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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

नौवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें श्रीभवानन्द रायके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायकके द्वारा राजाके धनको नष्ट करनेके फलसे युवराज बड़-जानाका रुष्ट होना और उसके फलस्वरूप उन्हें पहले चाङ्ग (पयर 13का अमृतप्रवाह भाष्य देखें) पर चढ़ाना तथा बादमें महाप्रभुकी कृपाके छलसे उनके उद्धार और उन्नतिका वर्णन हुआ है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) गौरभक्तोंकी कृपासे अधम विषयी व्यक्तियोंको भी कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां प्रेमवन्वया। निन्येऽधन्यजनस्वान्तमरुं शश्वदनूपताम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—असंख्य [धन्य] चैतन्य भक्तोंकी प्रेमकी बाढ़के द्वारा अधन्य व्यक्तियोंके [भक्तिरहित] अन्तःकरणरूपी रेगिस्तान भी जलमय हो गये थे॥ १॥ अनुभाष्य— अगण्यधन्यचैतन्यगणानां (अगण्याः गणयितुमशक्याः असंख्‍याः धन्याः लब्धसिद्धयश्च ये चैतन्यगणाः चैतन्यपादाश्रिताः भक्ताः तेषां) प्रेमवन्वया (प्रेमरूपनदीगर्भातिरिक्तजलप्रवाहेण) अधन्यजनस्वान्तमरुम् (अधन्यानाम् अधमानां जनानां भक्तिरहितानां स्वानाम् अन्तःकरणरूपं मरुं निर्जलप्रदेशं) शश्वत् (निरन्तरं) अनूपतां (जलप्रायतां) निन्ये (प्रापितः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य दयामय। जय जय नित्यानन्द करुण-हृदय॥ २॥ अनुवाद—दयामय श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो। करुणासे परिपूर्ण हृदयवाले श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥ २॥ जयद्वैताचार्य जय जय दयामय। जय गौरभक्तगण सब रसमय॥ ३॥ अनुवाद—दयामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। आनन्दसे परिपूर्ण समस्त गौरभक्तोंकी जय हो॥ ३॥ भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल-लीला :— एइमत महाप्रभु भक्तगण सङ्गे। नीलाचले वास करेन कृष्णप्रेमरङ्गे॥ ४॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु भक्तोंके साथ नीलाचलमें वास करते हुए कृष्णप्रेमकी तरङ्गोंमें डूबे रहते थे॥ ४॥ महाप्रभुके अन्तरमें और बाहरमें कृष्णविरहप्रेम :— अन्तरे-बाहिरे कृष्णविरह-तरङ्ग। नाना-भावे व्याकुल मन आर अङ्ग॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुके भीतर और बाहर कृष्णविरहकी तरङ्गें उठती रहती थीं। अनेक प्रकारके भावोंसे महाप्रभुके मन और शरीर व्याकुल रहते॥ ५॥ दिनके समय नृत्य, कीर्तन और दर्शन, रात्रिके समय श्रीस्वरूप और श्रीरायके साथ रसास्वादन :— दिने नृत्य-कीर्त्तन, जगन्नाथ-दरशन। रात्र्ये राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन॥ ६॥ अनुवाद—दिनमें महाप्रभु नृत्य, कीर्तन और भगवान् श्रीजगन्नाथका दर्शन करते। रात्रिमें वे श्रीरामानन्द राय और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीके साथ रसका आस्वादन करते॥ ६॥ महाप्रभुका दर्शन करनेमात्रसे ही उद्धार और कृष्णप्रेमकी प्राप्ति :— त्रिजगतेर लोक आसि' करेन दरशन। येइ देखे, सेइ पाय कृष्णप्रेम-धन॥ ७॥

252 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/7-13 ] अनुवाद—त्रिभुवनके लोग आकर महाप्रभुके दर्शन करते और जो कोई भी उनके दर्शन करता, उसको कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति हो जाती॥7॥ मनुष्यके वेषमें अनन्त ब्रह्माण्डवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- मनुष्येर वेशे आसि' गन्धर्व-किन्नर। सप्तपातालेर यत दैत्य विषधर॥8॥ अनुवाद—सात उच्च लोकोंसे गन्धर्व-किन्नर आदि और पातालादि सात निम्न लोकोंसे दैत्य तथा नाग आदि मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुका दर्शन करते॥8॥ अनुभाष्य—'विषधर',—नागलोक॥8॥ सप्तद्वीपे नवखण्डे वैसे यत जन। नाना-वेशे आसि' करे प्रभुर दरशन॥9॥ अनुवाद—सात द्वीपों और नौ खण्डोंमें रहनेवाले लोग भी विविध वेश धारण करके महाप्रभुके दर्शन करने आते॥9॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 2/10 संख्या देखें॥9॥ वैष्णवोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- प्रह्लाद, बलि, व्यास, शुक आदि मुनिगण। आसि' प्रभु देखि' प्रेमे हय अचेतन॥10॥ अनुवाद—श्रीप्रह्लाद महाराज, श्रीबलि महाराज, श्रीव्यासदेव, श्रीशुकदेव गोस्वामी आदि मुनिगण आकर महाप्रभुके दर्शन करते और प्रेममें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते॥10॥ अनुभाष्य—'प्रह्लाद',—किसी-किसी ऐतिहासिक-मतमें ये त्रेतायुगमें पंजाब प्रदेशकी राजधानी मुलतानमें कश्यपवंशीय राजा हिरण्यकशिपुके वैष्णव-पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए थे। पिता हिरण्यकशिपुके विष्णु-विद्वेषके फलसे पुत्र प्रह्लादको अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़े थे, बादमें भगवान् श्रीनृसिंहदेवने आविर्भूत होकर वैष्णव-विद्वेषी असुर सम्राट्का वध किया था। 'बलि',—प्रह्लादके पुत्र विरोचनके पुत्र ही बलि हैं; भगवान्ने वामनके रूपमें अवतीर्ण होकर तीन पग भूमिकी प्रार्थनाके छलसे आत्मसमर्पण करनेवाले बलिपर कृपा की थी। इनके सौ पुत्रोंमें-से बाण सबसे बड़े थे। 'व्यास',—पाराशरके पुत्र, सात्यवतेय [सत्यवतीके पुत्र] अथवा कृष्ण-द्वैपायन बादरायण-मुनि; ये वेदोंका विभाग करके 'वेदव्यास'के नामसे कहलाये और इन्होंने अठारह महापुराण एवं ब्रह्मसूत्र और उसके भाष्य श्रीमद्भागवत ग्रन्थका प्रणयन किया; ये ब्रह्म-सम्प्रदायके अन्तर्गत श्रीनारद ऋषिके शिष्य थे। 'शुक',—व्यासके पुत्र, पहले आकुमार ब्रह्मज्ञानी और नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी लीला दिखलाकर इन्होंने एकान्तिक रूपसे कृष्णकी 'कीर्तनाख्या' भक्तिका आश्रय ग्रहण किया॥10॥ गृहके भीतर बैठे हुए महाप्रभुके दर्शनार्थियोंका बाहरमें कोलाहल, महाप्रभुके द्वारा दर्शन देना, सभीको कृष्णकथा-कीर्तन करनेका आदेश :- बाहिरे फुकारे लोक, दर्शन ना पाञा। “कृष्ण कह” बलेन प्रभु बाहिरे आसिया॥11॥ अनुवाद—दर्शनार्थी भक्त उनके दर्शन नहीं पाकर उनके वासस्थानके बाहर कोलाहल करते। तब महाप्रभु बाहर आकर उन्हें कहते,—“कृष्ण बोलो॥”11॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीमें कृष्णप्रेम :- प्रभुर दर्शने सब लोक प्रेमे भासे। एइमत याय प्रभुर रात्रि-दिवसे॥12॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शन करके समस्त लोग प्रेममें निमग्न हो जाते। इसी प्रकार महाप्रभुके रात-दिन व्यतीत होते॥12॥ महाप्रभुको राजा प्रतापरुद्रके पुत्रके द्वारा श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको मृत्यु-दण्डके विषयमें बतलाना :- एकदिन लोक आसि' प्रभुरे निवेदिल। “गोपीनाथेरे 'बड़ जाना' चाङ्गे चढ़ाइल॥13॥

