श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 8/50-60 आठवाँ अध्याय 243 मनमें सङ्कोच और भय हुआ। इसलिये उन्होंने श्रीगोविन्दको बुलाकर उससे कहा,—“आजसे मेरी भिक्षा (भोजन)का नियम होगा कि मैं श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादकी प्रमाण-हाण्डीका एक चौथाई भाग और पाँच गण्डे (एक पैसे)की साग-सब्जीको ही ग्रहण करूँगा। इससे अधिक और कुछ भी मत लाना। इससे अधिक लानेपर तुम मुझे यहाँपर नहीं देखोगे॥” 50-52॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मिट्टीकी हाण्डीमें मिलता है। 'प्रमाण'-हाण्डीके चौथे भागको 'एक चौठि' (एक चौथाई) कहते हैं॥ 51॥ सभी भक्तोंको महाप्रभुके कठोर उपदेशके विषयमें बतलाना, सभी भक्तोंको भीषण दुःख :- सकल वैष्णवे गोविन्द कहे एइ बात। शुनि' सबार माथे यैछे हैल वज्राघात॥ 53॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने सभी वैष्णवोंको महाप्रभुकी इस आज्ञाके विषयमें बतलाया। यह बात सुनकर सभीको ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर वज्रका आघात हुआ हो॥ 53॥ दुरात्मा रामचन्द्रपुरीको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय महाप्रभुका विरोधी जानकर भक्तोंके द्वारा उसकी निन्दा :- रामचन्द्रपुरीके सबाय देय तिरस्कार। “एइ पापिष्ठ आसि' प्राण लइल सबार॥” 54॥ अनुवाद—सभी भक्त रामचन्द्रपुरीका तिरस्कार करते हुए कहने लगे,—“इस पापीने आकर हम सबके प्राण ले लिये हैं॥” 54॥ एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :- सेइदिन एकविप्र कैल निमन्त्रण। एक-चौठि भात, पाँच-गण्डार व्यञ्जन॥ 55॥ महाप्रभुके लिये श्रीगोविन्दके द्वारा यथा-निर्दिष्ट-परिमाणमें प्रसाद स्वीकार करना, महाप्रभुके द्वारा बहुत कम आहार ग्रहण करनेसे ब्राह्मणको दुःख :- एइमात्र गोविन्द कैल अङ्गीकार। माथाय घा मारे विप्र, करे हाहाकार॥ 56॥ अनुवाद—उस दिन एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। जब श्रीगोविन्दने महाप्रभुकी आज्ञाके अनुसार उन ब्राह्मणसे एक चौथाई हाण्डी चावल और पाँच गण्डेकी ही शाक-सब्जियोंको ग्रहण किया, तब वह ब्राह्मण हाहाकार करते हुए अपने हाथोंसे मस्तकपर आघात करने लगा॥ 55-56॥ महाप्रभुके द्वारा आधा भोजन ग्रहण करना, श्रीगोविन्दको उनके आधे अवशिष्टकी प्राप्ति, भक्तोंके द्वारा अन्न और जलका त्याग :- सेइ भात-व्यञ्जन प्रभु अर्द्धेक खाइल। ये किछु रहिल, ताहा गोविन्द पाइल॥ 57॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस चावल और शाक- सब्जियोंमें-से आधा ग्रहण किया एवं जो महाप्रसाद बच गया, उसे श्रीगोविन्दने पा लिया॥ 57॥ अर्द्धाशन करेन प्रभु, गोविन्द अर्द्धाशन। सब भक्तगण तबे छाड़िल भोजन॥ 58॥ अनुवाद—महाप्रभु उस अल्प भोजनका भी आधा खाते हैं और श्रीगोविन्द भी शेष आधा खाते हैं, तब सभी भक्तोंने भोजन करना ही छोड़ दिया॥ 58॥ श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वरको अन्यत्र भिक्षा-ग्रहण करनेका आदेश :- गोविन्द-काशीश्वरे प्रभु कैला आज्ञापन। “दुँहे अन्यत्र मागि' कर उदर भरण॥” 59॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर पण्डितको आज्ञा दी,—“आप दोनों कहीं और भिक्षा माँगकर अपनी उदरपूर्ति कर लिया करो॥” 59॥ महाप्रभुके द्वारा भोजनको कम कर देनेके फलस्वरूप भक्तोंके दुःखको सुनकर रामचन्द्रका महाप्रभुके निकट आगमन :- एइरूप महादुःखे दिन कत गेल। शुनि' रामचन्द्रपुरी प्रभुपाश आइल॥ 60॥
244 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/60-68 ] अनुवाद—इस प्रकार महादुःखमें कुछ दिन बीत गये। इस बातको सुनकर रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके पास आये॥60॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥"66॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65-66॥ मानद आचार्यरूपी महाप्रभुके द्वारा सदा रामचन्द्रको सम्मान देना :— प्रणाम करि' प्रभु कैला चरण-वन्दन। प्रभुरे कहये किछु हासिया वचन॥61॥ महाप्रभुको संन्यासी-धर्मकी शिक्षा देना :— “संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय-तर्पण'। यैछे तैछे करे मात्र उदर भरण॥62॥ शुष्क वैराग्यको संन्यास अर्थात् भक्तिके विरुद्ध बतलाकर केवल मुखसे ही प्रचार :— तोमारे क्षीण देखि, शुनि,—कर अर्द्धाशन। एइ 'शुष्क-वैराग्य' नहे संन्यासीर 'धर्म'॥63॥ सभी अवस्थाओंमें युक्तवैराग्यसे ही सिद्धिकी प्राप्ति :— यथायोग्य उदर भरे, ना करे 'विषय'-भोग। संन्यासीर तबै सिद्ध हय ज्ञानयोग॥64॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको प्रणाम करके उनके चरणोंकी वन्दना की। रामचन्द्रपुरीने मुस्कुराते हुए महाप्रभुसे कहा,—“संन्यासीका धर्म इन्द्रिय-तर्पण करना नहीं है, वह तो जिस किसी प्रकारसे केवल मात्र अपने उदरका भरण करता है। मैं तुम्हें बहुत दुबला-पतला देख रहा हूँ और मैंने सुना है कि तुम आजकल आधा भोजन ग्रहण करते हो। ऐसा शुष्क-वैराग्य संन्यासीका धर्म नहीं है। संन्यासीको आवश्यकता अनुसार केवल उदर पूर्ति करनी चाहिये और विषयोंका भोग नहीं करना चाहिये। इसके द्वारा तब संन्यासीका ज्ञानयोग सिद्ध होता है॥61-64॥ सर्वत्र युक्तवैराग्यसे युक्त भक्तियोगसे ही अनर्थ-नाश :— भगवद्-गीता (6/16-17) में— नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥65॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन, अधिक भोजन करनेसे 'योग' नहीं होता; सम्पूर्ण भोजन त्यागसे भी 'योग' नहीं होता एवं अधिक निद्रा अथवा निद्रा त्याग करनेपर भी 'योग' नहीं होता। आहार, विहार, समस्त कर्मोंमें चेष्टा, निद्रा, जागरण आदिके उपयुक्तरूपमें नियमित होनेपर दुःखनाशक 'योग' होता है॥"65-66॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, अत्यश्नतः (अत्यधिकभोजनशीलस्य) तु योगः न अस्ति, न च एकान्तम् अनश्नतः (स्वल्पाहारनिरतस्य निराहारिणः), न च अतिस्वप्नशीलस्य (अधिकनिद्राशीलस्य) न च जाग्रतः (अनिद्रस्य) एव योगः (अस्ति)। युक्ताहारविहारस्य (परिमितभोजनशयनादिपरस्य) कर्मसु (साधनानुष्ठानादिषु) युक्तचेष्टस्य (परिमितारम्भपरस्य) युक्तस्वप्नावबोधस्य (परिमितनिद्रा-जागरणनिष्ठस्य) दुःखहा (सर्वदुःख-निवृत्तिहेतुः) योगः भवति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥65-66॥ अमानी-धर्मके आदर्श महाप्रभुकी दैन्य-उक्ति :— प्रभु कहे,—“अज्ञ बालक मुइ, 'शिष्य' तोमार। मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य आमार॥"67॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं अज्ञानी बालक हूँ, आपका शिष्य हूँ। यह मेरा सौभाग्य ही है कि आप मुझे शिक्षा प्रदान कर रहे हैं॥"67॥ महाप्रभुके भक्तोंके द्वारा आधे भोजनको ग्रहण करनेके विषयमें सुनना :— एत शुनि' रामचन्द्रपुरी उठि' गेला। भक्तगण अर्द्धाशन करे,—गोसाञि शुनिला॥68॥ अनुवाद—इतना सुनकर रामचन्द्रपुरी उठकर चले गये। उन्होंने कई लोगोंसे सुना कि महाप्रभुके भक्त भी
