श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें242 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/45-52 ] अपनी निन्दाको सुननेपर भी महाप्रभुके द्वारा पदोचित सम्मान प्रदान करते हुए पुरीकी वञ्चना :- यत निन्दा करे, ताहा प्रभु सब जाने। तथापि आदर करे बड़इ सम्भ्रमे ॥ 45 ॥ अनुवाद-यद्यपि महाप्रभु सब जानते थे कि रामचन्द्रपुरी सबके सामने उनकी निन्दा करते हैं, तथापि महाप्रभु उनका गौरवपूर्वक आदर करते थे॥ 45 ॥ एक बार प्रातःकालमें महाप्रभुके घरमें चींटियोंकी कतारको देखकर स्वयं-भगवान् महाप्रभुके वैराग्यकी निन्दा करके वहाँसे प्रस्थान :- एकदिन प्रातःकाले आइला प्रभुर घर। पिपीलिका देखि' किछु कहेन उत्तर ॥ 46 ॥ अनुवाद-एकदिन प्रातःकालमें रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके वासस्थानपर आये। वहाँ बहुतसी चींटियोंको देखकर वे महाप्रभुकी निन्दा करते कुछ कहने लगे ॥ 46 ॥ रामचन्द्रपुरीके वचन- “रात्रावत्र ऐक्षवमासीत्, तेन पिपीलिकाः सञ्चरन्ति। अहो! विरक्तानां संन्यासिनामियमिन्द्रियलालसेति ब्रुवन्नुत्थाय गतः॥”47 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 47 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रात्रिके समय इस स्थानपर गन्नेसे बना गुड़ था, इसी कारण यहाँपर बहुत-सी चींटियाँ घूम रही हैं। अहो, विरक्त संन्यासियोंकी ऐसी इन्द्रिय-लालसा!”-ऐसा कहकर वे उठ खड़े हुए ॥ 47 ॥ अनुभाष्य-प्राकृत-तुच्छत्व आदि गुणोंसे अतीत पूर्ण निर्दोष-विग्रह स्वयं भगवान् महाप्रभुके किसी-न-किसी दोषको पानेकी आशासे रामचन्द्र अनेक प्रयत्न करनेपर भी जब सफल नहीं हो पाये और महाप्रभुके घरमें किसी भी प्रकारकी मिठाईको नहीं देखनेपर भी बहुतसी चींटियोंको घूमते देखकर उन्होंने अनुमान लगाया कि रात्रिके समय यहाँपर गुड़ था; किसी दोषका उल्लेख करके अपने माहात्म्यको वर्धित करना [रामचन्द्रपुरीका] उद्देश्य था ॥ 47 ॥ महाप्रभुके द्वारा अपने कानोंसे पुरीके द्वारा की गयी मिथ्या-निन्दाका श्रवण :- प्रभु पूर्व पूर्व निन्दा करियाछेन श्रवण। एबे साक्षात् शुनिलेन 'कल्पित' निन्दन ॥ 48 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरी पहले जो उनकी निन्दा करते थे, महाप्रभुने उसे दूसरोंके मुखसे सुना था, किन्तु अब उन्होंने रामचन्द्रपुरीके द्वारा कल्पित निन्दाको साक्षात् अपने कानोंसे श्रवण किया ॥ 48 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कल्पित निन्दन'-मिथ्या-आरोपित निन्दा ॥ 48 ॥ विवर्त्तबुद्धिके कारण ही भगवान्के प्रति दोषारोपण :- सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र बेड़ाय। ताहाते तर्क उठाञा दोष लागाय ॥ 49 ॥ अनुवाद-चींटियाँ तो प्रायः सभी स्थानोंपर घूमती रहती हैं, किन्तु रामचन्द्रपुरी उन्हींको देखकर तर्क करते हुए महाप्रभुपर दोष लगाने लगे कि उनके घरमें गुड़ आदि मिष्ठान्न है ॥ 49 ॥ अपनी निन्दाको सुनकर जगद्गुरु आचार्यरूपी महाप्रभुका भय और लज्जा :- शुनि' ताहा प्रभुर सङ्कोच-भय मने। गोविन्दे बोलाञा किछु कहेन वचने ॥ 50 ॥ अपनी दैनिक भिक्षाको कम करना और श्रीगोविन्दसे उसके परिमाणको निर्धारित करना :- “आजि हैते भिक्षा आमार एइ त' नियम। पिण्डाभोगेरे एक चौठि, पाँचगण्डार व्यञ्जन ॥ 51 ॥ परिमाणसे अधिक लानेपर स्थानको छोड़कर जानेरूपी भय दिखलाना :- इहा बइ अधिक आर किछु ना लइबा। अधिक आनिले आमा एथा ना देखिबा ॥” 52 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके वचन सुनकर महाप्रभुके