भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2274

[ 9/49-57 नौवाँ अध्याय 257 तत्क्षणात् गोपीनाथकी रक्षाके लिये आदेश देना :- तुमि याइ' कर ताँहा सर्व समाधान। द्रव्य यैछे आइसे, आर राख तार प्राण॥”50॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“मैं गोपीनाथको प्राण-दण्ड देनेकी बातको तो जानता नहीं हूँ। उसके प्राण क्यों लें? मैं तो केवल उससे धन ही लेना चाहता हूँ। तुम स्वयं जाकर सब समाधान करो। ऐसा उपाय करो, जिससे हमारा धन भी मिल जाय और उसके प्राण भी बच जाँय॥”49-50॥ युवराजको कहकर गोपीनाथके प्राणोंकी रक्षा :- तबे हरिचन्दन आसि' जानारे कहिल। चाङ्गे हैते गोपीनाथे शीघ्र नामाइल॥51॥ अनुवाद—तब हरिचन्दनने आकर बड़-जानाको राजाकी इच्छासे अवगत कराया और उन्होंने शीघ्र ही गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गसे नीचे उतारा॥51॥ राजाके धनको लौटानेके उपायकी जिज्ञासा, गोपीनाथका उत्तर :- 'द्रव्य देह'—राजा मागे, उपाय पुछिल। “यथार्थ-मूल्ये घोड़ा लह”, तेंह त' कहिल॥52॥ “क्रमे क्रमे दिमु, आर यत किछु पारि। अविचारे प्राण लह,—कि बलिते पारि??”53॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“राजा तुमसे धन माँग रहे हैं, मुझे बताओ कि तुम्हारे पास उसके लिये क्या उपाय है?” श्रीगोपीनाथ पट्टनायकने कहा,—“आप लोग उचित मूल्य देकर मेरे घोड़े खरीद लो। मैं धीरे-धीरे करके जितना हो सकेगा, शेष धन भी लौटा दूँगा। किन्तु युवराज तो बिना कोई विचार किये मेरे प्राण लेना चाहता है, इसपर मैं क्या कह सकता हूँ?”52-53॥ यथार्थ मूल्य करि' घोड़ा-मूल्ये लइल। आर द्रव्येर मुद्दती करि' घरे पाठाइल॥54॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने उचित मूल्यपर श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके सब घोड़ोंको खरीद लिया और शेष राशिके लिये समय निश्चित करके उन्हें घर भेज दिया॥54॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुद्दती करि',—पैसे देनेके (मियाद) समयको स्वीकार करवाकर॥54॥ समाचार लानेवालेसे महाप्रभुके द्वारा वाणीनाथके विषयमें जिज्ञासा :- एथा प्रभु सेइ मनुष्येरे प्रश्न कैल। “वाणीनाथ कि करे, यबे बान्धिया आनिल??”55॥ अनुवाद—इधर महाप्रभुने संवाद लानेवाले व्यक्तिसे प्रश्न किया,—“जब राज-कर्मचारी वाणीनाथको बाँधकर ला रहे थे, तब वे क्या कर रहे थे?”55॥ वाणीनाथके द्वारा हाथपर संख्या-नाम-ग्रहण :- “वाणीनाथ निर्भयेते लय कृष्णनाम। 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' कहे अविश्राम॥56॥ संख्या लागि' दुइ-हाते अङ्गुलीते लेखा। सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे काटे रेखा॥”57॥ अनुवाद—संवाद लानेवालेने कहा,—“श्रीवाणीनाथ निर्भय होकर कृष्णनाम कर रहे थे, वे निरन्तर 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' महामन्त्र ही कह रहे थे। श्रीवाणीनाथ संख्यापूर्वक नाम करनेके उद्देश्यसे अपने दोनों हाथोंकी अँगुलियोंपर गणना कर रहे थे। जब उनका एक हजार नाम करना पूर्ण हो जाता, तब वे अपने शरीरपर एक चिह्न बना लेते॥”56-57॥ अनुभाष्य—संख्या-ग्रहण करनेमें नियमकी रक्षा करते हुए “हरे कृष्ण”-महामन्त्र (सोलह नाम, बत्तीस अक्षर) कीर्तन करनेकी विधि—एकान्तिक नामाश्रित प्रत्येक साधकके लिये ही सुखमें-दुःखमें, सम्पदमें-विपत्तिमें— सभी अवस्थाओंमें सदा पालनीय है, ऐसा जाना जा रहा है॥56-57॥