श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2260, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/50-60 आठवाँ अध्याय 243 मनमें सङ्कोच और भय हुआ। इसलिये उन्होंने श्रीगोविन्दको बुलाकर उससे कहा,—“आजसे मेरी भिक्षा (भोजन)का नियम होगा कि मैं श्रीजगन्नाथदेवके प्रसादकी प्रमाण-हाण्डीका एक चौथाई भाग और पाँच गण्डे (एक पैसे)की साग-सब्जीको ही ग्रहण करूँगा। इससे अधिक और कुछ भी मत लाना। इससे अधिक लानेपर तुम मुझे यहाँपर नहीं देखोगे॥” 50-52॥ अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मिट्टीकी हाण्डीमें मिलता है। 'प्रमाण'-हाण्डीके चौथे भागको 'एक चौठि' (एक चौथाई) कहते हैं॥ 51॥ सभी भक्तोंको महाप्रभुके कठोर उपदेशके विषयमें बतलाना, सभी भक्तोंको भीषण दुःख :- सकल वैष्णवे गोविन्द कहे एइ बात। शुनि' सबार माथे यैछे हैल वज्राघात॥ 53॥ अनुवाद—श्रीगोविन्दने सभी वैष्णवोंको महाप्रभुकी इस आज्ञाके विषयमें बतलाया। यह बात सुनकर सभीको ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर वज्रका आघात हुआ हो॥ 53॥ दुरात्मा रामचन्द्रपुरीको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय महाप्रभुका विरोधी जानकर भक्तोंके द्वारा उसकी निन्दा :- रामचन्द्रपुरीके सबाय देय तिरस्कार। “एइ पापिष्ठ आसि' प्राण लइल सबार॥” 54॥ अनुवाद—सभी भक्त रामचन्द्रपुरीका तिरस्कार करते हुए कहने लगे,—“इस पापीने आकर हम सबके प्राण ले लिये हैं॥” 54॥ एक ब्राह्मणके द्वारा महाप्रभुको निमन्त्रण :- सेइदिन एकविप्र कैल निमन्त्रण। एक-चौठि भात, पाँच-गण्डार व्यञ्जन॥ 55॥ महाप्रभुके लिये श्रीगोविन्दके द्वारा यथा-निर्दिष्ट-परिमाणमें प्रसाद स्वीकार करना, महाप्रभुके द्वारा बहुत कम आहार ग्रहण करनेसे ब्राह्मणको दुःख :- एइमात्र गोविन्द कैल अङ्गीकार। माथाय घा मारे विप्र, करे हाहाकार॥ 56॥ अनुवाद—उस दिन एक ब्राह्मणने महाप्रभुको निमन्त्रण दिया। जब श्रीगोविन्दने महाप्रभुकी आज्ञाके अनुसार उन ब्राह्मणसे एक चौथाई हाण्डी चावल और पाँच गण्डेकी ही शाक-सब्जियोंको ग्रहण किया, तब वह ब्राह्मण हाहाकार करते हुए अपने हाथोंसे मस्तकपर आघात करने लगा॥ 55-56॥ महाप्रभुके द्वारा आधा भोजन ग्रहण करना, श्रीगोविन्दको उनके आधे अवशिष्टकी प्राप्ति, भक्तोंके द्वारा अन्न और जलका त्याग :- सेइ भात-व्यञ्जन प्रभु अर्द्धेक खाइल। ये किछु रहिल, ताहा गोविन्द पाइल॥ 57॥ अनुवाद—महाप्रभुने उस चावल और शाक- सब्जियोंमें-से आधा ग्रहण किया एवं जो महाप्रसाद बच गया, उसे श्रीगोविन्दने पा लिया॥ 57॥ अर्द्धाशन करेन प्रभु, गोविन्द अर्द्धाशन। सब भक्तगण तबे छाड़िल भोजन॥ 58॥ अनुवाद—महाप्रभु उस अल्प भोजनका भी आधा खाते हैं और श्रीगोविन्द भी शेष आधा खाते हैं, तब सभी भक्तोंने भोजन करना ही छोड़ दिया॥ 58॥ श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वरको अन्यत्र भिक्षा-ग्रहण करनेका आदेश :- गोविन्द-काशीश्वरे प्रभु कैला आज्ञापन। “दुँहे अन्यत्र मागि' कर उदर भरण॥” 59॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीगोविन्द और श्रीकाशीश्वर पण्डितको आज्ञा दी,—“आप दोनों कहीं और भिक्षा माँगकर अपनी उदरपूर्ति कर लिया करो॥” 59॥ महाप्रभुके द्वारा भोजनको कम कर देनेके फलस्वरूप भक्तोंके दुःखको सुनकर रामचन्द्रका महाप्रभुके निकट आगमन :- एइरूप महादुःखे दिन कत गेल। शुनि' रामचन्द्रपुरी प्रभुपाश आइल॥ 60॥