[ 8/68-77 आठवाँ अध्याय 245 अपने भोजनका आधा अंश ही ग्रहण कर रहे हैं॥ 68 ॥ एकदिन श्रीपरमानन्दपुरीको प्रमुख बनाकर भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको यथेष्ट भोजनको ग्रहण करनेका अनुरोध और उनसे रामचन्द्रपुरीके स्वभाव और व्यवहारकी निन्दा :- आर दिन भक्तगणसह परमानन्दपुरी। प्रभु-पाशे निवेदिला दैन्य-विनय करि' ॥ 69 ॥ “रामचन्द्रपुरी हय निन्दुक-स्वभाव। तार बोले अन्न छाड़ि' किबा हवे लाभ ?? 70 ॥ पुरीर स्वभाव, – यथेष्ठ आहार करावा। ये ना खाय, तारे खाओयाय यतन करिया ॥ 71 ॥ खाओयाञा पुनः तारे करये निन्दन। 'एत अन्न खाओ' – तोमार कत आछे धन ?? 72 ॥ संन्यासीके एत खाओयाञा कर धर्म नाश ! अतएव जानिनु, – तोमार किछु नाहि 'भास' ॥ 73 ॥ के कैछे व्यवहारे, केबा कैछे खाय। एइ अनुसन्धान तेंहो करय समाय ॥ 74 ॥ ईर्ष्याके कारण दूसरोंके छल या दोषोंको ढूँढ़ना—शास्त्रविरुद्ध और निषिद्ध :- शास्त्रे येइ दुइ धर्म करियाछे वर्जन। सेइ कर्म निरन्तर इँहार करण ॥ 75 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीपरमानन्दपुरी भक्तोंके साथ महाप्रभुके पास आये और दैन्य-विनय करके उनसे निवेदन करने लगे, – “रामचन्द्रपुरी निन्दुक-स्वभाववाले व्यक्ति हैं। उनके कहनेपर भोजनको छोड़नेसे क्या लाभ होगा? उनका स्वभाव है कि वे भक्तोंको जितना वे खा सकते हैं, उतना भोजन कराते हैं और जो नहीं भी खाना चाहता, उसे बहुत बलपूर्वक खिलाते हैं। आवश्यकतासे अधिक खिलानेके बाद पुनः उनकी निन्दा करते हुए उनसे कहते हैं- 'तुम इतना भोजन करते हो, तुम्हारे पास कितना धन है? इसी प्रकार तुम संन्यासियोंको भी इतना खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करते हो! इसलिये मैं जान गया हूँ कि तुम्हें धर्म-अधर्मका आभास तक भी नहीं है।' कौन किस प्रकारका व्यवहार करता है और कौन क्या खाता है, रामचन्द्रपुरी सदैव इसीका अनुसन्धान करनेमें ही लगे रहते हैं। रामचन्द्रपुरी शास्त्रोंमें निषिद्ध दो प्रकारके कर्मोंको ही सदा करते हैं ॥ 69-75 ॥ श्रीमद्भागवत (11/28/1) में- परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्। विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप देखकर अन्योंके स्वभाव और कर्मकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- श्रीउद्धवसे श्रीभगवान् शुद्धज्ञानीके आचरणकी विधिका वर्णन कर रहे हैं,- प्रकृत्या पुरुषेण च सह एकात्मकं विश्वं पश्यन् परस्वभावकर्माणि (परेषां हिंसार्थं स्वभावान् कर्माणि गुणकृत- नैसर्गिकवृत्याद्यनुष्ठानानि) न प्रशंसेत्, न गर्हयेत् (न निन्देत्)। श्लोक-भावानुवाद - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप (एक अन्तर्यामी पुरुषके द्वारा नियन्त्रित) देखकर अन्योंसे ईर्ष्याके कारण उनके स्वभाव और कर्मोंकी अर्थात् गुणजात स्वभावके अनुरूप क्रियाओंकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ पहले बतलायी गयी प्रशंसाकी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी निन्दा-निषेधरूपी विधि ही शास्त्रका उद्देश्य :- तार मध्ये पूर्वविधि 'प्रशंसा' छाड़िया। परविधि 'निन्दा' करे 'बलिष्ठ' जानिया ॥ 77 ॥ अनुवाद-उन दोनों विधियोंमें-से वे 'प्रशंसा'का त्यागकर प्रथम विधिका पालन करते हैं। वे बादमें
246 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/77-83 ] बतलायी गयी दूसरी विधि 'निन्दा'को बलवान् जानते हैं, परन्तु उसकी उपेक्षा करके अन्योंकी निन्दा करते हैं॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'परस्वभाव'-श्लोकमें पहले बतलायी गयी विधि “प्रशंसा मत करना” और बादमें बतलायी गयी विधि “निन्दा मत करना” है। पहले बतलायी गयी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी विधिके बलवान् होनेपर यही समझा जाता है कि लोगोंकी प्रशंसा करना उतना दोषपूर्ण नहीं है; परन्तु निन्दा निश्चित रूपसे नहीं करनी चाहिये। किन्तु यहाँ रामचन्द्रने पहले बतलायी गयी विधि “अन्योंकी प्रशंसा मत करना”का पालन किया है; बादमें बतलायी गयी विधि “अन्योंकी निन्दा नहीं करना”का पालन नहीं किया। इसलिये रामचन्द्रने बादमें बतलायी गयी विधिके अनुसार कार्य नहीं किया। इस श्लोकके अर्थकी श्लेष-उक्तिपरक कहकर व्याख्या की जा सकती है॥ 77 ॥ बादमें बतलायी गयी विधिका ही अधिक गुरुत्व :— न्यायवचन— पूर्वपरयोर्मध्ये परविधिर्बलवान्॥ 78 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्व और परविधिमें-से परविधि ही बलवान् है॥ 78 ॥ अनुभाष्य— पूर्वपरयोः (प्राक्-परयोर्विध्योः) मध्ये परविधिः (उत्तर-निर्देशः) बलवान्,—पूर्वविधिं त्यक्त्वा परविधिः ग्राह्यः इत्यर्थः। श्लोक-भावानुवाद—पूर्व (पहलेवाली) और परविधिमें-से परविधि (बादवाली) ही बलवान् है—पूर्वविधिका त्यागकर परविधि ही ग्रहण करने योग्य है, यही अर्थ है॥ 78 ॥ रामचन्द्रपुरीकी मक्खी जैसी वृत्ति :— याँहा गुण शत आछे, ना करे ग्रहण। गुणमध्ये छले करे दोष-आरोपण॥ 79 ॥ अनुवाद—जहाँपर एक सौ गुण हैं, वे उन्हें ग्रहण नहीं करते। अपितु वे गुणोंमें भी छलपूर्वक दोषका आरोप करते हैं॥ 79 ॥ रामचन्द्रके व्यवहार और स्वभावसे भक्तोंके हृदयमें दुःख :— इँहार स्वभाव इँहा कहिते ना युयाय। तथापि कहिये किछु मर्म-दुःख पाय॥ 80 ॥ अनुवाद—इनका स्वभाव ही ऐसा है कि उनके विषयमें कुछ भी कहना उचित नहीं है, तथापि मैं हृदयमें कुछ दुःख पानेके कारण ही यह सब कह रहा हूँ॥ 80 ॥ अनुभाष्य—'पाय',—पाकर॥ 80 ॥ आठवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रामचन्द्रके वचनोंको तुच्छ मानकर महाप्रभुको भोजन ग्रहण करनेका अनुरोध :— इँहार वचने केने अन्न त्याग कर? पूर्ववत् निमन्त्रण मान',—सबार बोल धर॥" 81 ॥ अनुवाद—इनके कहनेपर आप भोजनको क्यों त्याग रहे हैं? आप हम सबकी बात मानकर पहलेकी ही भाँति निमन्त्रण स्वीकार कीजिये॥" 81 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा संन्यासी-धर्मकी विधिका निर्णय; विधिके अतीत ईश्वर और अधीन बद्धजीवमें समान बुद्धि करनेवाला ही 'प्राकृत सहजिया'; पुनः स्वयं ईश्वर होनेपर भी स्वयंको वैराग्य-बाध्य जीव मानकर संन्यासी वेषी आचार्यको निरपेक्षताकी शिक्षा-प्रदान :— प्रभु कहे,—“सबे केने पुरीरे कर रोष? 'सहज' धर्म कहे तैं हो, ताँर किबा दोष?? 82 ॥ यति हञा जिह्वा-लाम्पट्य,—अत्यन्त अन्याय। यतिर धर्म,—प्राण राखिते आहारमात्र खाय॥" 83 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप सभी श्रीरामचन्द्रपुरीके
[ 8/82-91 आठवाँ अध्याय 247 प्रति रोष क्यों कर रहे हैं? वे तो सहज धर्मके विषयमें ही बतलाते हैं, इसमें उनका क्या दोष है? संन्यासी होकर जिह्वाके स्वादकी तृप्ति तो बड़ा अपराध है। वास्तवमें संन्यासीका धर्म तो केवल प्राण धारण करनेके लिये ही आहार करना है॥"82-83॥ भक्तोंके आग्रहसे महाप्रभुके द्वारा अर्द्ध-भोजन ग्रहण करना स्वीकार :- तबे सबे मेलि' प्रभुरे बहु यत्न कैला। सबार आग्रहे प्रभु अर्द्धेक राखिला॥84॥ अनुवाद-तब सभी भक्तों ने मिलकर महाप्रभुको पूरा भोजन करनेके लिये बहुत प्रार्थना की, सभी भक्तोंके आग्रहपर महाप्रभुने [एक चौथाईके स्थानपर] आधा भोजन करना स्वीकार किया॥84॥ दुइपण कौड़ि लागे प्रभुर निमन्त्रणे। कभु दुइजन भोक्ता, कभु तिनजने॥85॥ अनुवाद-महाप्रभुको निमन्त्रण करनेपर भोजनका मूल्य दो पण कौड़ी होता था। उस भोजनको कभी दो जन तो कभी तीन जन ग्रहण करते थे॥85॥ अभक्त वर्ण-ब्राह्मण और पंक्ति-ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुके भिक्षाको ग्रहण करनेकी रीतिका वैशिष्ट्य :- अभोज्यान्न विप्र यदि करेन निमन्त्रण। प्रसाद-मूल्य लइते लागे कौड़ि दुइपण॥86॥ अनुवाद-कोई ब्राह्मण जिसके गृहमें भोजन स्वीकार नहीं किया जा सकता, यदि वह महाप्रभुको निमन्त्रण करता तो उसको महाप्रभुके लिये दो पण कौड़ी मूल्यका श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लाना होता॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अभोज्यान्न विप्र',-जिस ब्राह्मणके घरमें भोजन नहीं खाया जाता॥86॥ भोज्यान्न विप्र यदि निमन्त्रण करे। किछु 'प्रसाद' आने, किछु पाक करे घरे॥87॥ अनुवाद-जिसके गृहमें निमन्त्रण स्वीकार किया जा सकता है, यदि ऐसा कोई ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रण करता, तो वह महाप्रभुके लिये कुछ श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मूल्य देकर ले आता और शेष स्वयं अपने घरपर पकाकर खिलाता॥87॥ श्रीगदाधर, श्रीभगवान् और श्रीसार्वभौमके घरमें भक्ताधीन भगवान्का भोजन :- पण्डित-गोसाञि, भगवान्-आचार्य, सार्वभौम। निमन्त्रणेर दिने यदि करे निमन्त्रण॥