भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2275, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2275

258 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/58–68 ]

यह सुनकर महाप्रभुको आनन्द :— शुनि' महाप्रभु हइला परम आनन्द। के बुझिते पारे गौरेर कृपा–छद्मबन्ध ? ? 58 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको परम आनन्द हुआ। श्रीगौरसुन्दरकी गुप्त रूपमें की गयी कृपाको भला कौन समझ सकता है ? 58 ॥ अनुभाष्य—'कृपा–छद्मबन्ध',—दैव–संघटनके छलसे अनुग्रह ॥ 58 ॥ काशीमिश्रका आगमन; उन्हें अपनी आलालनाथकी यात्राके विषयमें बतलाना :— हेनकाले काशीमिश्र आइला प्रभु–स्थाने। प्रभु ताँरे कहे किछु सोद्वेग–वचने ॥ 59 ॥ “इँहा रहिते नारि, यामु आलालनाथ। नाना उपद्रव इँहा, ना पाइ सोयाथ ॥ 60 ॥ श्रीभवानन्द–रायके वंशके व्यक्तियोंके विषयमें अभियोग :— भवानन्द–रायेर गोष्ठी करे राजविषय। नानाप्रकारे करे तारा राजद्रव्य–व्यय ॥ 61 ॥ राजार कि दोष ? राजा निज–द्रव्य चाय। दिते नारे द्रव्य, दण्ड आमारे जानाय ॥ 62 ॥ राजा गोपीनाथे यदि चाङ्गे चड़ाइल। चारिबारे लोके आसि' मोरे जानाइल ॥ 63 ॥ महाप्रभुकी सांसारिक बातोंमें अनिच्छा बतलाना :— भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी। आमाय दुःख देय, निज दुःख कहिं आसिं ॥ 64 ॥ आजि तारे जगन्नाथ करिला रक्षण। कालि के राखिबे, यदि ना दिबे राजधन ? ? 65 ॥ विषयीर वार्त्ता शुनि' क्षोभ हय मन। ताते इँहा राहि' मोर नाहि प्रयोजन ॥” 66 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीकाशीमिश्र महाप्रभुके पास आये और उन्हें देखकर महाप्रभुने कुछ उद्वेगके साथ कहा,—“मैं यहाँ रह नहीं पाऊँगा, मैं आलालनाथ चला जाऊँगा। यहाँ जगन्नाथपुरीमें अनेक प्रकारके उपद्रव हैं, मुझे यहाँ शान्ति नहीं मिलती। भवानन्द रायके परिवारवाले राजकार्य करते हैं, परन्तु वे अनेक प्रकारसे राजाके धनका व्यय करते हैं। इसमें राजाका क्या दोष है? राजा तो राजकीय धन चाहता है। जब देय राजकीय धनको दे नहीं पानेपर राजा उन्हें दण्ड देता है, तब वे मुझे दण्ड और उससे रक्षाकी बात कहलवा भेजते हैं। जब राजाने गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ाया, तब चार बार लोगोंने आकर मुझे सूचना दी। मैं भिक्षा माँगकर जीविका निर्वाह करनेवाला संन्यासी हूँ। और मैं निर्जन स्थानमें एकान्त वास करता हूँ, किन्तु ये लोग आकर अपने दुःखके विषयमें बतलाकर मुझे दुःखी करते हैं। आज भगवान् श्रीजगन्नाथने गोपीनाथकी रक्षा की है। किन्तु यदि वह फिरसे राजधन नहीं देगा, तो कल कौन उसकी रक्षा करेगा? विषयी व्यक्तियोंकी बात सुननेसे मनमें क्षोभ होता है, इसलिये मेरा यहाँ रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है॥” 59–66 ॥ काशीमिश्रका महाप्रभुको आश्वासन और उनकी स्तुति :— काशीमिश्र कहे प्रभुर धरिया चरणे। “तुमि केने एइ बाते क्षोभ कर मने ? ? 67 ॥ विष्णुप्रतिकी कामनाके अतिरिक्त अपनी जड़ेन्द्रियोंके तर्पणके लिये विष्णुसे फलकी कामना—मूर्खता और वाणिज्य मात्र :— संन्यासी विरक्त तोमार का–सने सम्बन्ध? व्यवहार लागि' तोमा भजे, सेइ ज्ञान–अन्ध ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर कहा,—“क्यों इन बातोंसे आपके मनमें क्षोभ हो रहा है? आप तो विरक्त संन्यासी हैं, आपका किसीके साथ क्या सम्बन्ध है? जो किसी व्यवहारिक वस्तुके लिये आपका भजन करता है, वह तो ज्ञानके विषयमें अन्धा अर्थात् अज्ञानी है॥ 67–68 ॥ अनुभाष्य—'व्यवहार',—जीविका अथवा प्राकृत भोग; विषयी लोग अपने-अपने विषय लाभके लिये फल–भोग