भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2261

244 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/60-68 ] अनुवाद—इस प्रकार महादुःखमें कुछ दिन बीत गये। इस बातको सुनकर रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके पास आये॥60॥ युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥"66॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 65-66॥ मानद आचार्यरूपी महाप्रभुके द्वारा सदा रामचन्द्रको सम्मान देना :— प्रणाम करि' प्रभु कैला चरण-वन्दन। प्रभुरे कहये किछु हासिया वचन॥61॥ महाप्रभुको संन्यासी-धर्मकी शिक्षा देना :— “संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय-तर्पण'। यैछे तैछे करे मात्र उदर भरण॥62॥ शुष्क वैराग्यको संन्यास अर्थात् भक्तिके विरुद्ध बतलाकर केवल मुखसे ही प्रचार :— तोमारे क्षीण देखि, शुनि,—कर अर्द्धाशन। एइ 'शुष्क-वैराग्य' नहे संन्यासीर 'धर्म'॥63॥ सभी अवस्थाओंमें युक्तवैराग्यसे ही सिद्धिकी प्राप्ति :— यथायोग्य उदर भरे, ना करे 'विषय'-भोग। संन्यासीर तबै सिद्ध हय ज्ञानयोग॥64॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको प्रणाम करके उनके चरणोंकी वन्दना की। रामचन्द्रपुरीने मुस्कुराते हुए महाप्रभुसे कहा,—“संन्यासीका धर्म इन्द्रिय-तर्पण करना नहीं है, वह तो जिस किसी प्रकारसे केवल मात्र अपने उदरका भरण करता है। मैं तुम्हें बहुत दुबला-पतला देख रहा हूँ और मैंने सुना है कि तुम आजकल आधा भोजन ग्रहण करते हो। ऐसा शुष्क-वैराग्य संन्यासीका धर्म नहीं है। संन्यासीको आवश्यकता अनुसार केवल उदर पूर्ति करनी चाहिये और विषयोंका भोग नहीं करना चाहिये। इसके द्वारा तब संन्यासीका ज्ञानयोग सिद्ध होता है॥61-64॥ सर्वत्र युक्तवैराग्यसे युक्त भक्तियोगसे ही अनर्थ-नाश :— भगवद्-गीता (6/16-17) में— नात्यश्नतोऽपि योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥65॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन, अधिक भोजन करनेसे 'योग' नहीं होता; सम्पूर्ण भोजन त्यागसे भी 'योग' नहीं होता एवं अधिक निद्रा अथवा निद्रा त्याग करनेपर भी 'योग' नहीं होता। आहार, विहार, समस्त कर्मोंमें चेष्टा, निद्रा, जागरण आदिके उपयुक्तरूपमें नियमित होनेपर दुःखनाशक 'योग' होता है॥"65-66॥ अनुभाष्य— हे अर्जुन, अत्यश्नतः (अत्यधिकभोजनशीलस्य) तु योगः न अस्ति, न च एकान्तम् अनश्नतः (स्वल्पाहारनिरतस्य निराहारिणः), न च अतिस्वप्नशीलस्य (अधिकनिद्राशीलस्य) न च जाग्रतः (अनिद्रस्य) एव योगः (अस्ति)। युक्ताहारविहारस्य (परिमितभोजनशयनादिपरस्य) कर्मसु (साधनानुष्ठानादिषु) युक्तचेष्टस्य (परिमितारम्भपरस्य) युक्तस्वप्नावबोधस्य (परिमितनिद्रा-जागरणनिष्ठस्य) दुःखहा (सर्वदुःख-निवृत्तिहेतुः) योगः भवति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥65-66॥ अमानी-धर्मके आदर्श महाप्रभुकी दैन्य-उक्ति :— प्रभु कहे,—“अज्ञ बालक मुइ, 'शिष्य' तोमार। मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य आमार॥"67॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मैं अज्ञानी बालक हूँ, आपका शिष्य हूँ। यह मेरा सौभाग्य ही है कि आप मुझे शिक्षा प्रदान कर रहे हैं॥"67॥ महाप्रभुके भक्तोंके द्वारा आधे भोजनको ग्रहण करनेके विषयमें सुनना :— एत शुनि' रामचन्द्रपुरी उठि' गेला। भक्तगण अर्द्धाशन करे,—गोसाञि शुनिला॥68॥ अनुवाद—इतना सुनकर रामचन्द्रपुरी उठकर चले गये। उन्होंने कई लोगोंसे सुना कि महाप्रभुके भक्त भी