88॥ ताँ सबार इच्छाय प्रभु करेन भोजन। ताँहा प्रभुर स्वातन्त्र्य नाइ, यैछे ताँर मन॥89॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-यदि इन तीनोंमें-से कोई भी महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके दिन निमन्त्रण देते, तो महाप्रभु उन सबकी इच्छानुसार ही भोजन करते। महाप्रभु भक्तोंके मनके अनुसार ही चलते, उसमें उनकी अपनी कोई भी स्वतन्त्रता नहीं थी॥88-89॥ महाप्रभुके अवतारका उद्देश्य और व्यवहार रीति :- भक्तगणे सुख दिते प्रभुर 'अवतार'। याँहा यैछे योग्य, ताँहा करेन व्यवहार॥90॥ अनुवाद-महाप्रभुका अवतार भक्तोंको सुख देनेके लिये ही हुआ है। महाप्रभु भक्तोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करते॥90॥ महाप्रभुके द्वारा कभी तो प्राकृत-जीवकी भाँति आचरणके द्वारा वञ्चना, कभी परमेश्वरके रूपमें पूर्ण कृपा :- कभु लौकिक रीति,-येन 'इतर' जन। कभु स्वतन्त्र, करेन ऐश्वर्य्य प्रकटन॥91॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो साधारण लोगोंकी भाँति लौकिक रीतिका पालन करते और कभी स्वतन्त्र परमेश्वरके रूपमें अपना ऐश्वर्य्य प्रकट करते थे॥91॥
248 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/92-96 ] कभी तो रामचन्द्रपुरीको लौकिकी मर्यादा-प्रदान, कभी तृणकी भाँति उपेक्षा :- कभु रामचन्द्रपुरीर हय भृत्यप्राय। कभु तारे नाहि माने, देखे तृण-प्राय ॥ 92 ॥ उससे भक्तोंके हृदयका भार कम होना और बन्द हुई साँसका खुलना :- तेंहो गेले प्रभुर गण हैल हरषित। शिरेर पाथर येन पड़िल आचम्बित ॥ 95 ॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो रामचन्द्रपुरीके साथ ऐसा व्यवहार करते जैसे वे स्वयं उनके दास हों और कभी वे उनकी तिनकेके समान उपेक्षा करते ॥ 92 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके जगन्नाथ पुरीसे चले जानेपर महाप्रभुके समस्त भक्त परम प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर रखा कोई भारी पत्थरका बोझा अचानक नीचे गिर पड़ा हो ॥ 95 ॥ अचिन्त्य ईश्वरके समस्त आचरण ही नित्य, मङ्गलमय और सुन्दर :- ईश्वर-चरित्र प्रभुर-बुद्धि-अगोचर। यबे येइ करेन, सेइ सब मनोहर ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'शिरेर पाथर,' - सिरपर जो पत्थरका बोझा था, उसके अचानक गिर जानेसे जिस प्रकार सिर हलका हो जाता है, वैसा हुआ ॥ 95 ॥ आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुवाद-महाप्रभुका आचरण उनकी स्वयं-भगवत्ताके अनुरूप ही होता है जो सबकी बुद्धिके अगोचर है। वे स्वतन्तरूपमें जब जो कुछ करते हैं, वह सब मनोहर होता है ॥ 93 ॥ लौकिक शुष्क वैराग्यकी विधिको त्याग करके श्रीगौरमें समर्पित प्राणवाले भक्तोंके द्वारा अपनी सर्वात्माके द्वारा महाप्रभुको सन्तुष्ट करना :- स्वच्छन्दे निमन्त्रण, प्रभुर कीर्त्तन-नर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन सबे प्रसाद-भोजन ॥ 96 ॥ भगवान्का आश्रय परित्यागकर रामचन्द्रकी तीर्थयात्रा :- एइमत रामचन्द्रपुरी नीलाचले। दिन कत राहि' गेला 'तीर्थ' करिबारे ॥ 94 ॥ अनुवाद-अब भक्त महाप्रभुको स्वच्छन्द रूपसे निमन्त्रण करते, महाप्रभु स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन और नृत्य करते एवं समस्त भक्त स्वच्छन्द रूपसे प्रसाद ग्रहण करते ॥ 96 ॥ अनुवाद-इस प्रकार रामचन्द्रपुरी कुछ दिनों तक नीलाचलमें रहनेके पश्चात् तीर्थ करनेके लिये चले गये ॥ 94 ॥
[ 8/96-101 आठवाँ अध्याय 249 गुरुकी अवज्ञाके कारण गुरुके द्वारा उपेक्षाके फलस्वरूप जीवोंका विष्णु-विरोध अथवा पाखण्डी बनना :- गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे फल हय। क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे ठेकय ॥ 97 ॥ अनुवाद—गुरुके द्वारा उपेक्षा किये जानेपर ऐसा ही फल हुआ करता है, गुरुके प्रति अपराध क्रमशः बढ़ते-बढ़ते भगवान्के प्रति भी अपराध होने लगता है॥ 97 ॥ अपराधी रामचन्द्रके व्यवहारके द्वारा महाप्रभुकी लोकशिक्षा :- यद्यपि गुरुबुद्ध्ये प्रभु तार दोष ना लइल। तार फलद्वारा लोके शिक्षा कराइल ॥ 98 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीके प्रति गुरुबुद्धि रखनेके कारण उनका कोई दोष नहीं लिया, तथापि उन्होंने रामचन्द्रपुरीके गुरु-अपराधके फलके द्वारा लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 98 ॥ कानके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके पानके फलसे हृदय-कानको रसायनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र—येन अमृतेर पूर। शुनिते श्रवणे मने लागये मधुर ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र अमृतसे भरपूर है। उसका सुनना कानों और मनको बहुत मधुर लगता है॥ 99 ॥ चैतन्यचरित्रके श्रवणसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र लिखि, शुन एकमने। अनायासे पाबे प्रेम श्रीकृष्णचरणे ॥ 100 ॥ अनुवाद—मैं (ग्रन्थकार) श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरित्रको लिख रहा हूँ। हे पाठकगण ! आप एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो, इसके द्वारा आपको अनायास ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रति प्रेमकी प्राप्ति होगी ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 101 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भिक्षासङ्कोचो नाम अष्टमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 101 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें भिक्षासङ्कोच नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
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नौवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें श्रीभवानन्द रायके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायकके द्वारा राजाके धनको नष्ट करनेके फलसे युवराज बड़-जानाका रुष्ट होना और उसके फलस्वरूप उन्हें पहले चाङ्ग (पयर 13का अमृतप्रवाह भाष्य देखें) पर चढ़ाना तथा बादमें महाप्रभुकी कृपाके छलसे उनके उद्धार और उन्नतिका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौरभक्तोंकी कृपासे अधम विषयी व्यक्तियोंको भी कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां प्रेमवन्वया। निन्येऽधन्यजनस्वान्तमरुं शश्वदनूपताम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—असंख्य [धन्य] चैतन्य भक्तोंकी प्रेमकी बाढ़के द्वारा अधन्य व्यक्तियोंके [भक्तिरहित] अन्तःकरणरूपी रेगिस्तान भी जलमय हो गये थे॥ १॥ अनुभाष्य— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां (अगण्याः गणयितुमशक्याः असंख्याः धन्याः लब्धसिद्धयश्च ये चैतन्यगणाः चैतन्यपादाश्रिताः भक्ताः तेषां) प्रेमवन्वया (प्रेमरूपनदीगर्भातिरिक्तजलप्रवाहेण) अधन्यजनस्वान्तमरुम् (अधन्यानाम् अधमानां जनानां भक्तिरहितानां स्वानाम् अन्तःकरणरूपं मरुं निर्जलप्रदेशं) शश्वत् (निरन्तरं) अनूपतां (जलप्रायतां) निन्ये (प्रापितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय। जय जय नित्यानन्द करुण-हृदय॥ २॥ अनुवाद—दयामय श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ २॥ जयद्वैताचार्य जय जय दयामय। जय गौरभक्तगण सब रसमय॥ ३॥ अनुवाद—दयामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। आनन्दसे परिपूर्ण समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ ३॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल-लीला :— एइमत महाप्रभु भक्तगण सङ्गे। नीलाचले वास करेन कृष्णप्रेमरङ्गे॥ ४॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते हुए कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें डूबे रहते थे॥ ४॥ महाप्रभुके अन्तरमें और बाहरमें कृष्णविरहप्रेम :— अन्तरे-बाहिरे कृष्णविरह-तरङ्ग। नाना-भावे व्याकुल मन आर अङ्ग॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुके भीतर और बाहर कृष्णविरहकी तरङ्गें उठती रहती थीं। अनेक प्रकारके भावोंसे महाप्रभुके मन और शरीर व्याकुल रहते॥ ५॥ दिनके समय नृत्य, कीर्तन और दर्शन, रात्रिके समय श्रीस्वरूप और श्रीरायके साथ रसास्वादन :— दिने नृत्य-कीर्त्तन, जगन्नाथ-दरशन। रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन॥ ६॥ अनुवाद—दिनमें महाप्रभु नृत्य, कीर्तन और भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करते। रात्रिमें वे श्रीरामानन्द राय और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ रसका आस्वादन करते॥ ६॥ महाप्रभुका दर्शन करनेमात्रसे ही उद्धार और कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— त्रिजगतेर लोक आसि' करेन दरशन। येइ देखे, सेइ पाय कृष्णप्रेम-धन॥ ७॥