[ 9/13–21 नौवाँ अध्याय 253 महाप्रभुकी कृपाके बिना उसकी रक्षा होनेके कोई उपाय नहीं :— तले खड्ग पाति’ तारे उपरे डारिबे। प्रभु रक्षा करेन यबे, तबे निस्तारिबे ॥ 14 ॥ सेवककी रक्षाके लिये महाप्रभुकी कृपाकी याचना :— सवंशे तोमार सेवक—भवानन्द-राय। ताँर पुत्र—तोमार सेवके राखिते युयाय ॥” 15 ॥ अनुवाद—एकदिन कुछ लोगोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया,—“युवराज ‘बड़ जाना’ने गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उसने नीचे तलवारोंको बिछा दिया है। वह गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर फैंकवा देगा। हे महाप्रभु! आप यदि रक्षा करें, तभी गोपीनाथ बच सकता है। श्रीभवानन्द राय और उनका पूरा परिवार आपके सेवक हैं। इसलिये आपके लिये श्रीभवानन्द रायके पुत्रकी रक्षा करना ही उपयुक्त है॥ 13–15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘बड़ जाना’,—उड़ीसाके महाराजके बड़े पुत्र अर्थात् युवराज। ‘चाङ्ग’,—वध करनेकी विशेष प्रक्रियाके लिये व्यवहार किये जानेवाला मञ्च,—जिसके नीचेवाले भागमें नंगी तलवारें रखी होती हैं। दण्डित व्यक्तिको मञ्चके ऊपरसे तलवारोंके ऊपर फेंककर उसके प्राणोंका नाश किया जाता है ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—‘डारिबे’,—फेंक देंगे ॥ 14 ॥ महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें संवाददाताके द्वारा गोपीनाथके मृत्यु-दण्डके वृत्तान्तका वर्णन :— प्रभु कहे,—“राजा केने करये ताड़न?” तबे सेइ लोक कहे सब विवरण ॥ 16 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायक—रामानन्द-भाइ। सर्वकाल हय सेइ ‘राजविषयी’ ताइ ॥ 17 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“राजा गोपीनाथको दण्ड क्यों दे रहे हैं?” तब वे व्यक्ति सब वृत्तान्त सुनाने लगे,—“श्रीरामानन्द रायके भाई गोपीनाथ पट्टनायक सदासे राजाकी सम्पत्तिके रक्षकके रूपमें कार्य करनेवाले हैं ॥ 16–17 ॥ अनुभाष्य— ‘राजविषयी’,—राजाकी सम्पत्तिके रक्षक ॥ 17 ॥ ‘मालजाठ्या-दण्डपाटे’ तार अधिकार। साधि’ पाड़ि’ आनि’ द्रव्य दिल राजद्वार ॥ 18 ॥ दुइलक्ष काहन तार ठाञि बाकी हइल। दुइलक्ष काहन कौड़ि राजा त’ मागिल ॥ 19 ॥ अनुवाद—मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानपर उनकी नियुक्ति हुई है और वे वहींसे राजस्व एकत्रित करके राजाके कोषमें जमा कराते हैं। उनके द्वारा दो लाख काहन कौड़ी कोषमें जमा करवाना शेष रह गया है, इसलिये राजाने उनसे वही दो लाख काहन कौड़ी माँगी है॥ 18–19 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘मालजाठ्या-दण्डपाट’,—मालजाठ्या नामक राज्यके खण्डमें तहसीलदार गोपीनाथ पट्टनायकने जितना पैसा राजाको दिया था, उसमें दो लाख काहन कौड़ी शेष रह गया था ॥ 19 ॥ तेँह कहे,—‘स्थूलद्रव्य नाहि ये दिब। क्रमे-क्रमे बेचि’ किनि’ द्रव्य भरिब ॥ 20 ॥ घोड़ा दश-बार हय, लह’ मूल्य करि’।’ एत बलि’ घोड़ा आने राजद्वारे धरि’ ॥ 21 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ पट्टनायकने राजासे कहा,—‘मेरे पास अभी कौड़ीके रूपमें धन नहीं है जो आपको दे सकूँ। मैं धीरे-धीरे अपनी सम्पत्ति क्रय-विक्रय करके आपका बचा हुआ धन चुका दूँगा। मेरे पास दस-बारह घोड़े हैं, आप उनका मूल्य लगाकर उन्हें खरीद लीजिये।’ यह कहकर गोपीनाथ पट्टनायक घोड़ोंको ले आये और उन्हें राजद्वारपर बाँध दिया ॥ 20–21 ॥ अनुभाष्य—‘स्थूलद्रव्य’,—मूल्यवान द्रव्य अथवा मोटा

