भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2257

240 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/29-37 ] गये और रामचन्द्रपुरी सबकी निन्दा करनेवाले बन गये। इस प्रकार ये दोनों क्रमशः महान् व्यक्तिके अनुग्रह और दण्डके पात्र होनेके साक्षी हैं। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इन दोनोंके माध्यमसे जगत्वासियोंको शिक्षा प्रदान की॥29-30॥ अनुभाष्य—महात्मा श्रील माधवेन्द्रपुरीसे श्रीईश्वरपुरीने प्रचुर कृपा प्राप्त की थी और रामचन्द्रपुरीको केवल मात्र निग्रह (दण्ड) प्राप्त हुआ॥30॥ अप्राकृत विप्रलम्भ-अवस्थामें श्रीमाधवेन्द्र गोस्वामीका अप्राकट्य :- जगद्गुरु माधवेन्द्र करि' प्रेमदान। एइ श्लोक पड़ि' तेंहो कैल अन्तर्धान॥३१॥ अनुवाद—जगद्गुरु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जगत्में कृष्णप्रेमका दान किया। निम्नलिखित श्लोकका पाठ करते हुए उन्होंने अन्तर्धान लीला प्रकाशित की॥31॥ पद्यावली 330 अङ्कमें उद्धृत श्रीमाधवेन्द्रपुरी-वचन— अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥३२॥ अनुवाद—ओहे दीनदयार्द्रनाथ! ओहे मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन करूँगी? तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा कातर हृदय अस्थिर हो गया है। हे दयित (प्रियतम)! अब मैं क्या करूँ?32॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 4/197 संख्या देखें॥32॥ श्लोकका मर्मार्थ अथवा तात्पर्य-व्याख्या :- एइ त' श्लोके कृष्णप्रेम करे उपदेश। कृष्णेर विरह, भक्तेर भावविशेष॥३३॥ अनुवाद—उपरोक्त श्लोकमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कृष्णप्रेम कैसे प्राप्त किया जाय इसका उपदेश दिया है। श्रीकृष्णके विरहमें भक्तोंके चित्तमें विप्रलम्भ-भावकी स्फूर्ति ही कृष्णप्रेम प्राप्तिका उपाय है॥३३॥ अनुभाष्य—'भावविशेष'—विप्रलम्भ-भावस्फूर्ति; प्राकृत-सहजिया-सम्प्रदायमें सम्भोगके नामपर साधकोंमें अनेक प्रकारके उपद्रव आकर विप्रलम्भके स्वरूपकी अनुभूतिमें बाधा उत्पन्न करते हैं॥३३॥ श्रीमाधवेन्द्र-कृष्णप्रेमकल्पवृक्षके अङ्कुर, श्रीचैतन्य स्वयं अङ्कुरसे प्रस्फुटित परिवर्धित मूल-वृक्ष :- पृथिवीते रोपण करि' गेला प्रेमाङ्कुर। सेइ प्रेमाङ्कुरेर वृक्ष—चैतन्यठाकुर॥३४॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरी पृथ्वीपर प्रेमका अङ्कुर रोपित कर गये, उसी प्रेमके अङ्कुरसे श्रीचैतन्य महाप्रभु रूपी वृक्ष प्रकाशित हुआ॥34॥ श्रीमाधवेन्द्रके अन्तर्धानके श्रवणसे जीवको श्रीकृष्णविरहसे उत्पन्न सेवाकी शिक्षा :- प्रस्तावे कहिलुँ पुरी-गोसाञिर निर्याण। येइ इहा शुने, सेइ बड़ भाग्यवान्॥३५॥ अनुवाद—मैंने प्रसङ्गवशतः श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोस्वामीकी अप्रकट लीलाका वर्णन किया है। जो भी इसका श्रवण करता है, वह बड़ा भाग्यवान् है॥35॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'निर्याण'—अप्रकट॥३५॥ रामचन्द्रपुरीका शुष्क-वैराग्य :- रामचन्द्रपुरी ऐछे रहिला नीलाचले। विरक्त स्वभाव, कभु रहे कोन स्थले॥३६॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी इस प्रकार श्रीनीलाचलमें रहने लगे। वे विरक्त स्वभावके थे, इसलिये वे कभी किसी एक स्थानपर रहते और कभी किसी अन्य स्थानपर चले जाते॥36॥ दूसरोंके दोषोंको ढूँढ़नेवाले रामचन्द्रपुरी :- अनिमन्त्रण भिक्षा करे, नाहिक निर्णय। अन्येर भिक्षार स्थितिर लयेन निश्चय॥३७॥