252 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/7-13 ] अनुवाद—त्रिभुवनके लोग आकर महाप्रभुके दर्शन करते और जो कोई भी उनके दर्शन करता, उसको कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति हो जाती॥7॥ मनुष्यके वेषमें अनन्त ब्रह्माण्डवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- मनुष्येर वेशे आसि' गन्धर्व-किन्नर। सप्तपातालेर यत दैत्य विषधर॥8॥ अनुवाद—सात उच्च लोकोंसे गन्धर्व-किन्नर आदि और पातालादि सात निम्न लोकोंसे दैत्य तथा नाग आदि मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुका दर्शन करते॥8॥ अनुभाष्य—'विषधर',—नागलोक॥8॥ सप्तद्वीपे नवखण्डे वैसे यत जन। नाना-वेशे आसि' करे प्रभुर दरशन॥9॥ अनुवाद—सात द्वीपों और नौ खण्डोंमें रहनेवाले लोग भी विविध वेश धारण करके महाप्रभुके दर्शन करने आते॥9॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 2/10 संख्या देखें॥9॥ वैष्णवोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- प्रह्लाद, बलि, व्यास, शुक आदि मुनिगण। आसि' प्रभु देखि' प्रेमे हय अचेतन॥10॥ अनुवाद—श्रीप्रह्लाद महाराज, श्रीबलि महाराज, श्रीव्यासदेव, श्रीशुकदेव गोस्वामी आदि मुनिगण आकर महाप्रभुके दर्शन करते और प्रेममें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते॥10॥ अनुभाष्य—'प्रह्लाद',—किसी-किसी ऐतिहासिक-मतमें ये त्रेतायुगमें पंजाब प्रदेशकी राजधानी मुलतानमें कश्यपवंशीय राजा हिरण्यकशिपुके वैष्णव-पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए थे। पिता हिरण्यकशिपुके विष्णु-विद्वेषके फलसे पुत्र प्रह्लादको अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़े थे, बादमें भगवान् श्रीनृसिंहदेवने आविर्भूत होकर वैष्णव-विद्वेषी असुर सम्राट्का वध किया था। 'बलि',—प्रह्लादके पुत्र विरोचनके पुत्र ही बलि हैं; भगवान्ने वामनके रूपमें अवतीर्ण होकर तीन पग भूमिकी प्रार्थनाके छलसे आत्मसमर्पण करनेवाले बलिपर कृपा की थी। इनके सौ पुत्रोंमें-से बाण सबसे बड़े थे। 'व्यास',—पाराशरके पुत्र, सात्यवतेय [सत्यवतीके पुत्र] अथवा कृष्ण-द्वैपायन बादरायण-मुनि; ये वेदोंका विभाग करके 'वेदव्यास'के नामसे कहलाये और इन्होंने अठारह महापुराण एवं ब्रह्मसूत्र और उसके भाष्य श्रीमद्भागवत ग्रन्थका प्रणयन किया; ये ब्रह्म-सम्प्रदायके अन्तर्गत श्रीनारद ऋषिके शिष्य थे। 'शुक',—व्यासके पुत्र, पहले आकुमार ब्रह्मज्ञानी और नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी लीला दिखलाकर इन्होंने एकान्तिक रूपसे कृष्णकी 'कीर्तनाख्या' भक्तिका आश्रय ग्रहण किया॥10॥ गृहके भीतर बैठे हुए महाप्रभुके दर्शनार्थियोंका बाहरमें कोलाहल, महाप्रभुके द्वारा दर्शन देना, सभीको कृष्णकथा-कीर्तन करनेका आदेश :- बाहिरे फुकारे लोक, दर्शन ना पाञा। “कृष्ण कह” बलेन प्रभु बाहिरे आसिया॥11॥ अनुवाद—दर्शनार्थी भक्त उनके दर्शन नहीं पाकर उनके वासस्थानके बाहर कोलाहल करते। तब महाप्रभु बाहर आकर उन्हें कहते,—“कृष्ण बोलो॥”11॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीमें कृष्णप्रेम :- प्रभुर दर्शने सब लोक प्रेमे भासे। एइमत याय प्रभुर रात्रि-दिवसे॥12॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शन करके समस्त लोग प्रेममें निमग्न हो जाते। इसी प्रकार महाप्रभुके रात-दिन व्यतीत होते॥12॥ महाप्रभुको राजा प्रतापरुद्रके पुत्रके द्वारा श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको मृत्यु-दण्डके विषयमें बतलाना :- एकदिन लोक आसि' प्रभुरे निवेदिल। “गोपीनाथेरे 'बड़ जाना' चाङ्गे चढ़ाइल॥13॥
[ 9/13–21 नौवाँ अध्याय 253 महाप्रभुकी कृपाके बिना उसकी रक्षा होनेके कोई उपाय नहीं :— तले खड्ग पाति’ तारे उपरे डारिबे। प्रभु रक्षा करेन यबे, तबे निस्तारिबे ॥ 14 ॥ सेवककी रक्षाके लिये महाप्रभुकी कृपाकी याचना :— सवंशे तोमार सेवक—भवानन्द-राय। ताँर पुत्र—तोमार सेवके राखिते युयाय ॥” 15 ॥ अनुवाद—एकदिन कुछ लोगोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया,—“युवराज ‘बड़ जाना’ने गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उसने नीचे तलवारोंको बिछा दिया है। वह गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर फैंकवा देगा। हे महाप्रभु! आप यदि रक्षा करें, तभी गोपीनाथ बच सकता है। श्रीभवानन्द राय और उनका पूरा परिवार आपके सेवक हैं। इसलिये आपके लिये श्रीभवानन्द रायके पुत्रकी रक्षा करना ही उपयुक्त है॥ 13–15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘बड़ जाना’,—उड़ीसाके महाराजके बड़े पुत्र अर्थात् युवराज। ‘चाङ्ग’,—वध करनेकी विशेष प्रक्रियाके लिये व्यवहार किये जानेवाला मञ्च,—जिसके नीचेवाले भागमें नंगी तलवारें रखी होती हैं। दण्डित व्यक्तिको मञ्चके ऊपरसे तलवारोंके ऊपर फेंककर उसके प्राणोंका नाश किया जाता है ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—‘डारिबे’,—फेंक देंगे ॥ 14 ॥ महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें संवाददाताके द्वारा गोपीनाथके मृत्यु-दण्डके वृत्तान्तका वर्णन :— प्रभु कहे,—“राजा केने करये ताड़न?” तबे सेइ लोक कहे सब विवरण ॥ 16 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायक—रामानन्द-भाइ। सर्वकाल हय सेइ ‘राजविषयी’ ताइ ॥ 17 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“राजा गोपीनाथको दण्ड क्यों दे रहे हैं?” तब वे व्यक्ति सब वृत्तान्त सुनाने लगे,—“श्रीरामानन्द रायके भाई गोपीनाथ पट्टनायक सदासे राजाकी सम्पत्तिके रक्षकके रूपमें कार्य करनेवाले हैं ॥ 16–17 ॥ अनुभाष्य— ‘राजविषयी’,—राजाकी सम्पत्तिके रक्षक ॥ 17 ॥ ‘मालजाठ्या-दण्डपाटे’ तार अधिकार। साधि’ पाड़ि’ आनि’ द्रव्य दिल राजद्वार ॥ 18 ॥ दुइलक्ष काहन तार ठाञि बाकी हइल। दुइलक्ष काहन कौड़ि राजा त’ मागिल ॥ 19 ॥ अनुवाद—मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानपर उनकी नियुक्ति हुई है और वे वहींसे राजस्व एकत्रित करके राजाके कोषमें जमा कराते हैं। उनके द्वारा दो लाख काहन कौड़ी कोषमें जमा करवाना शेष रह गया है, इसलिये राजाने उनसे वही दो लाख काहन कौड़ी माँगी है॥ 18–19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘मालजाठ्या-दण्डपाट’,—मालजाठ्या नामक राज्यके खण्डमें तहसीलदार गोपीनाथ पट्टनायकने जितना पैसा राजाको दिया था, उसमें दो लाख काहन कौड़ी शेष रह गया था ॥ 19 ॥ तेँह कहे,—‘स्थूलद्रव्य नाहि ये दिब। क्रमे-क्रमे बेचि’ किनि’ द्रव्य भरिब ॥ 20 ॥ घोड़ा दश-बार हय, लह’ मूल्य करि’।’ एत बलि’ घोड़ा आने राजद्वारे धरि’ ॥ 21 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ पट्टनायकने राजासे कहा,—‘मेरे पास अभी कौड़ीके रूपमें धन नहीं है जो आपको दे सकूँ। मैं धीरे-धीरे अपनी सम्पत्ति क्रय-विक्रय करके आपका बचा हुआ धन चुका दूँगा। मेरे पास दस-बारह घोड़े हैं, आप उनका मूल्य लगाकर उन्हें खरीद लीजिये।’ यह कहकर गोपीनाथ पट्टनायक घोड़ोंको ले आये और उन्हें राजद्वारपर बाँध दिया ॥ 20–21 ॥ अनुभाष्य—‘स्थूलद्रव्य’,—मूल्यवान द्रव्य अथवा मोटा
