कलह होता है। प्रेम-कलह क्यों होता है-इसके लिये श्रीभक्तिविनोद ठाकुरने एक दर्शन दिया है। सूर्य अपनी धुरिपर है