भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2246

[ 7/139-140 सातवाँ अध्याय 229 और सभी ग्रहोंका आकर्षण करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि सभी ग्रहों-उपग्रहोंमें भी आकर्षण शक्ति है और इनका अपना कुछ अस्तित्व है। सूर्य सभी ग्रह-नक्षत्रोंको अपनी ओर आकर्षित करता है। पृथ्वी, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति आदि ग्रह-उपग्रह सूर्यकी ओर खिंचते तो हैं, परन्तु अपने अस्तित्वकी रक्षाके लिये दूर भी रहना चाहते हैं, परिणामस्वरूप वे सूर्यके चारों ओर घूमने लगते हैं। चिद्-जगत्में एकमात्र सूर्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र हैं। कृष्णका अर्थ है जो सभीको आकर्षित करते हैं। वे अपने रूपसे, अपने गुणोंसे, अपनी लीलाओंके माधुर्यसे समस्त जीवोंको अपनी ओर आकर्षित करते हैं, किन्तु जीवोंका भी अपना कुछ व्यक्तित्व है। जीवका अपना व्यक्तित्व उसको पृथक् रखना चाहता है, वह खिंचकर नहीं जाना चाहता। इसलिये वह दूर तो नहीं जाता, किन्तु प्रेम कलह होता है। इस प्रकार जीव अपना पृथक् व्यक्तित्व रखकर उसी प्रकारसे कृष्णकी प्रेममयी सेवा करता है। इस दर्शनको कोई-कोई भाग्यवान् जीव ही समझ पाता है। महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र हैं—वे सर्वाकर्षक हैं और सूर्यके समान हैं और श्रीजगदानन्द पण्डित ग्रहके समान हैं। श्रीजगदानन्द आकृष्ट तो हैं, वे महाप्रभुके निकट भी जाना चाहते हैं, किन्तु पृथक् व्यक्तित्व रहनेके कारण अपने अनुसार महाप्रभुकी सेवा करना चाहते हैं। वे स्वतन्त्र रूपमें उनकी सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहते हैं, किन्तु वैसा नहीं कर पानेके कारण उनका प्रेम-कलह होता है। इसलिये उन्हें विरह हो जाता है। वे महाप्रभुके विरहमें उनके निकट तो घूमते हैं, किन्तु कुछ पृथक् भी रहना चाहते हैं।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 139 ॥ रुक्मिणीके अवतार श्रीगदाधरका दक्षिण-स्वभाव और शुद्ध गाढ़ गौरप्रेम :- गदाधर-पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव। रुक्मिणी-देवीरे यैछे 'दक्षिण-स्वभाव' ॥ 140 ॥ अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितका भी महाप्रभुके प्रति शुद्ध गाढ़ भाव था। उनका श्रीरुक्मिणी देवीकी भाँति दक्षिण स्वभाव था॥ 140 ॥ अमृतानुकम्पा—यहाँपर श्रील गदाधर पण्डितके शुद्ध गाढ़ भावकी श्रीरुक्मिणीदेवीके 'दक्षिण'-स्वभावके साथ तुलना की है, यह देखकर उनको कृष्णलीलामें रुक्मिणी स्वरूपा जानकर वैसा भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (147) में उनके सम्बन्धमें कहा गया है,— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥” अर्थात् “पहले जो साक्षात् प्रेमरूपा वृन्दावनेश्वरी श्रीमती राधा हैं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय गदाधर पण्डितके नामसे विख्यात हैं।” श्रीगदाधर पण्डित-सभी प्रकारसे मूलस्वरूपा श्रीमती राधाठाकुराणी ही हैं, इसलिये उनके भीतरमें श्रीरुक्मिणीदेवीका 'दक्षिण-स्वभाव' भी विद्यमान है। श्रीराधाके वाम्यभावके विषय एकमात्र व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण हैं, अन्य कोई नहीं- “गोपेन्द्रसुत बिना तेंहों ना स्पर्शे अन्यजन।” (मध्यलीला 8/286), इसलिये गौरलीलामें श्रीगदाधर कभी भी उनके स्वरूपगत 'वाम्यभाव'को प्रकाश नहीं करते हैं। गौरलीलामें उन श्रीकृष्णने स्वयं ही जब अपने विषयभावको त्यागकर श्रीराधा-भावका अवलम्बन किया है, तब वे गदाधररूपी श्रीराधाके वाम्यभावके विषय नहीं रहे। दूसरी बात, गौरलीलामें गदाधररूपमें स्वयं श्रीराधा ही श्रीकृष्णको अपने राधाभावका आस्वादन करवानेके लिये उनकी नित्य सङ्गिनी हैं, क्योंकि “शक्ति-शक्तिमत्तोरभेदः।” वहाँपर उनके द्वारा अपना वाम्य-स्वभाव प्रकट करनेपर श्रीगौरका प्रच्छन्न अवतारत्व न रहकर व्रजेन्द्रनन्दन-स्वरूप प्रकाशित हो जायेगा और इस कारण उनका राधाभाव आस्वादन भी असम्भव हो जायेगा। तीसरी बात, श्रीगदाधरने महाप्रभुको 'गौरनागर'-रूपमें स्थापित करनेका किसी प्रकारका प्रयास नहीं किया। चौथी बात, श्रीगदाधरने श्रीराधाभावयुक्त