भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2247

230 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/140-144 ] तनु श्रीगौरचन्द्रके सदा वशीभूत-भावके प्रदर्शनके द्वारा श्रीराधादास्योचित-स्वभावकी प्रतिष्ठा की है। श्रीजगदानन्द प्रभु सत्यभामाके समान 'वाम्य-स्वभाव'युक्त होकर महाप्रभुकी सेवाके उद्देश्यसे ही उनके साथ प्रणयकलहमें आबद्ध रहते थे। यहाँपर श्रीजगदानन्दके 'वाम्य-स्वाभाव'के कारण उनको श्रीगदाधरकी अपेक्षा श्रेष्ठ माननेका कारण नहीं है। अपितु कहा जा सकता है कि महाप्रभुके संन्यास-आश्रमोचित कठोर साधनको देखकर श्रीगदाधर ही उनके सत्यभामारूप-अवतार श्रीजगदानन्दके द्वारा प्रणयकलहके माध्यमसे महाप्रभुको अति कठोर साधनसे विरत रखते हैं॥ 140 ॥ महाप्रभुके प्रति श्रीगदाधरका स्वाभाविक ऐश्वर्य-भाव-मिश्रित स्निग्ध-प्रेम, नम्रतावशतः क्रोधका अभाव :- ताँर प्रणय-रोष देखिते प्रभुर इच्छा हय। ऐश्वर्य-ज्ञाने ताँर रोष नाहि उपजाय ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी कभी श्रीगदाधर पण्डितके प्रणय-रोषको देखनेकी इच्छा होती, किन्तु महाप्रभुके प्रति ऐश्वर्य-ज्ञान होनेके कारण उनमें रोष उत्पन्न नहीं होता था ॥ 141 ॥ अनुभाष्य-बृहद्भागवतामृतके पूः खः 7/119 श्लोकमें श्रीसनातन प्रभु- “सर्वा महिष्यः सह सत्यभामया भैष्म्यादयो द्रागभिसृत्य मूर्द्धभिः। पादौ गृहीत्वा रुदितार्द्रकाकुभिः संस्तुत्य भर्तारमशीश-मच्छनैः॥” [अर्थात् “श्रीउद्धवके सङ्केतके अनुसार श्रीरुक्मिणी आदि महिषियोंने श्रीसत्यभामा सहित प्रभु श्रीकृष्णके सम्मुख जाकर अपने-अपने मस्तकको उनके श्रीचरणकमलोंपर रख दिया और क्रन्दन करते हुए विनयपूर्वक वचनोंके द्वारा उन्हें धीरे-धीरे शान्त किया।”] द्वारकामें एक बार श्रीकृष्णके द्वारा श्रीरुक्मिणीको श्लेषपूर्वक (ऐसे वाक्य जिनके एकसे अधिक अर्थ हों) अन्य किसी गुणवान् पतिको ग्रहण करनेका उपदेश देनेपर रुक्मिणी भयभीत होकर दक्षिण-स्वभाववशतः उनके चरणोंमें गिर पड़ीं। गौरलीलामें श्रीजगदानन्द पण्डितगोस्वामी-वाम्य-स्वभावशाली प्रणयकलहशील सत्यभामाके भावयुक्त हैं और गदाधर पण्डितगोस्वामी- दक्षिण-स्वभावशाली रुक्मिणीकी भाँति प्रणय-कलहके स्थानपर आशङ्कित होकर सर्वदा महाप्रभुके आज्ञाकारी थे॥ 141 ॥ श्रीवल्लभके प्रति प्रीतिके उपलक्ष्यमें बाहरसे कृत्रिम क्रोध दिखलाकर श्रीगदाधरके प्रेमकी परीक्षा; श्रीगदाधरका भय :- एइ लक्ष्य पाना प्रभु कैला रोषाभास। शुनि' पण्डितेर चित्ते उपजिल त्रास ॥ 142 ॥ अनुवाद-[श्रीगदाधर पण्डितके द्वारा श्रीवल्लभ भट्टके प्रति प्रीति करनेकी बातसे] महाप्रभुको अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने श्रीगदाधर पण्डितके प्रति रोषाभास प्रदर्शित किया। महाप्रभुके रोषपूर्ण वचन सुनकर श्रीगदाधर पण्डितके हृदयमें बहुत भय उत्पन्न हुआ ॥ 142 ॥ द्वापरयुगमें श्रीकृष्ण और रुक्मिणीका दृष्टान्त :- पूर्वे येन कृष्ण यदि उपहास कैल। शुनि' रुक्मिणीर मने त्रास उपजिल ॥ 143 ॥ अनुवाद-पहले कृष्णलीलामें जब श्रीकृष्णने श्रीरुक्मिणीके साथ उपहास किया था, तब उसे सुनकर श्रीरुक्मिणीके हृदयमें भी बहुत भय उत्पन्न हुआ था ॥ 143 ॥ श्रीवल्लभभट्टका पहले वात्सल्य-रसमें भजन :- वल्लभभट्टेरे हय वात्सल्य-उपासन। बालगोपाल-मन्त्रे तेंहो करेन सेवन ॥ 144 ॥ अनुवाद-श्रीवल्लभ भट्ट वात्सल्य रसमें उपासना करते थे। वे श्रीकृष्णकी बालगोपाल-मन्त्रसे उपासना करते थे ॥ 144 ॥