भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2262

[ 8/68-77 आठवाँ अध्याय 245 अपने भोजनका आधा अंश ही ग्रहण कर रहे हैं॥ 68 ॥ एकदिन श्रीपरमानन्दपुरीको प्रमुख बनाकर भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको यथेष्ट भोजनको ग्रहण करनेका अनुरोध और उनसे रामचन्द्रपुरीके स्वभाव और व्यवहारकी निन्दा :- आर दिन भक्तगणसह परमानन्दपुरी। प्रभु-पाशे निवेदिला दैन्य-विनय करि' ॥ 69 ॥ “रामचन्द्रपुरी हय निन्दुक-स्वभाव। तार बोले अन्न छाड़ि' किबा हवे लाभ ?? 70 ॥ पुरीर स्वभाव, – यथेष्ठ आहार करावा। ये ना खाय, तारे खाओयाय यतन करिया ॥ 71 ॥ खाओयाञा पुनः तारे करये निन्दन। 'एत अन्न खाओ' – तोमार कत आछे धन ?? 72 ॥ संन्यासीके एत खाओयाञा कर धर्म नाश ! अतएव जानिनु, – तोमार किछु नाहि 'भास' ॥ 73 ॥ के कैछे व्यवहारे, केबा कैछे खाय। एइ अनुसन्धान तेंहो करय समाय ॥ 74 ॥ ईर्ष्याके कारण दूसरोंके छल या दोषोंको ढूँढ़ना—शास्त्रविरुद्ध और निषिद्ध :- शास्त्रे येइ दुइ धर्म करियाछे वर्जन। सेइ कर्म निरन्तर इँहार करण ॥ 75 ॥ अनुवाद—अगले दिन श्रीपरमानन्दपुरी भक्तोंके साथ महाप्रभुके पास आये और दैन्य-विनय करके उनसे निवेदन करने लगे, – “रामचन्द्रपुरी निन्दुक-स्वभाववाले व्यक्ति हैं। उनके कहनेपर भोजनको छोड़नेसे क्या लाभ होगा? उनका स्वभाव है कि वे भक्तोंको जितना वे खा सकते हैं, उतना भोजन कराते हैं और जो नहीं भी खाना चाहता, उसे बहुत बलपूर्वक खिलाते हैं। आवश्यकतासे अधिक खिलानेके बाद पुनः उनकी निन्दा करते हुए उनसे कहते हैं- 'तुम इतना भोजन करते हो, तुम्हारे पास कितना धन है? इसी प्रकार तुम संन्यासियोंको भी इतना खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करते हो! इसलिये मैं जान गया हूँ कि तुम्हें धर्म-अधर्मका आभास तक भी नहीं है।' कौन किस प्रकारका व्यवहार करता है और कौन क्या खाता है, रामचन्द्रपुरी सदैव इसीका अनुसन्धान करनेमें ही लगे रहते हैं। रामचन्द्रपुरी शास्त्रोंमें निषिद्ध दो प्रकारके कर्मोंको ही सदा करते हैं ॥ 69-75 ॥ श्रीमद्भागवत (11/28/1) में- परस्वभावकर्माणि न प्रशंसेन्न गर्हयेत्। विश्वमेकात्मकं पश्यन् प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ 76 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 76 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप देखकर अन्योंके स्वभाव और कर्मकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ अनुभाष्य- श्रीउद्धवसे श्रीभगवान् शुद्धज्ञानीके आचरणकी विधिका वर्णन कर रहे हैं,- प्रकृत्या पुरुषेण च सह एकात्मकं विश्वं पश्यन् परस्वभावकर्माणि (परेषां हिंसार्थं स्वभावान् कर्माणि गुणकृत- नैसर्गिकवृत्याद्यनुष्ठानानि) न प्रशंसेत्, न गर्हयेत् (न निन्देत्)। श्लोक-भावानुवाद - प्रकृति और पुरुषके मिलनमें विश्वको एक-स्वरूप (एक अन्तर्यामी पुरुषके द्वारा नियन्त्रित) देखकर अन्योंसे ईर्ष्याके कारण उनके स्वभाव और कर्मोंकी अर्थात् गुणजात स्वभावके अनुरूप क्रियाओंकी कभी भी प्रशंसा अथवा निन्दा मत करना ॥ 76 ॥ पहले बतलायी गयी प्रशंसाकी विधिकी अपेक्षा बादमें बतलायी गयी निन्दा-निषेधरूपी विधि ही शास्त्रका उद्देश्य :- तार मध्ये पूर्वविधि 'प्रशंसा' छाड़िया। परविधि 'निन्दा' करे 'बलिष्ठ' जानिया ॥ 77 ॥ अनुवाद-उन दोनों विधियोंमें-से वे 'प्रशंसा'का त्यागकर प्रथम विधिका पालन करते हैं। वे बादमें