भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2255, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2255

238 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/17-24 ] श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अप्राकृत विप्रलम्भरसमें कृष्णकीर्तन :— पुरी-गोसाञि करे कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन। ‘मथुरा ना पाइनु’ बलि’ करेन क्रन्दन॥17॥ अनुवाद—उस समय श्रीमाधवेन्द्रपुरी गोसाईं कृष्णनाम-सङ्कीर्तन कर रहे थे और कभी कभी ‘मुझे मथुराका आश्रय नहीं प्राप्त हुआ’ कहकर क्रन्दन कर रहे थे॥17॥ शुष्कज्ञानी रामचन्द्रका मर्त्यबुद्धिसे गुरु-मर्यादा-लङ्घन :— रामचन्द्रपुरी तबे उपदेशे ताँरे। शिष्य हञा गुरुके कहे, भय नाहि करे॥18॥ रामचन्द्रके द्वारा चिद्विलासका विरोध :— “तुमि—पूर्ण-ब्रह्मानन्द, करह स्मरण। ब्रह्मवित् हञा केने करह रोदन??”19॥ अनुवाद—उस समय रामचन्द्रपुरी शिष्य होकर गुरुको उपदेश देनेमें भी कोई भय नहीं करके उनको उपदेश देते कहने लगे,—“आप पूर्ण ब्रह्मानन्दमें हैं, ब्रह्मका स्मरण कीजिये, आप ब्रह्मको जाननेवाले होनेपर भी रो क्यों रहे हैं?”18-19॥ गुरु माधवेन्द्रपुरीके द्वारा रामचन्द्रको अपराधी मानकर क्रोधसे भरकर उसकी उपेक्षा और भर्त्सना :— शुनि’ माधवेन्द्र-मने क्रोध उपजिल। “दूर दूर, पापी” बलि’ भर्त्सना करिल॥20॥ “कृष्णकृपा ना पाइनु, ना पाइनु ‘मथुरा’। आपन-दुःखे मरौं,—एइ दिते आइल ज्वाला॥21॥ मोरे मुख ना देखाबि तुइ, याउ यथि-तथि। तोरे देखि’ मैले मोर हबे असद्गति॥22॥ कृष्ण ना पाइनु, मरौं आपनार दुःखे। मोरे ‘ब्रह्म’ उपदेशे एइ छार मूर्खे॥”23॥ अनुवाद—यह सुनकर श्रीमाधवेन्द्र पुरीके मनमें बहुत क्रोध उत्पन्न हुआ और “दूर हो जा, दूर हो जा, पापी” कहकर उसकी भर्त्सना की तथा कहा,—“मैं श्रीकृष्णकी कृपाको प्राप्त नहीं कर पाया, मैं मथुराको प्राप्त नहीं कर पाया—एक तो मैं अपने ऐसे ही दुःखसे मर रहा हूँ और ऊपरसे तू मुझे जलानेके लिये आ गया है। मुझे अपना मुख मत दिखला। तेरी जहाँ इच्छा हो, तू वहाँ चला जा। तुझे देखकर मरनेसे मेरी असद्गति होगी। मैं श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण मर रहा हूँ, इसलिये मैं दुःखी हूँ और यह दुष्ट मूर्ख मुझे ब्रह्मका उपदेश दे रहा है॥”20-23॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी अपने गुरु श्रीमाधवेन्द्रको श्रीकृष्ण-विरह-कातर देखकर भी उनकी अप्राकृत विप्रलम्भ स्फूर्त्तिको समझनेमें असमर्थ हुए। उन्होंने लौकिक-विचारके अनुसार श्रीमाधवेन्द्रपुरीको साधारण मरणशील व्यक्ति मानकर उन्हें सांसारिक अभावके लिये शोकसे कातर समझा। इसलिये वे उन्हें निर्विशेष-ब्रह्मकी अनुभूति करानेमें लग गये। उनके ऐसा करनेसे श्रीमाधवेन्द्रपुरी अपने शिष्यकी मूर्खता और गुरु-अवज्ञाको समझकर उसके मङ्गलकी आकाङ्क्षासे उदासीन हो गये और उसे त्यागकर निकाल दिया॥20॥ गुरु-अवज्ञारूपी अपराधके कारण विषयभोग अथवा संसार-वासना :— एइ ये श्रीमाधवेन्द्र उपेक्षा करिल। सेइ अपराधे इँहार ‘वासना’ जन्मिल॥24॥ अनुवाद—गुरुमें मर्त्यबुद्धिरूपी अपराधके कारण श्रीमाधवेन्द्रपुरीने रामचन्द्रपुरीकी जो उपेक्षा की, उसी अपराधके फलस्वरूप उनमें संसार-वासना उत्पन्न हुई॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘वासना’,—शुष्क ज्ञान-वासना, उसके कारण भक्तोंकी निन्दा॥24॥ अनुभाष्य—इस विषयमें भक्तिसन्दर्भ (111 संख्या)में ‘वासनाभाष्य’ धृत भगवान्‌के परिशिष्ट वचन— “जीवन्मुक्ता अपि पुनर्यान्ति संसारवासनाम्। यद्यचिन्त्य-महाशक्तौ भगवत्यपराधिनः॥” अथवा भाः 10/2/32 श्लोककी श्रीजीवगोस्वामिकृत