254 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/20-30 ]

पैसा अर्थात् जो एक बारमें देनेसे ही सब चुक जाता है, ऐसा द्रव्य; 'द्रव्य भरिब',-राजाके द्वारा प्राप्य द्रविण (चल-सम्पत्ति) अर्थात् पैसा चुकाऊँगा॥ 20 ॥

एक राजपुत्र घोड़ार मूल्य भाल जाने। तारे पाठाइल राजा पात्र-मित्र-सने॥ 22 ॥ सेइ राजपुत्र मूल्य करे घाटाञा। गोपीनाथेर क्रोध हैल मूल्य शुनिया॥ 23 ॥

अनुवाद—एक राजकुमार घोड़ोंके मूल्यको भली-भाँति जानता था, इसलिये राजाने उसे अपने मंत्रियों और मित्रोंके साथ घोड़ोंका मूल्य करनेके लिये भेजा। उस राजकुमारने जान-बूझकर घोड़ोंका बहुत कम मूल्य लगाया। जब गोपीनाथने घोड़ोंके लगाये मूल्यको सुना तो उन्हें बहुत क्रोध आया॥ 22-23 ॥

अनुभाष्य- 'घाटाञा', - कम करके॥ 23 ॥

सेइ राजपुत्रेरे स्वभाव, —ग्रीवा फिराय। ऊर्ध्वमुखे बारबार इति-उति चाय॥ 24 ॥ तारे निन्दा करि' कहे सगर्व वचने। राजा कृपा करे तारे, भय नाहि माने॥ 25 ॥ 'आमार घोड़ा ग्रीवा उठाय ऊर्ध्वे नाहि चाय। ताते घोड़ार मूल्य घाटि करिते ना युयाय॥ '26 ॥

अनुवाद—उस राजकुमारका अपनी गर्दनको घुमाते हुए अपने मुखको ऊपर करके बारम्बार इधर-उधर देखनेका स्वभाव था। गोपीनाथ राजकुमारसे डरते नहीं थे, क्योंकि राजा उनके प्रति बहुत कृपालु थे, इसलिये गोपीनाथने उस राजकुमारपर व्यङ्ग करते हुए गर्वसे कहा, —'मेरे घोड़े अपनी गर्दनको घुमाते हैं, किन्तु वे ऊपरकी ओर नहीं देखते। इसलिये घोड़ोंका मूल्य घटाना उचित प्रतीत नहीं होता॥' 24-26 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य—जो राजकुमार घोड़ेके मूल्यको स्थिर कर रहा था, उसका गर्दनको ऊपर उठाकर ऊपर देखनेका स्वभाव था। उस विषयमें परिहास करनेके लिये गोपीनाथने कहा, -'यद्यपि मेरे घोड़े गर्दन तो उठाते हैं, किन्तु ऊपरकी ओर नहीं देखते; अतएव इनका मूल्य कम नहीं हो सकता।' परिहास करनेका तात्पर्य यह है, - 'तुम्हारी अपेक्षा मेरे घोड़ोंका मूल्य कम नहीं है॥' 26 ॥

शुनि' राजपुत्र-मने क्रोध उपजिल। राजार ठाञि याइ' बहु लागानि करिल॥ 27 ॥ 'कौड़ि नाहि दिबे एइ, बेड़ाय छद्म करि'। आज्ञा कर, -चाङ्गे चढ़ाना लइ कौड़ि॥' 28 ॥

अनुवाद—गोपीनाथके व्यङ्गको सुनकर राजकुमार बहुत क्रोधित हो गया। उसने राजाके पास जाकर गोपीनाथके प्रति झूठा दोषारोपण करते हुए कहा, - 'गोपीनाथ हमें देय धन नहीं देना चाहता, उसके पास धन है, किन्तु वह उसे छलसे इधर-उधर उड़ा रहा है। आप यदि मुझे आज्ञा दें तो मैं उसे चाङ्गपर चढ़ाकर देय धन निकलवा लूँ॥' 27-28 ॥

अनुभाष्य- 'लागानि', — मिथ्या दोषारोपण अथवा अभियोग॥ 27 ॥

राजा बले, - 'येइ भाल, कर सेइ याय। ये उपाये कौड़ि पाइ, कर से उपाय॥' 29 ॥

अनुवाद-राजाने कहा, - 'जो अच्छा हो, तुम जाकर वही करो। जिस उपायसे हमें उससे धनकी प्राप्ति हो, तुम वही उपाय करो॥' 29 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- 'याय', - जाकर॥ 29 ॥

राजपुत्र आसि' तारे चाङ्गे चढ़ाइल। खड्ग-उपरे फेलाइते तले खड्ग पातिल॥' 30 ॥

अनुवाद-राजकुमारने आकर गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उन्हें तलवारोंके ऊपर फेंकनेके लिये उसने मञ्चके नीचे तलवारें भी बिछवा दी हैं॥' 30 ॥

