श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/31-40 नौवाँ अध्याय 255 महाप्रभुके द्वारा निरपेक्षताका प्रदर्शन और गोपीनाथका तिरस्कार :- शुनि' प्रभु कहे किछु करि' प्रणय-रोष। “राज-कौड़ि दिते नारे, राजार किबा दोष ?? 31 ॥ अनुवाद—सारा वृत्तान्त सुननेके बाद महाप्रभुने कुछ प्रणय-रोष करते हुए कहा, — “गोपीनाथ राजाका धन दे नहीं सकता तो इसमें राजाका क्या दोष है ? 31 ॥ अनुभाष्य—'दिते नारे', —दे नहीं सकता ॥ 31 ॥ राज-विलात् साधि' खाय, नाहि राज-भय। दारी-नाटुयारे दिया करे नाना व्यय ॥ 32 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ लोगोंसे राजकर लेकर उसे स्वयं उपभोग करता है। राजाका कोई भय नहीं करके वह वेश्याओं और नर्तकियोंपर धनको लुटाता है ॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राज-विलात्', —बाहरसे राजाको प्राप्त होनेवाला कर (राजाका भण्डार अथवा सम्पत्ति); 'दारी-नाटुयारे', —वेश्या और नर्तकियोंपर। इन सब लोगोंको देकर धन व्यय करता है, राजाको भी पैसे देने पड़ेंगे,—इस प्रकारका भय नहीं करता ॥ 32 ॥ येइ चतुर, सेइ करे राजार विषय। राज-द्रव्य शोधि' पाय, ताहा करे व्यय ॥” 33 ॥ अनुवाद—जो चतुर है, उसे ही राजकर संग्रह आदि कार्य करने चाहिये। राजाके धनको उन्हें देनेके पश्चात् जो कुछ बचता है, उसे उसीको व्यय करना चाहिये ॥” 33 ॥ उस समय महाप्रभुको श्रीभवानन्दादिके सपरिवार बन्धनके समाचारकी प्राप्ति :- हेनकाले आर लोक आइल धाञा। “वाणीनाथादि सवंशे लञा गेल बान्धिया ॥” 34 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़कर आया और महाप्रभुसे कहने लगा,—'राजकर्मचारी वाणीनाथ आदिको भी परिवारसहित बाँधकर ले गये हैं ॥' 34 ॥ संन्यास धर्मके आदर्शरूपमें महाप्रभुके द्वारा सांसारिक बातोंमें उदासीनता या निरपेक्षताका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,—“राजा आपने लेखार द्रव्य लइब। आमि—विरक्त संन्यासी, ताहे कि करिब ?? 35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “राजाका जो अपना धन है, उसे वे अपने आप लेंगे। मैं तो विरक्त संन्यासी हूँ, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” 35 ॥ अनुभाष्य—'लेखार द्रव्य'—हिसाबका पैसा ॥ 35 ॥ श्रीस्वरूप-दामोदरादि भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको उदासीनता छोड़कर श्रीरामानन्दके स्वजनोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना :- तबे स्वरूपादि गोसाञिर भक्तगण। प्रभुर चरणे सबे कैला निवेदन ॥ 36 ॥ “रामानन्द-रायेर गोष्ठी, सब—तोमार 'दास'। तोमार उचित नहे करिते उदास ॥” 37 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदि भक्तोंने महाप्रभुके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हुए कहा, — “रामानन्द रायका सम्पूर्ण परिवार ही आपका दास है, उनके प्रति उदासीन होना आपके लिये उचित नहीं है ॥” 36-37 ॥ महाप्रभुके द्वारा क्रोध और भर्त्सना :- शुनि' महाप्रभु कहे सक्रोध वचने। “मोरे आज्ञा देह' सबे, याङ राजस्थाने ! ! 38 ॥ तोमा सबार एइ मत, —राज-ठाञि याञा। कौड़ि मागि' लइ आँचल पातिया ॥ 39 ॥ संन्यासीकी विषयी बातोंमें अयोग्यता :- पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ब्राह्मण। मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष काहन ? ?' 40 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर