श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2258, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/37-44 आठवाँ अध्याय 241 अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका कुछ भी निर्धारित नहीं अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके रहन-सहन, उनकी होता था कि वे कहाँ भोजन करेंगे, वे बिना निमन्त्रणके भजनकी रीति, उनके भोजन, शयन और आवागमन ही भोजन करनेके लिये पहुँच जाते थे। किन्तु आदि समस्त विषयका अनुसन्धान करते रहते॥40॥ अन्यान्य भक्त लोग कहाँ और कितना भोजन करते हैं, वे उस विषयमें पूरी जानकारी रखते थे॥37॥ अधोक्षज स्वयं भगवान् पूर्ण और निर्दोष :— प्रभुर यतेक गुण स्पर्शितॆ नारिल। अमृतप्रवाह भाष्य—'अन्येर भिक्षार स्थिति',—अन्य छिद्र चाहि' बुले, काँहा छिद्र ना पाइल॥41॥ लोग जो भिक्षा (भोजन) करते, उसके नियमको समझ लेते॥37॥ संन्यासीके लिये विधि और निषेध :— “संन्यासी हञा करे मिष्टान्न-भक्षण। अनुभाष्य—'अन्यान्य संन्यासी कहाँ किस परिमाणमें एइ भोगे हय कैछे इन्द्रिय-वारण??” 42॥ भोजन करते हैं, कहाँ वास करते हैं, आदि अन्योंकी सर्वत्र महाप्रभुकी निन्दा, दूसरी ओर चर्चा अथवा ब्योरा लेकर रामचन्द्रपुरी दिन-यापन प्रतिदिन महाप्रभुका दर्शन :— करते।' 'निश्चय',—हिसाब या ब्योरा॥37॥ एइ निन्दा करि' कहे सर्वलोक-स्थाने। प्रभुरे देखितेह अवश्य आइसे प्रतिदिने॥43॥ महाप्रभुकी दैनिक भिक्षाका विवरण—महाप्रभुके साथ श्रीईश्वरपुरीके शिष्य श्रीगोविन्द और अनुवाद—रामचन्द्रपुरी महाप्रभुके दोषोंको ही ढूँढ़ते श्रीकाशीश्वरकी एक साथ भिक्षा :— रहते थे, इसलिये वे उनके गुणोंको लेशमात्र भी स्पर्श प्रभुर निमन्त्रणे लागे कौड़ि चारि पण। नहीं कर पाये। वे महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना चाहते थे, कभु काशीश्वर, गोविन्द खाय तिनजन॥38॥ परन्तु बहुत प्रयास करनेपर भी उनमें कोई भी दोष अनुवाद—उन दिनों महाप्रभुके निमन्त्रणमें चार पण नहीं ढूँढ़ पाये। तो अन्तमें वे कहने लगे,—“कृष्णचैतन्य कौड़ी (चार आने) लगते थे, कभी-कभी तो उसीमें ही संन्यासी होकर भी मिष्ठान्न खाता है, इस प्रकारके महाप्रभु, श्रीकाशीश्वर पण्डित तथा श्रीगोविन्द—ये तीनों भोगोंको ग्रहण करनेसे किस प्रकारसे इन्द्रियोंके विकारोंको प्रसाद पाते थे॥38॥ रोका जा सकता है?” इस प्रकार वे सभीके सामने महाप्रभुकी निन्दा करते, किन्तु वे प्रतिदिन महाप्रभुके प्रत्यह प्रभुर भिक्षा इति-उति हय। दर्शन करने भी अवश्य ही आते॥41-43॥ केह यदि मूल्य आने, चारिपण-निर्णय॥39॥ महाप्रभुके द्वारा मर्यादा प्रदान, रामचन्द्रके अनुवाद—प्रतिदिन महाप्रभुका भोजन पृथक् स्थानपर द्वारा निन्दारूपी विष उगलना :— होता था और यदि कोई महाप्रभुके भोजनका मूल्य प्रभु गुरुबुद्धये करेन सम्भ्रम, सम्मान। चुकाना चाहता तो वह मूल्य चार आना ही निर्धारित तेंहो छिद्र चाहि' बुले,—एइ तार काम॥44॥ था॥39॥ स्वयं महाप्रभुको भी मर्त्य जानकर अनुवाद—महाप्रभु रामचन्द्रपुरीको गुरुबुद्धिसे (गुरुका उनके दोषोंको ढूँढ़ना :— गुरुभ्राता मानकर) उनका आदर और सम्मान करते। प्रभुर स्थिति, रीति, भिक्षा, शयन, प्रयाण। परन्तु महाप्रभुके दोषोंको ढूँढ़ना ही रामचन्द्रपुरीका काम रामचन्द्रपुरी करे सर्वानुसन्धान॥40॥ था॥44॥