भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2241

224 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 7/108-113 ] श्रीस्वामिपादकी पहले और बादवाली उक्तिमें सामञ्जस्य अथवा समन्वयके अभावका वर्णन करके उसपर मिथ्या दोषारोपण :- सेइ व्याख्या करेन याँहा येइ पड़े आनि' । एकवाक्यता नाहि, ताते 'स्वामी' नाहि मानि ॥" 110 ॥ अनुवाद-वे अगले दिन आकर महाप्रभुको प्रणाम करके बैठ गये और बड़े गर्वसे कुछ कहने लगे, - “मैंने स्वरचित भागवतकी टीकामें श्रीधरस्वामी कृत भागवतकी व्याख्याका खण्डन किया है। मैं उनकी व्याख्याको स्वीकार नहीं कर पाता। जहाँ जो प्रसङ्ग आता है, उसी प्रकारसे वे वहाँ व्याख्या करते हैं। इस प्रकार उनकी व्याख्यामें सङ्गति नहीं होती, इसलिये मैं उन्हें प्रमाणिक नहीं मानता ॥ 108-110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- जहाँ जिस प्रकारकी बात आयी, श्रीधरस्वामीने उस प्रकारसे मानकर व्याख्या की। अतएव सर्वत्र उनकी एकवाक्यता (अथवा सामञ्जस्य) नहीं रहती, इसलिये मैं श्रीधरस्वामीको नहीं मानता ॥ 110 ॥ महाप्रभुके द्वारा 'भक्तिके एक रक्षक' श्रीधरस्वामिपादकी भक्तिके अनुकूल व्याख्याका समर्थन; श्रीधरका ही चित्-समन्वयरूप चिदेकविष्णु-स्वामित्व, श्रीधरके विरोधीकी ही चित्-जड़-समन्वय पोषणरूपी मनमानी :- प्रभु हासि' कहे, – “स्वामी ना माने येइ जन। वेश्यार भितरे तारे करिये गणन ॥" 111 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए कहा, - “जो स्वामीको [पतिको] प्रमाणिक नहीं मानती, मैं उसकी गणना वेश्याओंमें करता हूँ।" [पक्षान्तरमें - 'जो श्रीधर स्वामीको नहीं मानता, उसकी गणना मैं व्यभिचारियोंमें करता हूँ'] ॥ 111 ॥ महाप्रभुके वचन सुनकर सभी भक्तोंको आनन्द :- एत कहि' महाप्रभु मौन धरिला। शुनिय़ा सबार मने सन्तोष हइला ॥ 112 ॥ अनुवाद-यह कहकर महाप्रभुने मौन धारण कर लिया। महाप्रभुके वचन सुनकर समस्त उपस्थित भक्तोंके मनमें सन्तोष हुआ ॥ 112 ॥ अविद्या-नाश करनेवाले भुवनमङ्गल परमदयालु अवतारी अन्तर्यामी श्रीगौरसुन्दर :- जगतेर हित लागि' गौर-अवतार। अन्तरेर अभिमान जानेन ताहार ॥ 113 ॥ अनुवाद-जगत्के हितके लिये ही श्रीगौर-अवतार हुआ है। महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके भीतरके अभिमानको जानते थे ॥ 113 ॥ अमृताणुकणिका-श्रीवल्लभ भट्टसे महाप्रभुकी भेंट सबसे पहले प्रयागमें आड़ाइल ग्राममें हुई थी। तब श्रीरूप गोस्वामी और श्रीअनुपम गोस्वामी, दोनों भाई भी महाप्रभुके साथ थे। इन दोनों भाइयोंपर कृपा करनेके लिये महाप्रभु प्रयागमें पधारे थे। श्रीवल्लभ भट्ट महाप्रभुके आगमनका समाचार सुनकर उनके दर्शन करनेके लिये आये और निमन्त्रण करके उन्हें अपने घरमें ले गये। श्रीवल्लभ भट्ट आयुमें महाप्रभुसे बहुत बड़े थे, किन्तु वह अभिमान छोड़कर उन्होंने अपने हाथोंसे महाप्रभुके चरणोंको धोया। उन्होंने और उनके परिवारने उस जलको अपने-अपने मस्तकपर धारण किया। उन्होंने गन्ध-पुष्प-धूप-दीपसे महाप्रभुकी पूजा की। तब महाप्रभुने निष्कपट रूपसे उनपर कृपा की। श्रीवल्लभ भट्टने भागवतकी 'सुबोधिनी'-नामक एक टीका लिखी थी और वे देश-विदेशमें उसका प्रचार कर रहे थे। एक बार वे दक्षिण देशमें भ्रमण करते हुए विजयनगरमें पधारे। वहाँ एक बार सभामें शङ्कराचार्य-सम्प्रदायके शङ्करका अवतार कहलानेवाले दिग्गज विद्वानके साथ उनका शास्त्रार्थ हुआ। श्रीवल्लभ भट्टने उनसे पूछा, - "क्या आप 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म'- इस वाक्यको मानते हैं?" उन शङ्कर-सम्प्रदायके विद्वानने कहा, - “अवश्य ही हम इसे महावाक्य मानते हैं।" श्रीवल्लभ भट्टने कहा, - "शङ्कराचार्यजीने कहा है-