भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2254

[ 8/7-16 आठवाँ अध्याय 237

कहती हैं,—'संन्यासी—निराशीर्निर्नमष्क्रियः।'॥ 7॥ श्रीजगदानन्दके द्वारा भिक्षा-दान :— तिनजने इष्टगोष्ठी कैला कतक्षण। जगदानन्द-पण्डित ताँरे कैला निमन्त्रण॥ 8॥ अनुवाद—तीनोंने कुछ समय तक इष्ट-गोष्ठी की और तब श्रीजगदानन्द पण्डितने रामचन्द्रपुरीको भोजनके लिये निमन्त्रण किया॥ 8॥ स्वयं आवश्यकतासे अधिक भोजन करनेके बाद भिक्षा करानेवाले अथवा परिवेशण करनेवालेकी निन्दा :— जगन्नाथेर प्रसाद आनिला भिक्षार लागिया। यथेष्ठ भिक्षा करिला तेंहो निन्दार लागिया॥ 9॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित रामचन्द्रपुरीको भोजन करानेके लिये श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लेकर आये, रामचन्द्रपुरीने निन्दा करनेके उद्देश्यसे बहुत भोजन किया॥ 9॥ स्वयं श्रीजगदानन्दको प्रचुर भोजन करवाकर 'अत्याहारी' जानकर गौरगणोंकी निन्दा :— भिक्षा करि' कहे पुरी,—“शुन जगदानन्द। अवशेष प्रसाद तुमि करह भक्षण॥”10॥ अनुवाद—भोजन करनेके पश्चात् रामचन्द्रपुरीने कहा,—“हे जगदानन्द, सुनो! तुम बचे हुए प्रसादको खा लो॥”10॥ आग्रह करिया ताँरे बसि' खाओयाइल। आपने आग्रह करि' परिवेशन कैल॥ 11॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीने आग्रह करके श्रीजगदानन्द पण्डितको खानेके लिये बैठाया और स्वयं ही बहुत आग्रह करके प्रसाद परोसा॥ 11॥ आग्रह करिया पुनः पुनः खाओयाइल। आचमन करि निन्दा करिते लागिल॥ 12॥

वास्तविक शुद्धवैराग्यवान् गौरभक्तोंको वैराग्यहीन समझकर उनकी निन्दा :— “शुनि, चैतन्यगण करे बहुत भक्षण। 'सत्य' सेइ वाक्य,—साक्षात् देखिलुँ एखन॥ 13॥ संन्यासीरे एत खाओयाञा करे धर्मनाश। वैरागी हञा एत खाय, वैराग्येर नाहि 'भास'॥”14॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरी आग्रह करके उनको बार बार खिलाते रहे और जैसे ही श्रीजगदानन्द पण्डितने आचमन किया, रामचन्द्रपुरी उनकी निन्दा करने लगे,—“मैंने सुना था कि चैतन्य महाप्रभुके अनुयायी बहुत अधिक खाते हैं। आज मैंने साक्षात् रूपसे देख लिया कि वह बात सत्य ही है। और वे संन्यासियोंको भी इतना अधिक खिलाकर उनके धर्मको नष्ट करवाते हैं। वे स्वयं वैरागी होकर इतना अधिक खाते हैं, उनमें तो वैराग्यका आभासमात्र भी नहीं है।”12-14॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'भास',—आभासमात्र भी॥ 14॥ रामचन्द्रपुरीका स्वभाव :— एइ त' स्वभाव ताँर आग्रह करिया। पिछे निन्दा करे, आगे बहुत खाओयाञा॥ 15॥ अनुवाद—रामचन्द्रपुरीका स्वभाव ही ऐसा था कि वे पहले तो बहुत आग्रह करके खिलाते और बादमें निन्दा करते॥ 15॥ गुरुके द्वारा त्यक्त रामचन्द्रपुरीके पूर्व वृत्तान्तका वर्णन; गुरुदेव श्रीमाधवेन्द्रपुरीके अप्रकट होनेके समय रामचन्द्रका आगमन :— पूर्वे यबे माधवेन्द्रपुरी करेन अन्तर्धान। रामचन्द्रपुरी तबे आइला ताँर स्थान॥ 16॥ अनुवाद—पूर्वकालमें जब श्रीमाधवेन्द्रपुरी अन्तर्धान लीला कर रहे थे, तब रामचन्द्रपुरी उनकी भजनस्थलीपर आये थे॥ 16॥