[ 9/31-40 नौवाँ अध्याय 255 महाप्रभुके द्वारा निरपेक्षताका प्रदर्शन और गोपीनाथका तिरस्कार :- शुनि' प्रभु कहे किछु करि' प्रणय-रोष। “राज-कौड़ि दिते नारे, राजार किबा दोष ?? 31 ॥ अनुवाद—सारा वृत्तान्त सुननेके बाद महाप्रभुने कुछ प्रणय-रोष करते हुए कहा, — “गोपीनाथ राजाका धन दे नहीं सकता तो इसमें राजाका क्या दोष है ? 31 ॥ अनुभाष्य—'दिते नारे', —दे नहीं सकता ॥ 31 ॥ राज-विलात् साधि' खाय, नाहि राज-भय। दारी-नाटुयारे दिया करे नाना व्यय ॥ 32 ॥ अनुवाद—गोपीनाथ लोगोंसे राजकर लेकर उसे स्वयं उपभोग करता है। राजाका कोई भय नहीं करके वह वेश्याओं और नर्तकियोंपर धनको लुटाता है ॥ 32 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'राज-विलात्', —बाहरसे राजाको प्राप्त होनेवाला कर (राजाका भण्डार अथवा सम्पत्ति); 'दारी-नाटुयारे', —वेश्या और नर्तकियोंपर। इन सब लोगोंको देकर धन व्यय करता है, राजाको भी पैसे देने पड़ेंगे,—इस प्रकारका भय नहीं करता ॥ 32 ॥ येइ चतुर, सेइ करे राजार विषय। राज-द्रव्य शोधि' पाय, ताहा करे व्यय ॥” 33 ॥ अनुवाद—जो चतुर है, उसे ही राजकर संग्रह आदि कार्य करने चाहिये। राजाके धनको उन्हें देनेके पश्चात् जो कुछ बचता है, उसे उसीको व्यय करना चाहिये ॥” 33 ॥ उस समय महाप्रभुको श्रीभवानन्दादिके सपरिवार बन्धनके समाचारकी प्राप्ति :- हेनकाले आर लोक आइल धाञा। “वाणीनाथादि सवंशे लञा गेल बान्धिया ॥” 34 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़कर आया और महाप्रभुसे कहने लगा,—'राजकर्मचारी वाणीनाथ आदिको भी परिवारसहित बाँधकर ले गये हैं ॥' 34 ॥ संन्यास धर्मके आदर्शरूपमें महाप्रभुके द्वारा सांसारिक बातोंमें उदासीनता या निरपेक्षताका प्रदर्शन :- प्रभु कहे,—“राजा आपने लेखार द्रव्य लइब। आमि—विरक्त संन्यासी, ताहे कि करिब ?? 35 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “राजाका जो अपना धन है, उसे वे अपने आप लेंगे। मैं तो विरक्त संन्यासी हूँ, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” 35 ॥ अनुभाष्य—'लेखार द्रव्य'—हिसाबका पैसा ॥ 35 ॥ श्रीस्वरूप-दामोदरादि भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको उदासीनता छोड़कर श्रीरामानन्दके स्वजनोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना :- तबे स्वरूपादि गोसाञिर भक्तगण। प्रभुर चरणे सबे कैला निवेदन ॥ 36 ॥ “रामानन्द-रायेर गोष्ठी, सब—तोमार 'दास'। तोमार उचित नहे करिते उदास ॥” 37 ॥ अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदि भक्तोंने महाप्रभुके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हुए कहा, — “रामानन्द रायका सम्पूर्ण परिवार ही आपका दास है, उनके प्रति उदासीन होना आपके लिये उचित नहीं है ॥” 36-37 ॥ महाप्रभुके द्वारा क्रोध और भर्त्सना :- शुनि' महाप्रभु कहे सक्रोध वचने। “मोरे आज्ञा देह' सबे, याङ राजस्थाने ! ! 38 ॥ तोमा सबार एइ मत, —राज-ठाञि याञा। कौड़ि मागि' लइ आँचल पातिया ॥ 39 ॥ संन्यासीकी विषयी बातोंमें अयोग्यता :- पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ब्राह्मण। मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष काहन ? ?' 40 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर

