भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2266, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2266

[ 8/96-101 आठवाँ अध्याय 249 गुरुकी अवज्ञाके कारण गुरुके द्वारा उपेक्षाके फलस्वरूप जीवोंका विष्णु-विरोध अथवा पाखण्डी बनना :- गुरु उपेक्षा कैले, ऐछे फल हय। क्रमे ईश्वर-पर्यन्त अपराधे ठेकय ॥ 97 ॥ अनुवाद—गुरुके द्वारा उपेक्षा किये जानेपर ऐसा ही फल हुआ करता है, गुरुके प्रति अपराध क्रमशः बढ़ते-बढ़ते भगवान्‌के प्रति भी अपराध होने लगता है॥ 97 ॥ अपराधी रामचन्द्रके व्यवहारके द्वारा महाप्रभुकी लोकशिक्षा :- यद्यपि गुरुबुद्ध्ये प्रभु तार दोष ना लइल। तार फलद्वारा लोके शिक्षा कराइल ॥ 98 ॥ अनुवाद—यद्यपि महाप्रभुने रामचन्द्रपुरीके प्रति गुरुबुद्धि रखनेके कारण उनका कोई दोष नहीं लिया, तथापि उन्होंने रामचन्द्रपुरीके गुरु-अपराधके फलके द्वारा लोगोंको शिक्षा प्रदान की ॥ 98 ॥ कानके द्वारा श्रीचैतन्यचरितामृतके पानके फलसे हृदय-कानको रसायनकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र—येन अमृतेर पूर। शुनिते श्रवणे मने लागये मधुर ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र अमृतसे भरपूर है। उसका सुनना कानों और मनको बहुत मधुर लगता है॥ 99 ॥ चैतन्यचरित्रके श्रवणसे ही कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :- चैतन्यचरित्र लिखि, शुन एकमने। अनायासे पाबे प्रेम श्रीकृष्णचरणे ॥ 100 ॥ अनुवाद—मैं (ग्रन्थकार) श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरित्रको लिख रहा हूँ। हे पाठकगण ! आप एकाग्रचित्तसे उसका श्रवण करो, इसके द्वारा आपको अनायास ही श्रीकृष्णके चरणकमलोंके प्रति प्रेमकी प्राप्ति होगी ॥ 100 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 101 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे भिक्षासङ्कोचो नाम अष्टमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 101 ॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें भिक्षासङ्कोच नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।