254 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/20-30 ]
पैसा अर्थात् जो एक बारमें देनेसे ही सब चुक जाता है, ऐसा द्रव्य; 'द्रव्य भरिब',-राजाके द्वारा प्राप्य द्रविण (चल-सम्पत्ति) अर्थात् पैसा चुकाऊँगा॥ 20 ॥
एक राजपुत्र घोड़ार मूल्य भाल जाने। तारे पाठाइल राजा पात्र-मित्र-सने॥ 22 ॥ सेइ राजपुत्र मूल्य करे घाटाञा। गोपीनाथेर क्रोध हैल मूल्य शुनिया॥ 23 ॥
अनुवाद—एक राजकुमार घोड़ोंके मूल्यको भली-भाँति जानता था, इसलिये राजाने उसे अपने मंत्रियों और मित्रोंके साथ घोड़ोंका मूल्य करनेके लिये भेजा। उस राजकुमारने जान-बूझकर घोड़ोंका बहुत कम मूल्य लगाया। जब गोपीनाथने घोड़ोंके लगाये मूल्यको सुना तो उन्हें बहुत क्रोध आया॥ 22-23 ॥
अनुभाष्य- 'घाटाञा', - कम करके॥ 23 ॥
सेइ राजपुत्रेरे स्वभाव, —ग्रीवा फिराय। ऊर्ध्वमुखे बारबार इति-उति चाय॥ 24 ॥ तारे निन्दा करि' कहे सगर्व वचने। राजा कृपा करे तारे, भय नाहि माने॥ 25 ॥ 'आमार घोड़ा ग्रीवा उठाय ऊर्ध्वे नाहि चाय। ताते घोड़ार मूल्य घाटि करिते ना युयाय॥ '26 ॥
अनुवाद—उस राजकुमारका अपनी गर्दनको घुमाते हुए अपने मुखको ऊपर करके बारम्बार इधर-उधर देखनेका स्वभाव था। गोपीनाथ राजकुमारसे डरते नहीं थे, क्योंकि राजा उनके प्रति बहुत कृपालु थे, इसलिये गोपीनाथने उस राजकुमारपर व्यङ्ग करते हुए गर्वसे कहा, —'मेरे घोड़े अपनी गर्दनको घुमाते हैं, किन्तु वे ऊपरकी ओर नहीं देखते। इसलिये घोड़ोंका मूल्य घटाना उचित प्रतीत नहीं होता॥' 24-26 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो राजकुमार घोड़ेके मूल्यको स्थिर कर रहा था, उसका गर्दनको ऊपर उठाकर ऊपर देखनेका स्वभाव था। उस विषयमें परिहास करनेके लिये गोपीनाथने कहा, -'यद्यपि मेरे घोड़े गर्दन तो उठाते हैं, किन्तु ऊपरकी ओर नहीं देखते; अतएव इनका मूल्य कम नहीं हो सकता।' परिहास करनेका तात्पर्य यह है, - 'तुम्हारी अपेक्षा मेरे घोड़ोंका मूल्य कम नहीं है॥' 26 ॥
शुनि' राजपुत्र-मने क्रोध उपजिल। राजार ठाञि याइ' बहु लागानि करिल॥ 27 ॥ 'कौड़ि नाहि दिबे एइ, बेड़ाय छद्म करि'। आज्ञा कर, -चाङ्गे चढ़ाना लइ कौड़ि॥' 28 ॥
अनुवाद—गोपीनाथके व्यङ्गको सुनकर राजकुमार बहुत क्रोधित हो गया। उसने राजाके पास जाकर गोपीनाथके प्रति झूठा दोषारोपण करते हुए कहा, - 'गोपीनाथ हमें देय धन नहीं देना चाहता, उसके पास धन है, किन्तु वह उसे छलसे इधर-उधर उड़ा रहा है। आप यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं उसे चाङ्गपर चढ़ाकर देय धन निकलवा लूँ॥' 27-28 ॥
अनुभाष्य- 'लागानि', — मिथ्या दोषारोपण अथवा अभियोग॥ 27 ॥
राजा बले, - 'येइ भाल, कर सेइ याय। ये उपाये कौड़ि पाइ, कर से उपाय॥' 29 ॥
अनुवाद-राजाने कहा, - 'जो अच्छा हो, तुम जाकर वही करो। जिस उपायसे हमें उससे धनकी प्राप्ति हो, तुम वही उपाय करो॥' 29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'याय', - जाकर॥ 29 ॥
राजपुत्र आसि' तारे चाङ्गे चढ़ाइल। खड्ग-उपरे फेलाइते तले खड्ग पातिल॥' 30 ॥
अनुवाद-राजकुमारने आकर गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उन्हें तलवारोंके ऊपर फेंकनेके लिये उसने मञ्चके नीचे तलवारें भी बिछवा दी हैं॥' 30 ॥
[ 9/31-40 नौवाँ अध्याय 255 महाप्रभुके द्वारा निरपेक्षताका प्रदर्शन और गोपीनाथका तिरस्कार :- शुनि' प्रभु कहे किछु करि' प्रणय-रोष। “राज-कौड़ि दिते नारे, राजार किबा दोष ?? 31 ॥ अनुवाद—सारा वृत्तान्त सुननेके बाद महाप्रभुने कुछ प्रणय-रोष करते हुए कहा, — “गोपीनाथ राजाका धन दे नहीं सकता तो इसमें राजाका क्या दोष है ? 31 ॥ अनुभाष्य—'दिते नारे', —दे नहीं सकता ॥ 31 ॥ राज-विलात् साधि' खाय, नाहि राज-भय। दारी-नाटुयारे दिया करे नाना व्यय ॥ 32 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ लोगोंसे राजकर लेकर उसे स्वयं उपभोग करता है। राजाका कोई भय नहीं करके वह वेश्याओं और नर्तकियोंपर धनको लुटाता है ॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राज-विलात्', —बाहरसे राजाको प्राप्त होनेवाला कर (राजाका भण्डार अथवा सम्पत्ति); 'दारी-नाटुयारे', —वेश्या और नर्तकियोंपर। इन सब लोगोंको देकर धन व्यय करता है, राजाको भी पैसे देने पड़ेंगे,—इस प्रकारका भय नहीं करता ॥ 32 ॥ येइ चतुर, सेइ करे राजार विषय। राज-द्रव्य शोधि' पाय, ताहा करे व्यय ॥” 33 ॥ अनुवाद—जो चतुर है, उसे ही राजकर संग्रह आदि कार्य करने चाहिये। राजाके धनको उन्हें देनेके पश्चात् जो कुछ बचता है, उसे उसीको व्यय करना चाहिये ॥” 33 ॥ उस समय महाप्रभुको श्रीभवानन्दादिके सपरिवार बन्धनके समाचारकी प्राप्ति :- हेनकाले आर लोक आइल धाञा। “वाणीनाथादि सवंशे लञा गेल बान्धिया ॥” 34 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़कर आया और महाप्रभुसे कहने लगा,—'राजकर्मचारी वाणीनाथ आदिको भी परिवारसहित बाँधकर ले गये हैं ॥' 34 ॥ संन्यास धर्मके आदर्शरूपमें महाप्रभुके द्वारा सांसारिक बातोंमें उदासीनता या निरपेक्षताका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,—“राजा आपने लेखार द्रव्य लइब। आमि—विरक्त संन्यासी, ताहे कि करिब ?? 35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “राजाका जो अपना धन है, उसे वे अपने आप लेंगे। मैं तो विरक्त संन्यासी हूँ, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” 35 ॥ अनुभाष्य—'लेखार द्रव्य'—हिसाबका पैसा ॥ 35 ॥ श्रीस्वरूप-दामोदरादि भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको उदासीनता छोड़कर श्रीरामानन्दके स्वजनोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना :- तबे स्वरूपादि गोसाञिर भक्तगण। प्रभुर चरणे सबे कैला निवेदन ॥ 36 ॥ “रामानन्द-रायेर गोष्ठी, सब—तोमार 'दास'। तोमार उचित नहे करिते उदास ॥” 37 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदि भक्तोंने महाप्रभुके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हुए कहा, — “रामानन्द रायका सम्पूर्ण परिवार ही आपका दास है, उनके प्रति उदासीन होना आपके लिये उचित नहीं है ॥” 36-37 ॥ महाप्रभुके द्वारा क्रोध और भर्त्सना :- शुनि' महाप्रभु कहे सक्रोध वचने। “मोरे आज्ञा देह' सबे, याङ राजस्थाने ! ! 38 ॥ तोमा सबार एइ मत, —राज-ठाञि याञा। कौड़ि मागि' लइ आँचल पातिया ॥ 39 ॥ संन्यासीकी विषयी बातोंमें अयोग्यता :- पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ब्राह्मण। मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष काहन ? ?' 40 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर
256 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/38-49 ] कहा, — “तुम सभी मुझे राज-दरबारमें जानेका आदेश दे रहे हो! तुम सभीका यही मत है कि मैं राजाके पास जाकर आँचल फैलाकर उससे कौड़ियोंके लिये याचना करूँ। वैसे भी संन्यासी ब्राह्मण तो केवल पाँच गण्डके ही योग्य होता है, तब फिर उसके माँगनेपर राजा दो लाख काहन क्यों देगा?” 38-40 ॥ अनुभाष्य— 'संन्यासी ब्राह्मण', — धनहीन विषय-त्यागी भिक्षावृत्तिके द्वारा जीवन धारण करनेवाला ॥ 40 ॥ 'गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिया ही जानेवाला है'— महाप्रभुको इस समाचारकी प्राप्ति :— हेनकाले आर लोक आइल धाञा। खड्गेर उपरे गोपीनाथे दितेछे डारिया ॥ 41 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़ते हुए आया और उसने बतलाया कि राज-कर्मचारी गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर डालने ही वाले हैं ॥ 41 ॥ भक्तोंके द्वारा गोपीनाथकी रक्षाके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुकी कठोर निरपेक्षता :— शुनि' प्रभुर गण प्रभुरे करे अनुनय। प्रभु कहे, — “आमि भिक्षुक, आमा हैते किछु नय ॥ 42 ॥ उसके लिये श्रीजगन्नाथके चरणोंमें प्रार्थना करनेके लिये सभीको उपदेश :— तारे रक्षा करिते यदि हय सबार मने। सबे मेलि' याह जगन्नाथेर चरणे ॥ 43 ॥ श्रीजगन्नाथदेव—स्वयं ईश्वर और सभीके प्रभु :— ईश्वर जगन्नाथ, —याँर हाते सर्व 'अर्थ'। कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ ॥” 44 ॥ अनुवाद—यह समाचार सुनकर भक्तोंने पुनः महाप्रभुसे अनुनय-विनय किया, किन्तु महाप्रभुने कहा, — “मैं तो भिक्षुक हूँ, मेरे द्वारा कुछ भी नहीं होगा। यदि तुम सबके मनमें उसकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो तुम सभी मिलकर भगवान् जगन्नाथके चरणकमलोंमें प्रार्थना करो। जगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उन्हींके हाथोंमें सब कुछ करनेकी शक्ति है। वे कुछ करने, कुछ नहीं करने अथवा अन्य कुछ करनेमें समर्थ हैं॥” 42-44 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ',—कुछ करने, कुछ नहीं करने या कुछ अन्य करनेमें उन्हींका सामर्थ्य है ॥ 44 ॥ प्रतापरुद्रसे हरिचन्दन-महापात्रके द्वारा गोपीनाथके प्राणोंकी भिक्षाकी याचना :— इँहा यदि महाप्रभु एतेक कहिला। हरिचन्दन-पात्र याइ' राजारे कहिला ॥ 45 ॥ हत्या अथवा प्राणदण्डकी विधिकी अनावश्यकता :— “गोपीनाथ-पट्टनायक—सेवक तोमार। सेवकेर प्राणदण्ड नहे व्यवहार ॥ 46 ॥ विशेष ताहार ठाञि कौड़ि बाकी हय। प्राण निले किबा लाभ? निज धनक्षय ॥ 47 ॥ यथार्थमूल्ये घोड़ा लह, येबा बाकी हय। क्रमे क्रमे दिबे अर्थ, प्राण केने लय ॥” 48 ॥ अनुवाद—यहाँ जब महाप्रभुने ऐसा कहा, तभी राजाके मन्त्री हरिचन्दन महापात्रने जाकर राजासे कहा,— “हे महाराज ! गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके सेवक हैं, सेवकको प्राणदण्ड देना उचित नहीं है। विशेष करके आपने तो उससे बहुत धन लेना है। गोपीनाथके प्राण लेनेसे आपको क्या लाभ होगा? अपितु अपने धनकी ही हानि होगी। आप वास्तविक मूल्यपर उसके घोड़े खरीद लीजिये और जो शेष धन रह जायेगा, उसे वह धीरे-धीरे चुका देगा। आप व्यर्थमें उसके प्राण क्यों लेते हैं?” 45-48 ॥ अनुभाष्य— 'व्यवहार',—विधिसङ्गत, उचित ॥ 46 ॥ गोपीनाथके प्राण-दण्डके सम्बन्धमें राजाके द्वारा अपनी सम्पूर्ण अनभिज्ञता बतलाना :— राजा कहे, — “एइ बात आमि नाहि जानि। प्राण केने लइब, तार द्रव्य चाहि आमि ॥ 49 ॥
[ 9/49-57 नौवाँ अध्याय 257 तत्क्षणात् गोपीनाथकी रक्षाके लिये आदेश देना :- तुमि याइ' कर ताँहा सर्व समाधान। द्रव्य यैछे आइसे, आर राख तार प्राण॥”50॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“मैं गोपीनाथको प्राण-दण्ड देनेकी बातको तो जानता नहीं हूँ। उसके प्राण क्यों लें? मैं तो केवल उससे धन ही लेना चाहता हूँ। तुम स्वयं जाकर सब समाधान करो। ऐसा उपाय करो, जिससे हमारा धन भी मिल जाय और उसके प्राण भी बच जाँय॥”49-50॥ युवराजको कहकर गोपीनाथके प्राणोंकी रक्षा :- तबे हरिचन्दन आसि' जानारे कहिल। चाङ्गे हैते गोपीनाथे शीघ्र नामाइल॥51॥ अनुवाद—तब हरिचन्दनने आकर बड़-जानाको राजाकी इच्छासे अवगत कराया और उन्होंने शीघ्र ही गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गसे नीचे उतारा॥51॥ राजाके धनको लौटानेके उपायकी जिज्ञासा, गोपीनाथका उत्तर :- 'द्रव्य देह'—राजा मागे, उपाय पुछिल। “यथार्थ-मूल्ये घोड़ा लह”, तेंह त' कहिल॥52॥ “क्रमे क्रमे दिमु, आर यत किछु पारि। अविचारे प्राण लह,—कि बलिते पारि??”53॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“राजा तुमसे धन माँग रहे हैं, मुझे बताओ कि तुम्हारे पास उसके लिये क्या उपाय है?” श्रीगोपीनाथ पट्टनायकने कहा,—“आप लोग उचित मूल्य देकर मेरे घोड़े खरीद लो। मैं धीरे-धीरे करके जितना हो सकेगा, शेष धन भी लौटा दूँगा। किन्तु युवराज तो बिना कोई विचार किये मेरे प्राण लेना चाहता है, इसपर मैं क्या कह सकता हूँ?”52-53॥ यथार्थ मूल्य करि' घोड़ा-मूल्ये लइल। आर द्रव्येर मुद्दती करि' घरे पाठाइल॥54॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने उचित मूल्यपर श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके सब घोड़ोंको खरीद लिया और शेष राशिके लिये समय निश्चित करके उन्हें घर भेज दिया॥54॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुद्दती करि',—पैसे देनेके (मियाद) समयको स्वीकार करवाकर॥54॥ समाचार लानेवालेसे महाप्रभुके द्वारा वाणीनाथके विषयमें जिज्ञासा :- एथा प्रभु सेइ मनुष्येरे प्रश्न कैल। “वाणीनाथ कि करे, यबे बान्धिया आनिल??”55॥ अनुवाद—इधर महाप्रभुने संवाद लानेवाले व्यक्तिसे प्रश्न किया,—“जब राज-कर्मचारी वाणीनाथको बाँधकर ला रहे थे, तब वे क्या कर रहे थे?”55॥ वाणीनाथके द्वारा हाथपर संख्या-नाम-ग्रहण :- “वाणीनाथ निर्भयेते लय कृष्णनाम। 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' कहे अविश्राम॥56॥ संख्या लागि' दुइ-हाते अङ्गुलीते लेखा। सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे काटे रेखा॥”57॥ अनुवाद—संवाद लानेवालेने कहा,—“श्रीवाणीनाथ निर्भय होकर कृष्णनाम कर रहे थे, वे निरन्तर 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' महामन्त्र ही कह रहे थे। श्रीवाणीनाथ संख्यापूर्वक नाम करनेके उद्देश्यसे अपने दोनों हाथोंकी अँगुलियोंपर गणना कर रहे थे। जब उनका एक हजार नाम करना पूर्ण हो जाता, तब वे अपने शरीरपर एक चिह्न बना लेते॥”56-57॥ अनुभाष्य—संख्या-ग्रहण करनेमें नियमकी रक्षा करते हुए “हरे कृष्ण”-महामन्त्र (सोलह नाम, बत्तीस अक्षर) कीर्तन करनेकी विधि—एकान्तिक नामाश्रित प्रत्येक साधकके लिये ही सुखमें-दुःखमें, सम्पदमें-विपत्तिमें— सभी अवस्थाओंमें सदा पालनीय है, ऐसा जाना जा रहा है॥56-57॥
258 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/58–68 ]
यह सुनकर महाप्रभुको आनन्द :— शुनि' महाप्रभु हइला परम आनन्द। के बुझिते पारे गौरेर कृपा–छद्मबन्ध ? ? 58 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको परम आनन्द हुआ। श्रीगौरसुन्दरकी गुप्त रूपमें की गयी कृपाको भला कौन समझ सकता है ? 58 ॥ अनुभाष्य—'कृपा–छद्मबन्ध',—दैव–संघटनके छलसे अनुग्रह ॥ 58 ॥ काशीमिश्रका आगमन; उन्हें अपनी आलालनाथकी यात्राके विषयमें बतलाना :— हेनकाले काशीमिश्र आइला प्रभु–स्थाने। प्रभु ताँरे कहे किछु सोद्वेग–वचने ॥ 59 ॥ “इँहा रहिते नारि, यामु आलालनाथ। नाना उपद्रव इँहा, ना पाइ सोयाथ ॥ 60 ॥ श्रीभवानन्द–रायके वंशके व्यक्तियोंके विषयमें अभियोग :— भवानन्द–रायेर गोष्ठी करे राजविषय। नानाप्रकारे करे तारा राजद्रव्य–व्यय ॥ 61 ॥ राजार कि दोष ? राजा निज–द्रव्य चाय। दिते नारे द्रव्य, दण्ड आमारे जानाय ॥ 62 ॥ राजा गोपीनाथे यदि चाङ्गे चड़ाइल। चारिबारे लोके आसि' मोरे जानाइल ॥ 63 ॥ महाप्रभुकी सांसारिक बातोंमें अनिच्छा बतलाना :— भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी। आमाय दुःख देय, निज दुःख कहिं आसिं ॥ 64 ॥ आजि तारे जगन्नाथ करिला रक्षण। कालि के राखिबे, यदि ना दिबे राजधन ? ? 65 ॥ विषयीर वार्त्ता शुनि' क्षोभ हय मन। ताते इँहा राहि' मोर नाहि प्रयोजन ॥” 