256 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/38-49 ] कहा, — “तुम सभी मुझे राज-दरबारमें जानेका आदेश दे रहे हो! तुम सभीका यही मत है कि मैं राजाके पास जाकर आँचल फैलाकर उससे कौड़ियोंके लिये याचना करूँ। वैसे भी संन्यासी ब्राह्मण तो केवल पाँच गण्डके ही योग्य होता है, तब फिर उसके माँगनेपर राजा दो लाख काहन क्यों देगा?” 38-40 ॥ अनुभाष्य— 'संन्यासी ब्राह्मण', — धनहीन विषय-त्यागी भिक्षावृत्तिके द्वारा जीवन धारण करनेवाला ॥ 40 ॥ 'गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिया ही जानेवाला है'— महाप्रभुको इस समाचारकी प्राप्ति :— हेनकाले आर लोक आइल धाञा। खड्गेर उपरे गोपीनाथे दितेछे डारिया ॥ 41 ॥ अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़ते हुए आया और उसने बतलाया कि राज-कर्मचारी गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर डालने ही वाले हैं ॥ 41 ॥ भक्तोंके द्वारा गोपीनाथकी रक्षाके लिये महाप्रभुसे प्रार्थना, तथापि लोकशिक्षाके लिये महाप्रभुकी कठोर निरपेक्षता :— शुनि' प्रभुर गण प्रभुरे करे अनुनय। प्रभु कहे, — “आमि भिक्षुक, आमा हैते किछु नय ॥ 42 ॥ उसके लिये श्रीजगन्नाथके चरणोंमें प्रार्थना करनेके लिये सभीको उपदेश :— तारे रक्षा करिते यदि हय सबार मने। सबे मेलि' याह जगन्नाथेर चरणे ॥ 43 ॥ श्रीजगन्नाथदेव—स्वयं ईश्वर और सभीके प्रभु :— ईश्वर जगन्नाथ, —याँर हाते सर्व 'अर्थ'। कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ ॥” 44 ॥ अनुवाद—यह समाचार सुनकर भक्तोंने पुनः महाप्रभुसे अनुनय-विनय किया, किन्तु महाप्रभुने कहा, — “मैं तो भिक्षुक हूँ, मेरे द्वारा कुछ भी नहीं होगा। यदि तुम सबके मनमें उसकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो तुम सभी मिलकर भगवान् जगन्नाथके चरणकमलोंमें प्रार्थना करो। जगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उन्हींके हाथोंमें सब कुछ करनेकी शक्ति है। वे कुछ करने, कुछ नहीं करने अथवा अन्य कुछ करनेमें समर्थ हैं॥” 42-44 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'कर्त्तुमकर्त्तुमन्यथा करिते समर्थ',—कुछ करने, कुछ नहीं करने या कुछ अन्य करनेमें उन्हींका सामर्थ्य है ॥ 44 ॥ प्रतापरुद्रसे हरिचन्दन-महापात्रके द्वारा गोपीनाथके प्राणोंकी भिक्षाकी याचना :— इँहा यदि महाप्रभु एतेक कहिला। हरिचन्दन-पात्र याइ' राजारे कहिला ॥ 45 ॥ हत्या अथवा प्राणदण्डकी विधिकी अनावश्यकता :— “गोपीनाथ-पट्टनायक—सेवक तोमार। सेवकेर प्राणदण्ड नहे व्यवहार ॥ 46 ॥ विशेष ताहार ठाञि कौड़ि बाकी हय। प्राण निले किबा लाभ? निज धनक्षय ॥ 47 ॥ यथार्थमूल्ये घोड़ा लह, येबा बाकी हय। क्रमे क्रमे दिबे अर्थ, प्राण केने लय ॥” 48 ॥ अनुवाद—यहाँ जब महाप्रभुने ऐसा कहा, तभी राजाके मन्त्री हरिचन्दन महापात्रने जाकर राजासे कहा,— “हे महाराज ! गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके सेवक हैं, सेवकको प्राणदण्ड देना उचित नहीं है। विशेष करके आपने तो उससे बहुत धन लेना है। गोपीनाथके प्राण लेनेसे आपको क्या लाभ होगा? अपितु अपने धनकी ही हानि होगी। आप वास्तविक मूल्यपर उसके घोड़े खरीद लीजिये और जो शेष धन रह जायेगा, उसे वह धीरे-धीरे चुका देगा। आप व्यर्थमें उसके प्राण क्यों लेते हैं?” 45-48 ॥ अनुभाष्य— 'व्यवहार',—विधिसङ्गत, उचित ॥ 46 ॥ गोपीनाथके प्राण-दण्डके सम्बन्धमें राजाके द्वारा अपनी सम्पूर्ण अनभिज्ञता बतलाना :— राजा कहे, — “एइ बात आमि नाहि जानि। प्राण केने लइब, तार द्रव्य चाहि आमि ॥ 49 ॥

[ 9/49-57 नौवाँ अध्याय 257 तत्क्षणात् गोपीनाथकी रक्षाके लिये आदेश देना :- तुमि याइ' कर ताँहा सर्व समाधान। द्रव्य यैछे आइसे, आर राख तार प्राण॥”50॥ अनुवाद—राजाने कहा,—“मैं गोपीनाथको प्राण-दण्ड देनेकी बातको तो जानता नहीं हूँ। उसके प्राण क्यों लें? मैं तो केवल उससे धन ही लेना चाहता हूँ। तुम स्वयं जाकर सब समाधान करो। ऐसा उपाय करो, जिससे हमारा धन भी मिल जाय और उसके प्राण भी बच जाँय॥”49-50॥ युवराजको कहकर गोपीनाथके प्राणोंकी रक्षा :- तबे हरिचन्दन आसि' जानारे कहिल। चाङ्गे हैते गोपीनाथे शीघ्र नामाइल॥51॥ अनुवाद—तब हरिचन्दनने आकर बड़-जानाको राजाकी इच्छासे अवगत कराया और उन्होंने शीघ्र ही गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गसे नीचे उतारा॥51॥ राजाके धनको लौटानेके उपायकी जिज्ञासा, गोपीनाथका उत्तर :- 'द्रव्य देह'—राजा मागे, उपाय पुछिल। “यथार्थ-मूल्ये घोड़ा लह”, तेंह त' कहिल॥52॥ “क्रमे क्रमे दिमु, आर यत किछु पारि। अविचारे प्राण लह,—कि बलिते पारि??”53॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“राजा तुमसे धन माँग रहे हैं, मुझे बताओ कि तुम्हारे पास उसके लिये क्या उपाय है?” श्रीगोपीनाथ पट्टनायकने कहा,—“आप लोग उचित मूल्य देकर मेरे घोड़े खरीद लो। मैं धीरे-धीरे करके जितना हो सकेगा, शेष धन भी लौटा दूँगा। किन्तु युवराज तो बिना कोई विचार किये मेरे प्राण लेना चाहता है, इसपर मैं क्या कह सकता हूँ?”52-53॥ यथार्थ मूल्य करि' घोड़ा-मूल्ये लइल। आर द्रव्येर मुद्दती करि' घरे पाठाइल॥54॥ अनुवाद—श्रीहरिचन्दनने उचित मूल्यपर श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके सब घोड़ोंको खरीद लिया और शेष राशिके लिये समय निश्चित करके उन्हें घर भेज दिया॥54॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'मुद्दती करि',—पैसे देनेके (मियाद) समयको स्वीकार करवाकर॥54॥ समाचार लानेवालेसे महाप्रभुके द्वारा वाणीनाथके विषयमें जिज्ञासा :- एथा प्रभु सेइ मनुष्येरे प्रश्न कैल। “वाणीनाथ कि करे, यबे बान्धिया आनिल??”55॥ अनुवाद—इधर महाप्रभुने संवाद लानेवाले व्यक्तिसे प्रश्न किया,—“जब राज-कर्मचारी वाणीनाथको बाँधकर ला रहे थे, तब वे क्या कर रहे थे?”55॥ वाणीनाथके द्वारा हाथपर संख्या-नाम-ग्रहण :- “वाणीनाथ निर्भयेते लय कृष्णनाम। 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' कहे अविश्राम॥56॥ संख्या लागि' दुइ-हाते अङ्गुलीते लेखा। सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे काटे रेखा॥”57॥ अनुवाद—संवाद लानेवालेने कहा,—“श्रीवाणीनाथ निर्भय होकर कृष्णनाम कर रहे थे, वे निरन्तर 'हरे कृष्ण, हरे कृष्ण' महामन्त्र ही कह रहे थे। श्रीवाणीनाथ संख्यापूर्वक नाम करनेके उद्देश्यसे अपने दोनों हाथोंकी अँगुलियोंपर गणना कर रहे थे। जब उनका एक हजार नाम करना पूर्ण हो जाता, तब वे अपने शरीरपर एक चिह्न बना लेते॥”56-57॥ अनुभाष्य—संख्या-ग्रहण करनेमें नियमकी रक्षा करते हुए “हरे कृष्ण”-महामन्त्र (सोलह नाम, बत्तीस अक्षर) कीर्तन करनेकी विधि—एकान्तिक नामाश्रित प्रत्येक साधकके लिये ही सुखमें-दुःखमें, सम्पदमें-विपत्तिमें— सभी अवस्थाओंमें सदा पालनीय है, ऐसा जाना जा रहा है॥56-57॥

258 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/58–68 ]

यह सुनकर महाप्रभुको आनन्द :— शुनि' महाप्रभु हइला परम आनन्द। के बुझिते पारे गौरेर कृपा–छद्मबन्ध ? ? 58 ॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुको परम आनन्द हुआ। श्रीगौरसुन्दरकी गुप्त रूपमें की गयी कृपाको भला कौन समझ सकता है ? 58 ॥ अनुभाष्य—'कृपा–छद्मबन्ध',—दैव–संघटनके छलसे अनुग्रह ॥ 58 ॥ काशीमिश्रका आगमन; उन्हें अपनी आलालनाथकी यात्राके विषयमें बतलाना :— हेनकाले काशीमिश्र आइला प्रभु–स्थाने। प्रभु ताँरे कहे किछु सोद्वेग–वचने ॥ 59 ॥ “इँहा रहिते नारि, यामु आलालनाथ। नाना उपद्रव इँहा, ना पाइ सोयाथ ॥ 60 ॥ श्रीभवानन्द–रायके वंशके व्यक्तियोंके विषयमें अभियोग :— भवानन्द–रायेर गोष्ठी करे राजविषय। नानाप्रकारे करे तारा राजद्रव्य–व्यय ॥ 61 ॥ राजार कि दोष ? राजा निज–द्रव्य चाय। दिते नारे द्रव्य, दण्ड आमारे जानाय ॥ 62 ॥ राजा गोपीनाथे यदि चाङ्गे चड़ाइल। चारिबारे लोके आसि' मोरे जानाइल ॥ 63 ॥ महाप्रभुकी सांसारिक बातोंमें अनिच्छा बतलाना :— भिक्षुक संन्यासी आमि निर्जनवासी। आमाय दुःख देय, निज दुःख कहिं आसिं ॥ 64 ॥ आजि तारे जगन्नाथ करिला रक्षण। कालि के राखिबे, यदि ना दिबे राजधन ? ? 65 ॥ विषयीर वार्त्ता शुनि' क्षोभ हय मन। ताते इँहा राहि' मोर नाहि प्रयोजन ॥” 66 ॥ अनुवाद—उसी समय श्रीकाशीमिश्र महाप्रभुके पास आये और उन्हें देखकर महाप्रभुने कुछ उद्वेगके साथ कहा,—“मैं यहाँ रह नहीं पाऊँगा, मैं आलालनाथ चला जाऊँगा। यहाँ जगन्नाथपुरीमें अनेक प्रकारके उपद्रव हैं, मुझे यहाँ शान्ति नहीं मिलती। भवानन्द रायके परिवारवाले राजकार्य करते हैं, परन्तु वे अनेक प्रकारसे राजाके धनका व्यय करते हैं। इसमें राजाका क्या दोष है? राजा तो राजकीय धन चाहता है। जब देय राजकीय धनको दे नहीं पानेपर राजा उन्हें दण्ड देता है, तब वे मुझे दण्ड और उससे रक्षाकी बात कहलवा भेजते हैं। जब राजाने गोपीनाथको चाङ्गपर चढ़ाया, तब चार बार लोगोंने आकर मुझे सूचना दी। मैं भिक्षा माँगकर जीविका निर्वाह करनेवाला संन्यासी हूँ। और मैं निर्जन स्थानमें एकान्त वास करता हूँ, किन्तु ये लोग आकर अपने दुःखके विषयमें बतलाकर मुझे दुःखी करते हैं। आज भगवान् श्रीजगन्नाथने गोपीनाथकी रक्षा की है। किन्तु यदि वह फिरसे राजधन नहीं देगा, तो कल कौन उसकी रक्षा करेगा? विषयी व्यक्तियोंकी बात सुननेसे मनमें क्षोभ होता है, इसलिये मेरा यहाँ रहनेका कोई प्रयोजन नहीं है॥” 59–66 ॥ काशीमिश्रका महाप्रभुको आश्वासन और उनकी स्तुति :— काशीमिश्र कहे प्रभुर धरिया चरणे। “तुमि केने एइ बाते क्षोभ कर मने ? ? 67 ॥ विष्णुप्रतिकी कामनाके अतिरिक्त अपनी जड़ेन्द्रियोंके तर्पणके लिये विष्णुसे फलकी कामना—मूर्खता और वाणिज्य मात्र :— संन्यासी विरक्त तोमार का–सने सम्बन्ध? व्यवहार लागि' तोमा भजे, सेइ ज्ञान–अन्ध ॥ 68 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणकमलोंको पकड़कर कहा,—“क्यों इन बातोंसे आपके मनमें क्षोभ हो रहा है? आप तो विरक्त संन्यासी हैं, आपका किसीके साथ क्या सम्बन्ध है? जो किसी व्यवहारिक वस्तुके लिये आपका भजन करता है, वह तो ज्ञानके विषयमें अन्धा अर्थात् अज्ञानी है॥ 67–68 ॥ अनुभाष्य—'व्यवहार',—जीविका अथवा प्राकृत भोग; विषयी लोग अपने-अपने विषय लाभके लिये फल–भोग

