भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2265, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2265

248 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 8/92-96 ] कभी तो रामचन्द्रपुरीको लौकिकी मर्यादा-प्रदान, कभी तृणकी भाँति उपेक्षा :- कभु रामचन्द्रपुरीर हय भृत्यप्राय। कभु तारे नाहि माने, देखे तृण-प्राय ॥ 92 ॥ उससे भक्तोंके हृदयका भार कम होना और बन्द हुई साँसका खुलना :- तेंहो गेले प्रभुर गण हैल हरषित। शिरेर पाथर येन पड़िल आचम्बित ॥ 95 ॥ अनुवाद-महाप्रभु कभी तो रामचन्द्रपुरीके साथ ऐसा व्यवहार करते जैसे वे स्वयं उनके दास हों और कभी वे उनकी तिनकेके समान उपेक्षा करते ॥ 92 ॥ अनुवाद-रामचन्द्रपुरीके जगन्नाथ पुरीसे चले जानेपर महाप्रभुके समस्त भक्त परम प्रसन्न हुए। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनके सिरपर रखा कोई भारी पत्थरका बोझा अचानक नीचे गिर पड़ा हो ॥ 95 ॥ अचिन्त्य ईश्वरके समस्त आचरण ही नित्य, मङ्गलमय और सुन्दर :- ईश्वर-चरित्र प्रभुर-बुद्धि-अगोचर। यबे येइ करेन, सेइ सब मनोहर ॥ 93 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'शिरेर पाथर,' - सिरपर जो पत्थरका बोझा था, उसके अचानक गिर जानेसे जिस प्रकार सिर हलका हो जाता है, वैसा हुआ ॥ 95 ॥ आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुवाद-महाप्रभुका आचरण उनकी स्वयं-भगवत्ताके अनुरूप ही होता है जो सबकी बुद्धिके अगोचर है। वे स्वतन्तरूपमें जब जो कुछ करते हैं, वह सब मनोहर होता है ॥ 93 ॥ लौकिक शुष्क वैराग्यकी विधिको त्याग करके श्रीगौरमें समर्पित प्राणवाले भक्तोंके द्वारा अपनी सर्वात्माके द्वारा महाप्रभुको सन्तुष्ट करना :- स्वच्छन्दे निमन्त्रण, प्रभुर कीर्त्तन-नर्त्तन। स्वच्छन्दे करेन सबे प्रसाद-भोजन ॥ 96 ॥ भगवान्का आश्रय परित्यागकर रामचन्द्रकी तीर्थयात्रा :- एइमत रामचन्द्रपुरी नीलाचले। दिन कत राहि' गेला 'तीर्थ' करिबारे ॥ 94 ॥ अनुवाद-अब भक्त महाप्रभुको स्वच्छन्द रूपसे निमन्त्रण करते, महाप्रभु स्वच्छन्द रूपसे कीर्तन और नृत्य करते एवं समस्त भक्त स्वच्छन्द रूपसे प्रसाद ग्रहण करते ॥ 96 ॥ अनुवाद-इस प्रकार रामचन्द्रपुरी कुछ दिनों तक नीलाचलमें रहनेके पश्चात् तीर्थ करनेके लिये चले गये ॥ 94 ॥