भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2252, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2252

आठवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें रामचन्द्रपुरीका इतिहास वर्णित हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य होनेपर भी उन्होंने शुष्कज्ञानियोंके सम्प्रदायके सङ्गसे दूषित सिद्धान्तको लेकर अधर्मका उपदेश दिया था। उसीके कारण पुरी-गोसांईने उन्हें 'अपराधी' कहकर उनका त्याग किया; तबसे दूसरोंकी निन्दा, दूसरोंके दोषोंका अनुसन्धान, शुष्कज्ञानका उपदेश, —इन समस्त कार्योंको करनेके कारण वे वैष्णवोंके द्वारा उपेक्षित हुए। इसके उपरान्त महाप्रभुके भोजन आदिकी निन्दा करनेपर भी महाप्रभुने उन्हें गुरु-सम्बन्ध-बुद्धिके कारण कुछ भी नहीं कहकर मौन रूपसे केवलमात्र (अपने भोजन) प्रसाद-अन्नको सङ्कुचित (कम) कर दिया। रामचन्द्रपुरीके पुरुषोत्तमसे चले जानेपर महाप्रभुने उस सङ्कोचको दूर कर दिया। —(अमृतप्रवाह भाष्य) रामचन्द्रपुरीके भयसे भिक्षा ग्रहण करनेमें सङ्कोच करनेवाले महाप्रभुकी वन्दना :— तं वन्दे कृष्णचैतन्यं रामचन्द्रपुरीभयात्। लौकिकाहारतः स्वं यो भिक्षान्नं समकोचयत्॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिन्होंने रामचन्द्रपुरीके भयसे प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य— यः (कृष्णचैतन्यदेवः) रामचन्द्रपुरीभयात् (रामचन्द्रपुरीत्याख्य- हरिगुरुवैष्णवनिन्दकवाक्यजन्यलौकिकाशङ्काप्रदर्शनात्) लौकिकाहारतः (लोकदर्शन-परिमित-भोज्यान्नात्) स्वं (निजं) भिक्षान्नं (भोजनपरिमाणं युक्ताहार्यम् अपि) समकोचयत् (खर्वीचकार) तं कृष्णचैतन्यम् [अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—जिन्होंने हरि-गुरु-वैष्णव निन्दक रामचन्द्रपुरीके वाक्यसे लौकिक आशङ्का प्रदर्शन करनेके लिये प्रतिदिन ग्रहण करनेवाले लौकिक लीलानुरूप आहारमें-से भी अपने भोजनको कम कर दिया था, उन श्रीकृष्णचैतन्यकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ जय जय श्रीचैतन्य करुणासिन्धु-अवतार। ब्रह्मा-शिवादिक भजे चरण याँहार ॥ 2 ॥ अनुवाद—करुणासिन्धु-अवतार श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो जिनके चरणकमलोंका श्रीब्रह्मा-शिव आदि भी भजन करते हैं॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु—याँर प्राणधन ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु जिनके प्राणधन हैं, उन श्रीवास पण्डितादि समस्त भक्तोंकी जय हो, जय हो॥ 3 ॥ अनुभाष्य—यहाँपर पाठान्तरमें, — “जय जय अवधूतचन्द्र नित्यानन्द। जगत् बाधिल येंहो दिया प्रेम फाँद॥ जय जय श्रीअद्वैत ईश्वर-अवतार। कृष्ण अवतारि' कैला जगत् निस्तार ॥” [अर्थात् “अवधूतचन्द्र उन श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो, जिन्होंने प्रेमरूपी डोरीके द्वारा समस्त जगत्वासियोंको बाँध दिया। ईश्वरके अवतार उन श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, जय हो, जिन्होंने श्रीकृष्णको अवतरित करवाके जगत्का उद्धार कर दिया।”] ॥ 3 ॥ नीलाचलमें भक्तोंके साथ श्रीगौरचन्द्रकी लीला :— एइमत गौरचन्द्र निजभक्त-सङ्गे। नीलाचले क्रीड़ा करे कृष्णप्रेमरङ्गे ॥ 4 ॥