श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें246 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/77-83 ] बतलायी गयी दूसरी विधि 'निन्दा'को बलवान् जानते हैं, परन्तु उसकी उपेक्षा करके अन्योंकी निन्दा करते हैं॥ 77 ॥ अनुभाष्य—'परस्वभाव'-श्लोकमें पहले बतलायी गयी विधि “प्रशंसा मत करना” और बादमें बतलायी गयी विधि “निन्दा मत करना” है। पहले बतलायी गयी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी विधिके बलवान् होनेपर यही समझा जाता है कि लोगोंकी प्रशंसा करना उतना दोषपूर्ण नहीं है; परन्तु निन्दा निश्चित रूपसे नहीं करनी चाहिये। किन्तु यहाँ रामचन्द्रने पहले बतलायी गयी विधि “अन्योंकी प्रशंसा मत करना”का पालन किया है; बादमें बतलायी गयी विधि “अन्योंकी निन्दा नहीं करना”का पालन नहीं किया। इसलिये रामचन्द्रने बादमें बतलायी गयी विधिके अनुसार कार्य नहीं किया। इस श्लोकके अर्थकी श्लेष-उक्तिपरक कहकर व्याख्या की जा सकती है॥ 77 ॥ बादमें बतलायी गयी विधिका ही अधिक गुरुत्व :— न्यायवचन— पूर्वपरयोर्मध्ये परविधिर्बलवान्॥ 78 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 78 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—पूर्व और परविधिमें-से परविधि ही बलवान् है॥ 78 ॥ अनुभाष्य— पूर्वपरयोः (प्राक्-परयोर्विध्योः) मध्ये परविधिः (उत्तर-निर्देशः) बलवान्,—पूर्वविधिं त्यक्त्वा परविधिः ग्राह्यः इत्यर्थः। श्लोक-भावानुवाद—पूर्व (पहलेवाली) और परविधिमें-से परविधि (बादवाली) ही बलवान् है—पूर्वविधिका त्यागकर परविधि ही ग्रहण करने योग्य है, यही अर्थ है॥ 78 ॥ रामचन्द्रपुरीकी मक्खी जैसी वृत्ति :— याँहा गुण शत आछे, ना करे ग्रहण। गुणमध्ये छले करे दोष-आरोपण॥ 79 ॥ अनुवाद—जहाँपर एक सौ गुण हैं, वे उन्हें ग्रहण नहीं करते। अपितु वे गुणोंमें भी छलपूर्वक दोषका आरोप करते हैं॥ 79 ॥ रामचन्द्रके व्यवहार और स्वभावसे भक्तोंके हृदयमें दुःख :— इँहार स्वभाव इँहा कहिते ना युयाय। तथापि कहिये किछु मर्म-दुःख पाय॥ 80 ॥ अनुवाद—इनका स्वभाव ही ऐसा है कि उनके विषयमें कुछ भी कहना उचित नहीं है, तथापि मैं हृदयमें कुछ दुःख पानेके कारण ही यह सब कह रहा हूँ॥ 80 ॥ अनुभाष्य—'पाय',—पाकर॥ 80 ॥ आठवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। रामचन्द्रके वचनोंको तुच्छ मानकर महाप्रभुको भोजन ग्रहण करनेका अनुरोध :— इँहार वचने केने अन्न त्याग कर? पूर्ववत् निमन्त्रण मान',—सबार बोल धर॥" 81 ॥ अनुवाद—इनके कहनेपर आप भोजनको क्यों त्याग रहे हैं? आप हम सबकी बात मानकर पहलेकी ही भाँति निमन्त्रण स्वीकार कीजिये॥" 81 ॥ जगद्गुरु लोकशिक्षक महाप्रभुके द्वारा संन्यासी-धर्मकी विधिका निर्णय; विधिके अतीत ईश्वर और अधीन बद्धजीवमें समान बुद्धि करनेवाला ही 'प्राकृत सहजिया'; पुनः स्वयं ईश्वर होनेपर भी स्वयंको वैराग्य-बाध्य जीव मानकर संन्यासी वेषी आचार्यको निरपेक्षताकी शिक्षा-प्रदान :— प्रभु कहे,—“सबे केने पुरीरे कर रोष? 'सहज' धर्म कहे तैं हो, ताँर किबा दोष?? 82 ॥ यति हञा जिह्वा-लाम्पट्य,—अत्यन्त अन्याय। यतिर धर्म,—प्राण राखिते आहारमात्र खाय॥" 83 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“आप सभी श्रीरामचन्द्रपुरीके