श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें254 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/20-30 ]
पैसा अर्थात् जो एक बारमें देनेसे ही सब चुक जाता है, ऐसा द्रव्य; 'द्रव्य भरिब',-राजाके द्वारा प्राप्य द्रविण (चल-सम्पत्ति) अर्थात् पैसा चुकाऊँगा॥ 20 ॥
एक राजपुत्र घोड़ार मूल्य भाल जाने। तारे पाठाइल राजा पात्र-मित्र-सने॥ 22 ॥ सेइ राजपुत्र मूल्य करे घाटाञा। गोपीनाथेर क्रोध हैल मूल्य शुनिया॥ 23 ॥
अनुवाद—एक राजकुमार घोड़ोंके मूल्यको भली-भाँति जानता था, इसलिये राजाने उसे अपने मंत्रियों और मित्रोंके साथ घोड़ोंका मूल्य करनेके लिये भेजा। उस राजकुमारने जान-बूझकर घोड़ोंका बहुत कम मूल्य लगाया। जब गोपीनाथने घोड़ोंके लगाये मूल्यको सुना तो उन्हें बहुत क्रोध आया॥ 22-23 ॥
अनुभाष्य- 'घाटाञा', - कम करके॥ 23 ॥
सेइ राजपुत्रेरे स्वभाव, —ग्रीवा फिराय। ऊर्ध्वमुखे बारबार इति-उति चाय॥ 24 ॥ तारे निन्दा करि' कहे सगर्व वचने। राजा कृपा करे तारे, भय नाहि माने॥ 25 ॥ 'आमार घोड़ा ग्रीवा उठाय ऊर्ध्वे नाहि चाय। ताते घोड़ार मूल्य घाटि करिते ना युयाय॥ '26 ॥
अनुवाद—उस राजकुमारका अपनी गर्दनको घुमाते हुए अपने मुखको ऊपर करके बारम्बार इधर-उधर देखनेका स्वभाव था। गोपीनाथ राजकुमारसे डरते नहीं थे, क्योंकि राजा उनके प्रति बहुत कृपालु थे, इसलिये गोपीनाथने उस राजकुमारपर व्यङ्ग करते हुए गर्वसे कहा, —'मेरे घोड़े अपनी गर्दनको घुमाते हैं, किन्तु वे ऊपरकी ओर नहीं देखते। इसलिये घोड़ोंका मूल्य घटाना उचित प्रतीत नहीं होता॥' 24-26 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो राजकुमार घोड़ेके मूल्यको स्थिर कर रहा था, उसका गर्दनको ऊपर उठाकर ऊपर देखनेका स्वभाव था। उस विषयमें परिहास करनेके लिये गोपीनाथने कहा, -'यद्यपि मेरे घोड़े गर्दन तो उठाते हैं, किन्तु ऊपरकी ओर नहीं देखते; अतएव इनका मूल्य कम नहीं हो सकता।' परिहास करनेका तात्पर्य यह है, - 'तुम्हारी अपेक्षा मेरे घोड़ोंका मूल्य कम नहीं है॥' 26 ॥
शुनि' राजपुत्र-मने क्रोध उपजिल। राजार ठाञि याइ' बहु लागानि करिल॥ 27 ॥ 'कौड़ि नाहि दिबे एइ, बेड़ाय छद्म करि'। आज्ञा कर, -चाङ्गे चढ़ाना लइ कौड़ि॥' 28 ॥
अनुवाद—गोपीनाथके व्यङ्गको सुनकर राजकुमार बहुत क्रोधित हो गया। उसने राजाके पास जाकर गोपीनाथके प्रति झूठा दोषारोपण करते हुए कहा, - 'गोपीनाथ हमें देय धन नहीं देना चाहता, उसके पास धन है, किन्तु वह उसे छलसे इधर-उधर उड़ा रहा है। आप यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं उसे चाङ्गपर चढ़ाकर देय धन निकलवा लूँ॥' 27-28 ॥
अनुभाष्य- 'लागानि', — मिथ्या दोषारोपण अथवा अभियोग॥ 27 ॥
राजा बले, - 'येइ भाल, कर सेइ याय। ये उपाये कौड़ि पाइ, कर से उपाय॥' 29 ॥
अनुवाद-राजाने कहा, - 'जो अच्छा हो, तुम जाकर वही करो। जिस उपायसे हमें उससे धनकी प्राप्ति हो, तुम वही उपाय करो॥' 29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'याय', - जाकर॥ 29 ॥
राजपुत्र आसि' तारे चाङ्गे चढ़ाइल। खड्ग-उपरे फेलाइते तले खड्ग पातिल॥' 30 ॥
अनुवाद-राजकुमारने आकर गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उन्हें तलवारोंके ऊपर फेंकनेके लिये उसने मञ्चके नीचे तलवारें भी बिछवा दी हैं॥' 30 ॥