[ 9/68-74 नौवाँ अध्याय 259 कामनमयी चित्तवृत्तिसे विष्णु अथवा वैष्णवोंसे सहायताकी प्रार्थना करते हैं। सप्तशती-ग्रन्थमें देवीकी उपासनाके उद्देश्यसे वैसे भक्तिहीन चित्तसे युक्त लोगोंके लिये अनेक प्रकारकी व्यवहारिक कामसिद्धि ही फलके रूपमें कही गयी है। ये समस्त सकाम चेष्टाएँ- ज्ञानचक्षुरहित निर्बोध व्यक्तिका प्रयास मात्र है। विषयी लोग ईश्वरकी निर्मल उपासना करनेपर भी धर्म-अर्थ- काम-मोक्षरूपी अपने लौकिक-स्वार्थके द्वारा चलायमान होकर ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाली 'मुक्ति', स्वर्ग आदि भोग अथवा व्यवहारिक संघर्षसे छुटकारेकी आशा करके कृष्ण और कृष्णभक्तोंकी शुद्धसेवासे विमुख हो जाते हैं॥ 68 ॥ तोमार भजन-फले तोमाते 'प्रेमधन'। विषय लागि' तोमाय भजे, सेइ मूर्ख जन॥ 69 ॥ अनुवाद- केवल आपको सन्तुष्ट करनेके उद्देश्यसे आपके भजनके फलसे भक्तको आपका प्रेमधन प्राप्त होता है। किन्तु जो विषयोंको पानेकी लालसासे आपका भजन करता है, वह व्यक्ति मूर्ख है॥ 69 ॥ अनुभाष्य- आजकल स्त्री-पुत्रोंके पालन, अपने पेटको भरने, अपने स्त्री-पुत्रोंके वस्त्र-आभूषण आदिको संग्रह करनेके लिये मन्त्रका व्यवसाय करनेवाले और धार्मिक वेश लेकर जीवन पालन करनेवाले विषयी व्यक्तियोंने नामप्रचारके द्वारा लोगोंको छलनेका आश्रय किया है। वे श्रीवृन्दावन और नवद्वीपमें वास, ग्रन्थोंके विक्रयके द्वारा अपने भोजन और वस्त्र तथा स्त्री-पुत्रोंका पालन, शास्त्र-पाठको व्यवसाय बनाकर लोकरञ्जनके लिये प्रवचन, श्रीविग्रह-सेवा, दीक्षादान, भिक्षाकरण, आत्मीय लोगोंके रोगको दूर करना, वैरागी-वेश धारण, दरिद्रपूजा, सामाजिक उन्नति साधन आदि अनेक प्रकारके छल-कार्योंका विस्तार करके भक्तितत्त्वज्ञान-हीन मूर्ख लोगोंको ठगकर धनादिके अर्जनके द्वारा विषयोंका ही भजन कर रहे हैं। किन्तु आपके शुद्ध अहैतुक छलरहित भजनके फलसे ही आपके प्रति ब्रह्मादिके लिये भी दुर्लभ प्रेमधनकी प्राप्ति होती है-वे इसे समझ नहीं पाते॥ 69 ॥ महाप्रभुकी प्रीतिकी कामना करनेवाले निष्किञ्चन शुद्धभक्तगण :- तोमा लागि' रामानन्द राज्य त्याग कैला। तोमा लागि' सनातन 'विषय' छाड़िला॥ 70 ॥ अनुवाद- आपकी प्रसन्नताके लिये श्रीरामानन्द रायने राजकार्यका त्याग किया है और आपके लिये ही श्रीसनातनने समस्त विषयोंको [प्रधानमन्त्री पद आदिको] छोड़ दिया है॥ 70 ॥ तोमा लागि' रघुनाथ सकल छाड़िल। हेथाय ताहार पिता विषय पाठाइल॥ 71 ॥ तोमार चरण-कृपा हञाछे ताहारे। छत्रे मागि' खाय, 'विषय' स्पर्श नाहि करे॥ 72 ॥ अनुवाद- आपके लिये ही श्रीरघुनाथने घर-परिवार- धनादि सब कुछ छोड़ दिया। उनके पिताने उनके लिये धन-सेवकादिको भेजा, किन्तु उनपर आपके चरणकमलोंकी कृपा होनेके कारण वे उस धनको स्पर्श तक भी नहीं करते। अपितु वे छत्रमें माँगकर खाते हैं॥ 71-72 ॥ श्रीरामानन्दके अनुज गोपीनाथ सकाम व्यापारी नहीं :- रामानन्देर भाइ गोपीनाथ-महाशय। तोमा हैते विषय-वाञ्छा, तार इच्छा नय॥ 73 ॥ अनुवाद- श्रीरामानन्द रायका भाई श्रीगोपीनाथ सज्जन व्यक्ति है। उसकी आपसे किसी प्रकारके विषयको पानेकी इच्छा नहीं है॥ 73 ॥ महाप्रभुके एकान्त शरणागत गोपीनाथको प्राण-दण्ड दिये जानेके प्रयत्नको देखकर उनके हितैषी लोगोंके द्वारा महाप्रभुकी कृपाकी याचना :- तार दुःख देखि' तार सेवकादिगण। तोमारे जानाइल, -याते 'अनन्यशरण' ॥ 74 ॥ अनुवाद- गोपीनाथके दुःखको देखकर उसके कहे

