श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 8/96-101 आठवाँ अध्याय 249 गुरुकी अवज्ञाके कारण गुरुके द्वारा उपेक्षाके फलस्वरूप जीवोंका विष्णु-विरोध अथवा पाखण्डी बनना :- गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे फल हय। क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे ठेकय ॥ 97 ॥ अनुवाद—गुरुके द्वारा उपेक्षा किये जानेपर ऐसा ही फल हुआ करता है, गुरुके प्रति अपराध क्रमशः बढ़ते-बढ़ते भगवान्के प्रति भी अपराध होने लगता है॥ 97 ॥ अपराधी रामचन्द्रके व्यवहारके द्वारा महाप्रभुकी लोकशिक्षा :- यद्यपि गुरुबुद्ध्ये प्रभु तार दोष ना लइल। तार फलद्वारा लोके शिक्षा कराइल ॥ 98 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीके प्रति गुरुबुद्धि रखनेके कारण उनका कोई दोष नहीं लिया, तथापि उन्होंने रामचन्द्रपुरीके गुरु-अपराधके फलके द्वारा लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 98 ॥ कानके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके पानके फलसे हृदय-कानको रसायनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र—येन अमृतेर पूर। शुनिते श्रवणे मने लागये मधुर ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र अमृतसे भरपूर है। उसका सुनना कानों और मनको बहुत मधुर लगता है॥ 99 ॥ चैतन्यचरित्रके श्रवणसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र लिखि, शुन एकमने। अनायासे पाबे प्रेम श्रीकृष्णचरणे ॥ 100 ॥ अनुवाद—मैं (ग्रन्थकार) श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरित्रको लिख रहा हूँ। हे पाठकगण ! आप एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो, इसके द्वारा आपको अनायास ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रति प्रेमकी प्राप्ति होगी ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 101 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भिक्षासङ्कोचो नाम अष्टमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 101 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें भिक्षासङ्कोच नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।