श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2268, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंनौवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें श्रीभवानन्द रायके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायकके द्वारा राजाके धनको नष्ट करनेके फलसे युवराज बड़-जानाका रुष्ट होना और उसके फलस्वरूप उन्हें पहले चाङ्ग (पयर 13का अमृतप्रवाह भाष्य देखें) पर चढ़ाना तथा बादमें महाप्रभुकी कृपाके छलसे उनके उद्धार और उन्नतिका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौरभक्तोंकी कृपासे अधम विषयी व्यक्तियोंको भी कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां प्रेमवन्वया। निन्येऽधन्यजनस्वान्तमरुं शश्वदनूपताम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—असंख्य [धन्य] चैतन्य भक्तोंकी प्रेमकी बाढ़के द्वारा अधन्य व्यक्तियोंके [भक्तिरहित] अन्तःकरणरूपी रेगिस्तान भी जलमय हो गये थे॥ १॥ अनुभाष्य— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां (अगण्याः गणयितुमशक्याः असंख्याः धन्याः लब्धसिद्धयश्च ये चैतन्यगणाः चैतन्यपादाश्रिताः भक्ताः तेषां) प्रेमवन्वया (प्रेमरूपनदीगर्भातिरिक्तजलप्रवाहेण) अधन्यजनस्वान्तमरुम् (अधन्यानाम् अधमानां जनानां भक्तिरहितानां स्वानाम् अन्तःकरणरूपं मरुं निर्जलप्रदेशं) शश्वत् (निरन्तरं) अनूपतां (जलप्रायतां) निन्ये (प्रापितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय। जय जय नित्यानन्द करुण-हृदय॥ २॥ अनुवाद—दयामय श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ २॥ जयद्वैताचार्य जय जय दयामय। जय गौरभक्तगण सब रसमय॥ ३॥ अनुवाद—दयामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। आनन्दसे परिपूर्ण समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ ३॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल-लीला :— एइमत महाप्रभु भक्तगण सङ्गे। नीलाचले वास करेन कृष्णप्रेमरङ्गे॥ ४॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते हुए कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें डूबे रहते थे॥ ४॥ महाप्रभुके अन्तरमें और बाहरमें कृष्णविरहप्रेम :— अन्तरे-बाहिरे कृष्णविरह-तरङ्ग। नाना-भावे व्याकुल मन आर अङ्ग॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुके भीतर और बाहर कृष्णविरहकी तरङ्गें उठती रहती थीं। अनेक प्रकारके भावोंसे महाप्रभुके मन और शरीर व्याकुल रहते॥ ५॥ दिनके समय नृत्य, कीर्तन और दर्शन, रात्रिके समय श्रीस्वरूप और श्रीरायके साथ रसास्वादन :— दिने नृत्य-कीर्त्तन, जगन्नाथ-दरशन। रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन॥ ६॥ अनुवाद—दिनमें महाप्रभु नृत्य, कीर्तन और भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करते। रात्रिमें वे श्रीरामानन्द राय और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ रसका आस्वादन करते॥ ६॥ महाप्रभुका दर्शन करनेमात्रसे ही उद्धार और कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— त्रिजगतेर लोक आसि' करेन दरशन। येइ देखे, सेइ पाय कृष्णप्रेम-धन॥ ७॥