भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2256, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2256

[ 8/24-30 आठवाँ अध्याय 239 लघुतोषणी टीकामें इस वासनाभाष्य-धृत भगवत्-परिशिष्टका ही पाठान्तरमें,— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्बन्धनं यान्ति कर्मभिः। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” [अर्थात् “अचिन्त्य महाशक्ति सम्पन्न श्रीभगवान्के निकट अपराध होनेपर जीवन्मुक्त व्यक्ति भी पुनः संसारवासनाको प्राप्त होते हैं (पाठान्तरमें—कर्मके द्वारा पुनः बन्धनको प्राप्त होते हैं)।”] एवं रथयात्रा प्रसङ्गमें श्रीविष्णुभक्तिचन्द्रोदयमें उद्धृत पुराणान्तर-वचन आदि शास्त्र-वचन देखें— “जीवन्मुक्ताः प्रपद्यन्ते क्वचित् संसारवासनाम्। योगिनो न विलिप्यन्ते कर्मभिर्भगवत्पराः॥” [अर्थात् “जीवन्मुक्त भी कभी-कभी संसार-वासनाको प्राप्त होते हैं, किन्तु भगवत्-परायण एकान्तिक योगी कभी भी कर्मवासनामें लिप्त नहीं होते।”] ॥ २४ ॥ श्रीकृष्ण-कृष्णभक्त अथवा स्वरूप-तद्रूपवैभवादि चिद्विलास-दर्शनविहीन विष्णुनिन्दा आरम्भ :- शुष्क-ब्रह्मेते नाहि कृष्णेर 'सम्बन्ध'। सर्व-लोक निन्दा करे, निन्दाते निर्बन्ध ॥ २५ ॥ अनुवाद—शुष्क ब्रह्मज्ञानीका श्रीकृष्णसे कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसलिये रामचन्द्रपुरीकी निष्ठाके साथ सभी लोगोंकी निन्दामें आसक्ति थी ॥ २५ ॥ अनुभाष्य—‘निर्बन्ध’,—निष्ठाके साथ परनिन्दामें आसक्ति। निर्विशेष मायावादी लोग सम्बन्धज्ञानमें कुशल नहीं होनेके कारण कृष्णसे सम्बन्धको ग्रहण नहीं कर पाते। वे जड़ीय-वितर्कके बलपर ब्रह्मके विषयमें जड़ीय तर्क प्रयोग करते हैं। वे कृष्णभक्तिको मोक्ष-साधकके फलभोग-पिपासा-मूलक कर्मकाण्डके अन्तर्गत अन्य एक कार्य समझते हैं। वे भगवद्भक्तको और उनके अप्राकृत भक्तिके अनुशीलनको चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) प्रदान करनेवाला कर्मसाधनमात्र जानकर उनकी निन्दा करते हैं। अधोक्षज गुरु अथवा भक्तोंके चरणोंमें अपराध होनेपर ही जीव ऐसे भयानक अज्ञानमें पतित होते हैं ॥ २५ ॥ श्रील ईश्वरपुरीकी एकान्तिकी गुरुभक्ति :- ईश्वरपुरी करे श्रीपाद-सेवन। स्वहस्ते करेन मलमूत्रादि मार्जन ॥ २६ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा करते थे, वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्र आदिको साफ कर देते थे ॥ २६ ॥ अनुभाष्य—‘श्रीपाद-सेवन’,—श्रीमाधवेन्द्रपुरी-पादकी सेवा ॥ २६ ॥ आदर्श गुरु-सेवाका उदाहरण :- निरन्तर कृष्णनाम करये स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला शुनाय अनुक्षण ॥ २७ ॥ अनुवाद—श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीको निरन्तर कृष्णनामका स्मरण कराते और उन्हें प्रतिक्षण कृष्णनाम तथा कृष्णलीला श्रवण कराते थे ॥ २७ ॥ श्रीईश्वरपुरीको गुरुकृपाकी प्राप्ति :- तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैला आलिङ्गन। वर दिला,—“कृष्णे तोमार हउक प्रेमधन ॥”२८ ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने सन्तुष्ट होकर श्रीईश्वरपुरीको आलिङ्गन किया और उन्हें वरदान देते हुए कहा,—“तुम्हें श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनकी प्राप्ति हो ॥”२८ ॥ गुरुसे एकको कृपारूपी लाभके फल, दूसरेको वञ्चना प्राप्तिके फलमें तारतम्य :- सेइ हैते ईश्वरपुरी—'प्रेमेर सागर'। रामचन्द्रपुरी हैल सर्वनिन्दाकर ॥ २९ ॥ हरि-गुरु-वैष्णवकी कृपा और दण्ड प्राप्तिके दो दृष्टान्तोंके द्वारा लोगोंको शिक्षा :- महदनुग्रह-निग्रहेर साक्षी दुइजने। एइ दुइद्वारे शिखाइला जगजने ॥ ३० ॥ अनुवाद—तभीसे श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' बन

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