भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2264, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2264

[ 8/82-91 आठवाँ अध्याय 247 प्रति रोष क्यों कर रहे हैं? वे तो सहज धर्मके विषयमें ही बतलाते हैं, इसमें उनका क्या दोष है? संन्यासी होकर जिह्वाके स्वादकी तृप्ति तो बड़ा अपराध है। वास्तवमें संन्यासीका धर्म तो केवल प्राण धारण करनेके लिये ही आहार करना है॥"82-83॥ भक्तोंके आग्रहसे महाप्रभुके द्वारा अर्द्ध-भोजन ग्रहण करना स्वीकार :- तबे सबे मेलि' प्रभुरे बहु यत्न कैला। सबार आग्रहे प्रभु अर्द्धेक राखिला॥84॥ अनुवाद-तब सभी भक्तों ने मिलकर महाप्रभुको पूरा भोजन करनेके लिये बहुत प्रार्थना की, सभी भक्तोंके आग्रहपर महाप्रभुने [एक चौथाईके स्थानपर] आधा भोजन करना स्वीकार किया॥84॥ दुइपण कौड़ि लागे प्रभुर निमन्त्रणे। कभु दुइजन भोक्ता, कभु तिनजने॥85॥ अनुवाद-महाप्रभुको निमन्त्रण करनेपर भोजनका मूल्य दो पण कौड़ी होता था। उस भोजनको कभी दो जन तो कभी तीन जन ग्रहण करते थे॥85॥ अभक्त वर्ण-ब्राह्मण और पंक्ति-ब्राह्मणके घरमें महाप्रभुके भिक्षाको ग्रहण करनेकी रीतिका वैशिष्ट्य :- अभोज्यान्न विप्र यदि करेन निमन्त्रण। प्रसाद-मूल्य लइते लागे कौड़ि दुइपण॥86॥ अनुवाद-कोई ब्राह्मण जिसके गृहमें भोजन स्वीकार नहीं किया जा सकता, यदि वह महाप्रभुको निमन्त्रण करता तो उसको महाप्रभुके लिये दो पण कौड़ी मूल्यका श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद लाना होता॥86॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'अभोज्यान्न विप्र',-जिस ब्राह्मणके घरमें भोजन नहीं खाया जाता॥86॥ भोज्यान्न विप्र यदि निमन्त्रण करे। किछु 'प्रसाद' आने, किछु पाक करे घरे॥87॥ अनुवाद-जिसके गृहमें निमन्त्रण स्वीकार किया जा सकता है, यदि ऐसा कोई ब्राह्मण महाप्रभुको निमन्त्रण करता, तो वह महाप्रभुके लिये कुछ श्रीजगन्नाथदेवका प्रसाद मूल्य देकर ले आता और शेष स्वयं अपने घरपर पकाकर खिलाता॥87॥ श्रीगदाधर, श्रीभगवान् और श्रीसार्वभौमके घरमें भक्ताधीन भगवान्का भोजन :- पण्डित-गोसाञि, भगवान्-आचार्य, सार्वभौम। निमन्त्रणेर दिने यदि करे निमन्त्रण॥88॥ ताँ सबार इच्छाय प्रभु करेन भोजन। ताँहा प्रभुर स्वातन्त्र्य नाइ, यैछे ताँर मन॥89॥ अनुवाद-श्रीगदाधर पण्डित, श्रीभगवान् आचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य-यदि इन तीनोंमें-से कोई भी महाप्रभुको निमन्त्रण करनेके दिन निमन्त्रण देते, तो महाप्रभु उन सबकी इच्छानुसार ही भोजन करते। महाप्रभु भक्तोंके मनके अनुसार ही चलते, उसमें उनकी अपनी कोई भी स्वतन्त्रता नहीं थी॥88-89॥ महाप्रभुके अवतारका उद्देश्य और व्यवहार रीति :- भक्तगणे सुख दिते प्रभुर 'अवतार'। याँहा यैछे योग्य, ताँहा करेन व्यवहार॥90॥ अनुवाद-महाप्रभुका अवतार भक्तोंको सुख देनेके लिये ही हुआ है। महाप्रभु भक्तोंके साथ यथायोग्य व्यवहार करते॥90॥ महाप्रभुके द्वारा कभी तो प्राकृत-जीवकी भाँति आचरणके द्वारा वञ्चना, कभी परमेश्वरके रूपमें पूर्ण कृपा :- कभु लौकिक रीति,-येन 'इतर' जन। कभु स्वतन्त्र, करेन ऐश्वर्य्य प्रकटन॥91॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो साधारण लोगोंकी भाँति लौकिक रीतिका पालन करते और कभी स्वतन्त्र परमेश्वरके रूपमें अपना ऐश्वर्य्य प्रकट करते थे॥91॥

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