66 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीकाशीमिश्र महाप्रभुके पास आये और उन्हें देखकर महाप्रभुने कुछ उद्वेगके साथ कहा,—“मैं यहाँ रह नहीं पाऊँगा, मैं आलालनाथ चला जाऊँगा। यहाँ जगन्नाथपुरीमें अनेक प्रकारके उपद्रव हैं, मुझे यहाँ शान्ति नहीं मिलती। भवानन्द रायके परिवारवाले राजकार्य करते हैं, परन्तु वे अनेक प्रकारसे राजाके धनका व्यय करते हैं। इसमें राजाका क्या दोष है? राजा तो राजकीय धन चाहता है। जब देय राजकीय धनको दे नहीं पानेपर राजा उन्हें दण्ड देता है, तब वे मुझे दण्ड और उससे रक्षाकी बात कहलवा भेजते हैं। जब राजाने गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ाया, तब चार बार लोगोंने आकर मुझे सूचना दी। मैं भिक्षा माँगकर जीविका निर्वाह करनेवाला संन्यासी हूँ। और मैं निर्जन स्थानमें एकान्त वास करता हूँ, किन्तु ये लोग आकर अपने दुःखके विषयमें बतलाकर मुझे दुःखी करते हैं। आज भगवान् श्रीजगन्नाथने गोपीनाथकी रक्षा की है। किन्तु यदि वह फिरसे राजधन नहीं देगा, तो कल कौन उसकी रक्षा करेगा? विषयी व्यक्तियोंकी बात सुननेसे मनमें क्षोभ होता है, इसलिये मेरा यहाँ रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है॥” 59–66 ॥ काशीमिश्रका महाप्रभुको आश्वासन और उनकी स्तुति :— काशीमिश्र कहे प्रभुर धरिया चरणे। “तुमि केने एइ बाते क्षोभ कर मने ? ? 67 ॥ विष्णुप्रतिकी कामनाके अतिरिक्त अपनी जड़ेन्द्रियोंके तर्पणके लिये विष्णुसे फलकी कामना—मूर्खता और वाणिज्य मात्र :— संन्यासी विरक्त तोमार का–सने सम्बन्ध? व्यवहार लागि' तोमा भजे, सेइ ज्ञान–अन्ध ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर कहा,—“क्यों इन बातोंसे आपके मनमें क्षोभ हो रहा है? आप तो विरक्त संन्यासी हैं, आपका किसीके साथ क्या सम्बन्ध है? जो किसी व्यवहारिक वस्तुके लिये आपका भजन करता है, वह तो ज्ञानके विषयमें अन्धा अर्थात् अज्ञानी है॥ 67–68 ॥ अनुभाष्य—'व्यवहार',—जीविका अथवा प्राकृत भोग; विषयी लोग अपने-अपने विषय लाभके लिये फल–भोग
[ 9/68-74 नौवाँ अध्याय 259 कामनमयी चित्तवृत्तिसे विष्णु अथवा वैष्णवोंसे सहायताकी प्रार्थना करते हैं। सप्तशती-ग्रन्थमें देवीकी उपासनाके उद्देश्यसे वैसे भक्तिहीन चित्तसे युक्त लोगोंके लिये अनेक प्रकारकी व्यवहारिक कामसिद्धि ही फलके रूपमें कही गयी है। ये समस्त सकाम चेष्टाएँ- ज्ञानचक्षुरहित निर्बोध व्यक्तिका प्रयास मात्र है। विषयी लोग ईश्वरकी निर्मल उपासना करनेपर भी धर्म-अर्थ- काम-मोक्षरूपी अपने लौकिक-स्वार्थके द्वारा चलायमान होकर ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाली 'मुक्ति', स्वर्ग आदि भोग अथवा व्यवहारिक संघर्षसे छुटकारेकी आशा करके कृष्ण और कृष्णभक्तोंकी शुद्धसेवासे विमुख हो जाते हैं॥ 68 ॥ तोमार भजन-फले तोमाते 'प्रेमधन'। विषय लागि' तोमाय भजे, सेइ मूर्ख जन॥ 69 ॥ अनुवाद- केवल आपको सन्तुष्ट करनेके उद्देश्यसे आपके भजनके फलसे भक्तको आपका प्रेमधन प्राप्त होता है। किन्तु जो विषयोंको पानेकी लालसासे आपका भजन करता है, वह व्यक्ति मूर्ख है॥ 69 ॥ अनुभाष्य- आजकल स्त्री-पुत्रोंके पालन, अपने पेटको भरने, अपने स्त्री-पुत्रोंके वस्त्र-आभूषण आदिको संग्रह करनेके लिये मन्त्रका व्यवसाय करनेवाले और धार्मिक वेश लेकर जीवन पालन करनेवाले विषयी व्यक्तियोंने नामप्रचारके द्वारा लोगोंको छलनेका आश्रय किया है। वे श्रीवृन्दावन और नवद्वीपमें वास, ग्रन्थोंके विक्रयके द्वारा अपने भोजन और वस्त्र तथा स्त्री-पुत्रोंका पालन, शास्त्र-पाठको व्यवसाय बनाकर लोकरञ्जनके लिये प्रवचन, श्रीविग्रह-सेवा, दीक्षादान, भिक्षाकरण, आत्मीय लोगोंके रोगको दूर करना, वैरागी-वेश धारण, दरिद्रपूजा, सामाजिक उन्नति साधन आदि अनेक प्रकारके छल-कार्योंका विस्तार करके भक्तितत्त्वज्ञान-हीन मूर्ख लोगोंको ठगकर धनादिके अर्जनके द्वारा विषयोंका ही भजन कर रहे हैं। किन्तु आपके शुद्ध अहैतुक छलरहित भजनके फलसे ही आपके प्रति ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है-वे इसे समझ नहीं पाते॥ 69 ॥ महाप्रभुकी प्रीतिकी कामना करनेवाले निष्किञ्चन शुद्धभक्तगण :- तोमा लागि' रामानन्द राज्य त्याग कैला। तोमा लागि' सनातन 'विषय' छाड़िला॥ 70 ॥ अनुवाद- आपकी प्रसन्नताके लिये श्रीरामानन्द रायने राजकार्यका त्याग किया है और आपके लिये ही श्रीसनातनने समस्त विषयोंको [प्रधानमन्त्री पद आदिको] छोड़ दिया है॥ 70 ॥ तोमा लागि' रघुनाथ सकल छाड़िल। हेथाय ताहार पिता विषय पाठाइल॥ 71 ॥ तोमार चरण-कृपा हञाछे ताहारे। छत्रे मागि' खाय, 'विषय' स्पर्श नाहि करे॥ 72 ॥ अनुवाद- आपके लिये ही श्रीरघुनाथने घर-परिवार- धनादि सब कुछ छोड़ दिया। उनके पिताने उनके लिये धन-सेवकादिको भेजा, किन्तु उनपर आपके चरणकमलोंकी कृपा होनेके कारण वे उस धनको स्पर्श तक भी नहीं करते। अपितु वे छत्रमें माँगकर खाते हैं॥ 71-72 ॥ श्रीरामानन्दके अनुज गोपीनाथ सकाम व्यापारी नहीं :- रामानन्देर भाइ गोपीनाथ-महाशय। तोमा हैते विषय-वाञ्छा, तार इच्छा नय॥ 73 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्द रायका भाई श्रीगोपीनाथ सज्जन व्यक्ति है। उसकी आपसे किसी प्रकारके विषयको पानेकी इच्छा नहीं है॥ 73 ॥ महाप्रभुके एकान्त शरणागत गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिये जानेके प्रयत्नको देखकर उनके हितैषी लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी कृपाकी याचना :- तार दुःख देखि' तार सेवकादिगण। तोमारे जानाइल, -याते 'अनन्यशरण' ॥ 74 ॥ अनुवाद- गोपीनाथके दुःखको देखकर उसके कहे
260 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/74-83 ] बिना उसके सेवकोंने स्वयं ही आकर आपको सूचित किया, क्योंकि गोपीनाथ आपके एकान्त शरणागत है॥ 74 ॥ शुद्धभक्तोंकी परिभाषा :- सेइ 'शुद्धभक्त', ये तोमा भजे तोमा लागि'। आपनार सुख-दुःखे हय भोग-भागी ॥ 75 ॥ अनुवाद-वही शुद्धभक्त है जो अनुकूल भावसे आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी सेवा करता है। अपने सुख-दुःखको वह अपने ही द्वारा किये गये कर्मोंका फल मानकर उन भोगोंको भोगता है ॥ 75 ॥ शुद्धभक्तोंका आचार-व्यवहार :- तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे अनुक्षण। अचिरात् मिले ताँरे तोमार चरण ॥ 76 ॥ अनुवाद-शुद्धभक्त आपकी कृपाको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, इसलिये उन्हें अतिशीघ्र ही आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 76 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/8) में- तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ 77 ॥ अनुवाद-जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिके उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्' अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/261 संख्या देखें ॥ 77 ॥ काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें रहनेके लिये ही प्रार्थना :- तुमि बसि' रह, केने याबे आलालनाथ? केह तोमा ना शुनाबे विषयीर बात् ॥ 78 ॥ अनुवाद-कृपया आप यहीं श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही वास कीजिये, आप आलालनाथ क्यों जायेंगे? आपको कोई भी विषयी व्यक्तिकी बात नहीं सुनायेगा ॥ 78 ॥ महाप्रभुकी कृपासे ही भविष्यकालमें गोपीनाथके द्वारा अपनी रक्षाकी निश्चयता :- यदि तोमार तारे राखिते हय मन। आजि ये राखिल, सेइ करिबे रक्षण ॥ ”79 ॥ अनुवाद-यदि आपकी गोपीनाथकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो आज जिन्होंने [भगवान् श्रीजगन्नाथने] उसकी रक्षा की है, वे आगे भी उसकी रक्षा करेंगे ॥ ”79 ॥ प्रतापरुद्रका अपने गुरु श्रीमिश्रके घरमें आगमन :- एत बलि' काशीमिश्र गेला स्व-मन्दिरे। मध्याह्ने प्रतापरुद्र आइला ताँर घरे ॥ 80 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीकाशीमिश्र अपने मन्दिरमें चले गये। मध्याह्नके समय राजा प्रतापरुद्र उनके घरपर आये ॥ 80 ॥ राजाका गुरुसेवाका नियम :- प्रतापरुद्रेर एक आछये नियमे। यत दिन रहे तँह श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 81 ॥ नित्य आसि' करे मिश्रेर पाद-सम्वाहन। जगन्नाथ-सेवार करे भियान श्रवण ॥ 82 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रका एक नियम था कि जब तक वे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें रहते, तब तक वे प्रतिदिन श्रीकाशीमिश्रके वासस्थानपर आकर उनके चरणोंको दबाते थे और भगवान् श्रीजगन्नाथकी किस प्रकारसे भव्य सेवा होती है, इस विषयमें उनसे श्रवण करते थे ॥ 81-82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भियान',-परिपाटी अभिनय ॥ 82 ॥ राजा मिश्रेर चरण यबे चापिते लागिला। तबे मिश्र ताँरे किछु भङ्गीते कहिला ॥ 83 ॥
