श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2253, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें236 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/4-7 ] अनुवाद—इस प्रकार श्रीगौरचन्द्र अपने भक्तोंके साथ कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें नीलाचलमें लीलाएँ कर रहे थे॥4॥ रामचन्द्रपुरीका आगमन :- हेनकाले रामचन्द्रपुरी-गोसाञि आइला। परमानन्द-पुरीरे आर प्रभुरे मिलिला॥5॥ अनुवाद—तब रामचन्द्रपुरी गोसाईं नीलाचलमें आये और वे श्रीपरमानन्द पुरी और महाप्रभुसे मिले॥5॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'रामचन्द्रपुरी',—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेके कारण महाप्रभु और श्रीपरमानन्दपुरीने इनका सम्मान किया था॥5॥ अमृताणुकणा—श्रीगौरगणोद्देश दीपिका (92)में श्रीरामचन्द्रपुरीके सम्बन्धमें कहा गया है,— “विभीषणो यः प्रागासीद्रामचन्द्रपुरी स्मृतः। जटिला राधिका-श्वश्रूः कार्यतोऽविशदेव तम्। अतो महाप्रभुर्भिक्षासङ्कोचादि ततोऽकरोत् ॥ ” “जो पहले विभीषण थे, वे गौरलीलामें रामचन्द्रपुरीके नामसे विख्यात हैं। श्रीराधाकी सास 'जटिला'ने कार्यवशतः उनमें प्रवेश किया था, इसलिये ही महाप्रभुने उनके भयसे भिक्षामें सङ्कोचादि किया।” श्रीमन्महाप्रभु वाराणसीमें दो मास रहनेके समय श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें कुछ समयके लिये छिपे थे। (चैतन्यभागवत मध्यखण्ड 19/05में)— “रामचन्द्रपुरीर मठेते लुकाइया। रहिलेन दुइमास वाराणसी गिया।” श्रीश्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपादने यह 'गौड़ीय भाष्य'में जनाया है,—“श्रीगौरसुन्दर वाराणसीमें श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहे थे। श्रीचैतन्यभागवतके लेखक ठाकुर वृन्दावन श्रीमन्महाप्रभुके श्रीरामचन्द्रपुरीके मठमें छिपे रहनेकी बातसे अवगत थे। रामचन्द्रपुरी माधवेन्द्रपुरीके एक कपट शिष्य थे, उनका मायावादके प्रति बहुत आग्रह था। लोगोंमें श्रीमन्महाप्रभुने प्रचार किया कि वे रामचन्द्रपुरीके मठमें रहते हैं, परन्तु वे कृष्णभक्तोंके साथ कहीं और रहे। रामचन्द्रपुरी साम्प्रदायिक संन्यासी थे, इसलिये यति-जीवनमें उस मठमें रहनेपर बाहरके लोगोंको उनपर दोषारोपण करनेका अवसर नहीं था॥5॥ श्रीपरमानन्दपुरी और महाप्रभुके द्वारा रामचन्द्रपुरीको यथोचित पदमर्यादा देना :- परमानन्दपुरी कैल चरण वन्दन। पुरी-गोसाञि कैल ताँरे दृढ़ आलिङ्गन॥6॥ अनुवाद—श्रीपरमानन्दपुरीने रामचन्द्रपुरीके चरणोंकी वन्दना की और रामचन्द्रपुरी गोसाईंने उन्हें दृढ़ आलिङ्गन किया॥6॥ अनुभाष्य—रामचन्द्रपुरी स्वभावसे ईर्ष्यालु और हरि-गुरु-वैष्णव विरोधी होनेपर भी वे बाहरी दृष्टिकोणसे गृहत्यागी अथवा संन्यासीके वेषधारी होनेके कारण ही लोकसमाजमें उस समय 'गोसाईं' (गोस्वामी) नामसे जाने जाते थे। आजकल समाजमें प्रचलित विकृत प्रथाकी भाँति उस समय जाति, कुल अथवा वंशपरम्परामें (गृहस्थोंके लिये) गृहत्यागी व्यक्तियोंकी यह (गोस्वामी) उपाधि व्यवहृत नहीं होती थी, उसका प्रमाण यहाँपर मिलता है॥5-6॥ वैष्णव-संन्यासियोंका साम्प्रदायिक व्यवहार :- महाप्रभु कैला ताँरे दण्डवत् नति। आलिङ्गन करि' तेंहो कैल कृष्णस्मृति॥7॥ अनुवाद—महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीको दण्डवत् प्रणाम किया और रामचन्द्रपुरीने श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए उन्हें आलिङ्गन किया॥7॥ अनुभाष्य—महाप्रभुको ईश्वरपुरीका अनुगत जानकर आलिङ्गन करके वैष्णव-संन्यासी मात्रके ही योग्य- सम्भाषण 'कृष्ण'को स्मरण किया। संन्यासियोंका अभिवादन करनेपर संन्यासी 'ॐ नमो भगवते नारायणाय' कहकर कृष्णका स्मरण करते हैं। संन्यासियोंके लिये जीवको आशीर्वाद और नमस्कार करनेकी विधि नहीं है; स्मृति