श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2242, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/113-120 सातवाँ अध्याय 225 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः', यदि सब कुछ ब्रह्म है, तो आप इस जगत्को मिथ्या क्यों कहते हैं?" शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वान उसका जो भी उत्तर दे रहे थे, श्रीवल्लभ भट्ट उसका खण्डन कर देते। अन्तमें जब उनको परास्त कर दिया, तब श्रीवल्लभ भट्टका एक सौ आठ सोनेके घड़ोंके जलसे अभिषेक किया गया। इसको 'कनक-अभिषेक' कहते हैं। यह सम्मान पानेके बाद उनमें कुछ अभिमान आ गया था, जैसे दक्ष प्रजापतिके प्रसङ्गमें भी देखा जाता है। (भाः 4/3/2)— “यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना। प्रजापतीनां सर्वेषामधिपत्ये स्मयोऽभवत्॥” “जब परमदेवता ब्रह्माजीने दक्षको समस्त प्रजापतियोंके अधिपतिके रूपमें अभिषिक्त किया, तब दक्षके हृदयमें गर्व उत्पन्न हुआ।” महाप्रभु उनके हृदयमें स्थित अभिमानको जानते थे, इसलिये उनका शोधन करनेके लिये उनकी उपेक्षा कर रहे थे।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज”॥ 113 ॥ अधोक्षज महाप्रभुके द्वारा उपेक्षासे ही जड़ेन्द्रिय-ज्ञानके अहङ्कारी 'भक्ति-रक्षक'के (श्रीधरस्वामीके) विरोधीकी अविद्या-हरणरूपी कृपाका वर्णन :- नाना अवज्ञाने भट्टे शोधेन भगवान्। कृष्ण यैछे खण्डिलेन इन्द्रेर अभिमान॥ 114 ॥ अनुवाद-भगवान् महाप्रभुने श्रीवल्लभ भट्टकी अनेक प्रकारसे बात न मानकर और खण्डन करके उनका शोधन किया जैसे श्रीकृष्णने इन्द्रके अभिमानको तोड़ा था॥ 114 ॥ अनुभाष्य-कृष्णोत्तर इन्द्रकी पूजाको परिवर्तित करके कृष्णने व्रजमें गिरिराज गोवर्धनकी पूजा प्रवर्तित करवायी। इसके द्वारा मायामुग्ध विमूढात्मा इन्द्रने क्रोधित होकर भीषण वर्षणके द्वारा गोकुलको नष्ट करनेका प्रयास किया। तब कृष्णने गोवर्धन धारण करके वर्षाके द्वारा प्लावित गोकुलकी रक्षा की, जिससे इन्द्रका जड़ीय अभिमान खण्डित और चूर्ण हुआ ॥ 114 ॥ अविद्याग्रस्त अक्षजज्ञानीका प्रेयको ही श्रेय मानना और मनोधर्मके प्रतिकूल कल्याणकारी भगवान्की कृपाको अमङ्गल और दुःख मानना :- अज्ञ जीव निज-'हिते' 'अहित' करि' माने। गर्व चूर्ण हैले, पाछे उघाड़े नयने॥ 115 ॥ अनुवाद-अज्ञानी जीव अपने हितको अहित मानता है, किन्तु गर्वके चूर्ण होनेपर उसके नेत्र खुलते हैं अर्थात् वह अपने वास्तविक हितको देख पाता है॥ 115 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'उघाड़े नयने', - नेत्र खोलता है (नेत्र खुलते हैं) ॥ 115 ॥ रात्रिमें श्रीभट्टके द्वारा महाप्रभुकी पूर्व कृपाके इतिहासका स्मरण :- घरे आसि' रात्र्ये भट्ट चिन्तिते लागिल। “पूर्वे प्रयागे मोरे महा-कृपा कैल॥ 116 ॥ स्वगण-सहिते मोर मानिला निमन्त्रण। एबे केने प्रभुर मोते फिरि' गेल मन?? 117 ॥ समस्त जीवोंके नित्य कल्याणका सम्पादन करना ही ईश्वरका स्वभाव :- 'आमि जिति', - एइ गर्व-शून्य हउक इँहार चित्त। ईश्वर-स्वभाव, - करेन सबाकार हित ॥ 118 ॥ उपेक्षा और अपमानादि इन्द्रियोंको दुःख प्रदान करनेवाले कार्यके द्वारा ही समदर्शी अधोक्षजके द्वारा उनके विमुख अक्षज-ज्ञानीके मद-मात्सर्यका हरण :- आपना जानाइते आमि करि अभिमान। से-गर्व खण्डाइते मोर, करेन अपमान॥ 119 ॥ पहले दुःख देनेवाले, परिणाममें मङ्गलमय कर्मफलको भगवान्की कृपा माननेमें ही बुद्धिमता :- आमार 'हित' करेन, - इहो आमि मानि 'दुःख'। कृष्णेर उपरे येन कैल इन्द्र मूर्ख॥” 120 ॥