भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2273, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2273

256 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/38-49 ] कहा, — “तुम सभी मुझे राज-दरबारमें जानेका आदेश दे रहे हो! तुम सभीका यही मत है कि मैं राजाके पास जाकर आँचल फैलाकर उससे कौड़ियोंके लिये याचना करूँ। वैसे भी संन्यासी ब्राह्मण तो केवल पाँच गण्डके ही योग्य होता है, तब फिर उसके माँगनेपर राजा दो लाख काहन क्यों देगा?” 38-40 ॥ अनुभाष्य— 'संन्यासी ब्राह्मण', — धनहीन विषय-त्यागी भिक्षावृत्तिके द्वारा जीवन धारण करनेवाला ॥ 40 ॥ 'गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिया ही जानेवाला है'— महाप्रभुको इस समाचारकी प्राप्ति :— हेनकाले आर लोक आइल धाञा। खड्गेर उपरे गोपीनाथे दितेछे डारिया ॥ 41 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़ते हुए आया और उसने बतलाया कि राज-कर्मचारी गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर डालने ही वाले हैं ॥ 41 ॥ भक्तोंके द्वारा गोपीनाथकी रक्षाके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुकी कठोर निरपेक्षता :— शुनि' प्रभुर गण प्रभुरे करे अनुनय। प्रभु कहे, — “आमि भिक्षुक, आमा हैते किछु नय ॥ 42 ॥ उसके लिये श्रीजगन्नाथके चरणोंमें प्रार्थना करनेके लिये सभीको उपदेश :— तारे रक्षा करिते यदि हय सबार मने। सबे मेलि' याह जगन्नाथेर चरणे ॥ 43 ॥ श्रीजगन्नाथदेव—स्वयं ईश्वर और सभीके प्रभु :— ईश्वर जगन्नाथ, —याँर हाते सर्व 'अर्थ'। कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ ॥” 44 ॥ अनुवाद—यह समाचार सुनकर भक्तोंने पुनः महाप्रभुसे अनुनय-विनय किया, किन्तु महाप्रभुने कहा, — “मैं तो भिक्षुक हूँ, मेरे द्वारा कुछ भी नहीं होगा। यदि तुम सबके मनमें उसकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो तुम सभी मिलकर भगवान् जगन्नाथके चरणकमलोंमें प्रार्थना करो। जगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उन्हींके हाथोंमें सब कुछ करनेकी शक्ति है। वे कुछ करने, कुछ नहीं करने अथवा अन्य कुछ करनेमें समर्थ हैं॥” 42-44 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ',—कुछ करने, कुछ नहीं करने या कुछ अन्य करनेमें उन्हींका सामर्थ्य है ॥ 44 ॥ प्रतापरुद्रसे हरिचन्दन-महापात्रके द्वारा गोपीनाथके प्राणोंकी भिक्षाकी याचना :— इँहा यदि महाप्रभु एतेक कहिला। हरिचन्दन-पात्र याइ' राजारे कहिला ॥ 45 ॥ हत्या अथवा प्राणदण्डकी विधिकी अनावश्यकता :— “गोपीनाथ-पट्टनायक—सेवक तोमार। सेवकेर प्राणदण्ड नहे व्यवहार ॥ 46 ॥ विशेष ताहार ठाञि कौड़ि बाकी हय। प्राण निले किबा लाभ? निज धनक्षय ॥ 47 ॥ यथार्थमूल्ये घोड़ा लह, येबा बाकी हय। क्रमे क्रमे दिबे अर्थ, प्राण केने लय ॥” 48 ॥ अनुवाद—यहाँ जब महाप्रभुने ऐसा कहा, तभी राजाके मन्त्री हरिचन्दन महापात्रने जाकर राजासे कहा,— “हे महाराज ! गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके सेवक हैं, सेवकको प्राणदण्ड देना उचित नहीं है। विशेष करके आपने तो उससे बहुत धन लेना है। गोपीनाथके प्राण लेनेसे आपको क्या लाभ होगा? अपितु अपने धनकी ही हानि होगी। आप वास्तविक मूल्यपर उसके घोड़े खरीद लीजिये और जो शेष धन रह जायेगा, उसे वह धीरे-धीरे चुका देगा। आप व्यर्थमें उसके प्राण क्यों लेते हैं?” 45-48 ॥ अनुभाष्य— 'व्यवहार',—विधिसङ्गत, उचित ॥ 46 ॥ गोपीनाथके प्राण-दण्डके सम्बन्धमें राजाके द्वारा अपनी सम्पूर्ण अनभिज्ञता बतलाना :— राजा कहे, — “एइ बात आमि नाहि जानि। प्राण केने लइब, तार द्रव्य चाहि आमि ॥ 49 ॥

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