[ 9/83-94 नौवाँ अध्याय 261 श्रीमिश्रके द्वारा राजाको महाप्रभुके पुरी-त्यागका समाचार देना :- “देव, शुन, आर एक अपरूप बात़्! महाप्रभु क्षेत्र छाड़ि' याबेन आलालनाथ !!” 84 ॥ अनुवाद—जब राजा श्रीकाशीमिश्रके चरणोंकी सेवा करने लगे, तब श्रीकाशीमिश्रने कुछ सङ्केतके द्वारा उनसे कहा,—“हे राजन्! आप एक अद्भुत बात श्रवण कीजिये ! महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीको छोड़कर आलालनाथ चले जायेंगे !” 83-84 ॥ राजाका दुःख और उसके कारणकी जिज्ञासा, उत्तरमें श्रीमिश्रके द्वारा गोपीनाथके वृत्तान्तका वर्णन :- शुनि' राजा दुःखी हैला, पुछिलेन कारण। तबे मिश्र कहे ताँरे सब विवरण ॥ 85 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायके चाङ्गे चढ़ाइला। तार सेवक आसि' प्रभुरे कहिला ॥ 86 ॥ राज-सम्पत्तिका अपहरण करनेवाले गोपीनाथका धर्मविग्रह और धर्मरक्षक महाप्रभुके द्वारा तीव्र तिरस्कार; लौकिक, राजनैतिक और अर्थनैतिक अथवा शुक्लवित्तको अर्जित करनेकी विधिका वर्णन :- शुनिया क्षोभित हैल महाप्रभुर मन। क्रोधे गोपीनाथे कैला बहुत भर्त्सन ॥ 87 ॥ 'अजितेन्द्रिय हञा करे राजविषय। नाना असत्पथे करे राजद्रव्य व्यय ॥ 88 ॥ ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय राजधन। ताहा हरि' भोग करे महापापी जन ॥ 89 ॥ राजार वर्त्तन खाय, आर चुरि करे। राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर विचारे ॥ 90 ॥ निज-कौड़ि मागे, राजा नाहि करे दण्ड। राजा-महाधार्मिक, एइ हय पापी भण्ड ! !91 ॥ राज-कड़ि ना देय, आमारे फुकारे। एइ महादुःख इँहा के सहिते पारे ? ?92 ॥ निर्जनवासकी इच्छा अर्थात् जहाँ विषयकी बातें हों, ऐसे स्थानरूपी दुःसङ्गका त्याग :- आलालनाथ याइ' ताँहा निश्चिन्ते रहिमु। विषयीर भाल मन्द वार्त्ता ना शुनिमु ॥” 93 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत दुःखी हुए और उन्होंने श्रीकाशीमिश्रसे इसका कारण पूछा। तब श्रीकाशीमिश्रने महाराज प्रतापरुद्रको समस्त विवरण बतलाया,—“जब गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाया गया, तब उसके सेवकोंने आकर महाप्रभुको यह सूचना दी। इसे सुनकर महाप्रभुका मन बहुत दुःखी हुआ और उन्होंने क्रोधित होकर गोपीनाथकी बहुत भर्त्सना करते हुए कहा,—'गोपीनाथ अजितेन्द्रिय होनेपर भी राजसम्पत्तिका रक्षक बनता है और अनेक असत् कार्योंमें राजधनका व्यय करता है। राजधन ब्राह्मणके धनसे भी अधिक पूजनीय है। महापापी लोग ही राजधनका हरण करके उसका भोग करते हैं। जो जीवन निर्वाह करनेके लिये राजासे वेतन लेकर भी राजधनकी चोरी करता है, शास्त्रोंके विचारके अनुसार ऐसा व्यक्ति राजदण्डके योग्य होता है। राजा केवल अपना धन ही तो चाहता है, वह कोई दण्ड नहीं देना चाहता! इसलिये राजा अवश्य ही महाधार्मिक है, किन्तु यह गोपीनाथ धोखा देनेवाला पापी है !! गोपीनाथ स्वयं ही राजधन नहीं दे रहा और वह मुझसे सहायताके लिये उच्च स्वरसे रो रहा है। यह तो महापापकी बात है, इसे कौन सहन कर सकता है? मैं तो आलालनाथ जाकर वहाँ निश्चिन्त होकर रहूँगा और विषयी लोगोंकी अच्छी-बुरी किसी भी बातको नहीं सुनूँगा ॥” 85-93 ॥ अनुभाष्य—'फुकारे',—उच्च स्वरसे रोदन करता है ॥ 92 ॥ महाप्रभु पुरीमें ही रहें इसके लिये राजाका सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- एत शुनि' कहे राजा पाञा मने व्यथा। “सब द्रव्य छाड़ौं, यदि प्रभु रहेन एथा ॥ 94 ॥
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262 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/94-104 ] क्षणकाल महाप्रभुका दर्शन भी परम लोभनीय :- एकक्षण प्रभुर यदि पाइये दरशन। कोटिचिन्तामणि-लाभ नहे तार सम ॥ 95 ॥ कोन् छार पदार्थ एइ दुइलक्ष काहन ? प्राण-राज्य करों प्रभुsingleपदे निर्मञ्छन ॥" 96 ॥ अनुवाद-यह सब विवरण सुनकर राजा मनमें बहुत दुःखी हुए और कहने लगे,-"यदि महाप्रभु यहीं रहें तो मैं गोपीनाथसे प्राप्य अपना सम्पूर्ण धन छोड़ दूँगा। यदि मुझे एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके दर्शन प्राप्त हों तो करोड़ों चिन्तामणियोंका लाभ भी उसके समान नहीं है। तब फिर दो लाख काहन जैसी तुच्छ राशिका तो कहना क्या? मैं महाप्रभुके चरणकमलोंमें अपने प्राण और राज्य दोनों ही न्यौछावर कर दूँगा ॥" 94-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निर्मञ्छन', - (आरती अथवा पूजाके समय) अर्घ्य प्रदान, विशेष अर्पण ॥ 96 ॥ भक्तके दुःखसे महाप्रभुका दुःख :- मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, -नहे प्रभुर मन। तारा दुःख पाय, -एइ ना याय सहन ॥ "97 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,- "महाप्रभु नहीं चाहते कि आप राजधन छोड़ दें। उनसे यह सहन नहीं हो रहा कि गोपीनाथ पट्टनायकादि दुःखी हो रहे हैं ॥ "97 ॥ राजाके द्वारा गोपीनाथको दण्ड देनेके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- राजा कहे, - "तारे आमि दुःख नाहि दिये। चाङ्गे चड़ा, खड्गे डारा, आमि ना जानिये ॥ 98 ॥ पुरुषोत्तम-जानारे तँह कैल परिहास। सेइ 'जाना' तारे देखाइल मिथ्या त्रास ॥ 99 ॥ श्रीमिश्रको महाप्रभुको सन्तुष्ट करनेके लिये और श्रीभवानन्दके वंशके व्यक्तियोंके प्रति अपनी स्वाभाविक प्रीतिके विषयमें बतलानेके लिये राजाका अनुरोध :- तुमि याह, प्रभुरे राखह यत्न करि'। एइ मुइ ताहारे छाड़िनु सब कौड़ि ॥" 100 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"मैंने गोपीनाथ पट्टनायकको दुःख नहीं दिया। उसे चाङ्गपर चढ़ाने तथा तलवारोंपर गिरानेके विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता था। उसने युवराज पुरुषोत्तम जानाके साथ परिहास किया था, इसलिये युवराजने गोपीनाथको केवल डरानेके लिये ऐसा मिथ्या नाटक किया था। आप जाकर महाप्रभुको यहाँ रोकनेके लिये प्रयास कीजिये। मैं गोपीनाथके द्वारा देय समस्त राशिको छोड़ रहा हूँ॥ "98-100 ॥ मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, नहे प्रभुर मने। कौड़ि छाड़िले प्रभु कदाचित् सुख माने ॥ "101 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,-"महाप्रभु नहीं चाहते कि आप प्राप्य राजधन छोड़ दें। धन छोड़नेपर महाप्रभुको कोई सुख नहीं होगा ॥ "101 ॥ राजा कहे, - "कौड़ि छाड़िमु, -इहा ना कहिबा। सहजे मोर प्रिय तांरा, -इहा जानाइबा ॥ 102 ॥ भवानन्द-राय-आमार पूज्य-गर्वित। ताँर पुत्रगणे आमार सहजेइ प्रीत ॥" 103 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"आप महाप्रभुसे ऐसा मत कहना कि मैंने धन छोड़ दिया है। आप उन्हें यह कहना कि भवानन्द राय और उनका परिवार तो स्वभावतः मेरे प्रिय हैं। श्रीभवानन्द राय मेरे पूज्य तथा गौरवके पात्र हैं, इसलिये उनके पुत्रोंके प्रति मेरी प्रीति होना स्वाभाविक ही है ॥ "102-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पूज्य-गर्वित',-पूज्य और सम्मानके पात्र ॥ 103 ॥ गोपीनाथको युवराजके अनुग्रहका प्रदर्शन और विदायी प्रदान :- एत बलि' मिश्रे नमस्करि' घरे गेला। गोपीनाथे 'बड़ जाना' डाकिया आनिला ॥ 104 ॥