260 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/74-83 ] बिना उसके सेवकोंने स्वयं ही आकर आपको सूचित किया, क्योंकि गोपीनाथ आपके एकान्त शरणागत है॥ 74 ॥ शुद्धभक्तोंकी परिभाषा :- सेइ 'शुद्धभक्त', ये तोमा भजे तोमा लागि'। आपनार सुख-दुःखे हय भोग-भागी ॥ 75 ॥ अनुवाद-वही शुद्धभक्त है जो अनुकूल भावसे आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी सेवा करता है। अपने सुख-दुःखको वह अपने ही द्वारा किये गये कर्मोंका फल मानकर उन भोगोंको भोगता है ॥ 75 ॥ शुद्धभक्तोंका आचार-व्यवहार :- तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे अनुक्षण। अचिरात् मिले ताँरे तोमार चरण ॥ 76 ॥ अनुवाद-शुद्धभक्त आपकी कृपाको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, इसलिये उन्हें अतिशीघ्र ही आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 76 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/8) में- तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ 77 ॥ अनुवाद-जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिके उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्' अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/261 संख्या देखें ॥ 77 ॥ काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें रहनेके लिये ही प्रार्थना :- तुमि बसि' रह, केने याबे आलालनाथ? केह तोमा ना शुनाबे विषयीर बात् ॥ 78 ॥ अनुवाद-कृपया आप यहीं श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही वास कीजिये, आप आलालनाथ क्यों जायेंगे? आपको कोई भी विषयी व्यक्तिकी बात नहीं सुनायेगा ॥ 78 ॥ महाप्रभुकी कृपासे ही भविष्यकालमें गोपीनाथके द्वारा अपनी रक्षाकी निश्चयता :- यदि तोमार तारे राखिते हय मन। आजि ये राखिल, सेइ करिबे रक्षण ॥ ”79 ॥ अनुवाद-यदि आपकी गोपीनाथकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो आज जिन्होंने [भगवान् श्रीजगन्नाथने] उसकी रक्षा की है, वे आगे भी उसकी रक्षा करेंगे ॥ ”79 ॥ प्रतापरुद्रका अपने गुरु श्रीमिश्रके घरमें आगमन :- एत बलि' काशीमिश्र गेला स्व-मन्दिरे। मध्याह्ने प्रतापरुद्र आइला ताँर घरे ॥ 80 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीकाशीमिश्र अपने मन्दिरमें चले गये। मध्याह्नके समय राजा प्रतापरुद्र उनके घरपर आये ॥ 80 ॥ राजाका गुरुसेवाका नियम :- प्रतापरुद्रेर एक आछये नियमे। यत दिन रहे तँह श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 81 ॥ नित्य आसि' करे मिश्रेर पाद-सम्वाहन। जगन्नाथ-सेवार करे भियान श्रवण ॥ 82 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रका एक नियम था कि जब तक वे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें रहते, तब तक वे प्रतिदिन श्रीकाशीमिश्रके वासस्थानपर आकर उनके चरणोंको दबाते थे और भगवान् श्रीजगन्नाथकी किस प्रकारसे भव्य सेवा होती है, इस विषयमें उनसे श्रवण करते थे ॥ 81-82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भियान',-परिपाटी अभिनय ॥ 82 ॥ राजा मिश्रेर चरण यबे चापिते लागिला। तबे मिश्र ताँरे किछु भङ्गीते कहिला ॥ 83 ॥

[ 9/83-94 नौवाँ अध्याय 261 श्रीमिश्रके द्वारा राजाको महाप्रभुके पुरी-त्यागका समाचार देना :- “देव, शुन, आर एक अपरूप बात़्! महाप्रभु क्षेत्र छाड़ि' याबेन आलालनाथ !!” 84 ॥ अनुवाद—जब राजा श्रीकाशीमिश्रके चरणोंकी सेवा करने लगे, तब श्रीकाशीमिश्रने कुछ सङ्केतके द्वारा उनसे कहा,—“हे राजन्! आप एक अद्भुत बात श्रवण कीजिये ! महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीको छोड़कर आलालनाथ चले जायेंगे !” 83-84 ॥ राजाका दुःख और उसके कारणकी जिज्ञासा, उत्तरमें श्रीमिश्रके द्वारा गोपीनाथके वृत्तान्तका वर्णन :- शुनि' राजा दुःखी हैला, पुछिलेन कारण। तबे मिश्र कहे ताँरे सब विवरण ॥ 85 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायके चाङ्गे चढ़ाइला। तार सेवक आसि' प्रभुरे कहिला ॥ 86 ॥ राज-सम्पत्तिका अपहरण करनेवाले गोपीनाथका धर्मविग्रह और धर्मरक्षक महाप्रभुके द्वारा तीव्र तिरस्कार; लौकिक, राजनैतिक और अर्थनैतिक अथवा शुक्लवित्तको अर्जित करनेकी विधिका वर्णन :- शुनिया क्षोभित हैल महाप्रभुर मन। क्रोधे गोपीनाथे कैला बहुत भर्त्सन ॥ 87 ॥ 'अजितेन्द्रिय हञा करे राजविषय। नाना असत्पथे करे राजद्रव्य व्यय ॥ 88 ॥ ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय राजधन। ताहा हरि' भोग करे महापापी जन ॥ 89 ॥ राजार वर्त्तन खाय, आर चुरि करे। राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर विचारे ॥ 90 ॥ निज-कौड़ि मागे, राजा नाहि करे दण्ड। राजा-महाधार्मिक, एइ हय पापी भण्ड ! !91 ॥ राज-कड़ि ना देय, आमारे फुकारे। एइ महादुःख इँहा के सहिते पारे ? ?92 ॥ निर्जनवासकी इच्छा अर्थात् जहाँ विषयकी बातें हों, ऐसे स्थानरूपी दुःसङ्गका त्याग :- आलालनाथ याइ' ताँहा निश्चिन्ते रहिमु। विषयीर भाल मन्द वार्त्ता ना शुनिमु ॥” 93 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत दुःखी हुए और उन्होंने श्रीकाशीमिश्रसे इसका कारण पूछा। तब श्रीकाशीमिश्रने महाराज प्रतापरुद्रको समस्त विवरण बतलाया,—“जब गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाया गया, तब उसके सेवकोंने आकर महाप्रभुको यह सूचना दी। इसे सुनकर महाप्रभुका मन बहुत दुःखी हुआ और उन्होंने क्रोधित होकर गोपीनाथकी बहुत भर्त्सना करते हुए कहा,—'गोपीनाथ अजितेन्द्रिय होनेपर भी राजसम्पत्तिका रक्षक बनता है और अनेक असत् कार्योंमें राजधनका व्यय करता है। राजधन ब्राह्मणके धनसे भी अधिक पूजनीय है। महापापी लोग ही राजधनका हरण करके उसका भोग करते हैं। जो जीवन निर्वाह करनेके लिये राजासे वेतन लेकर भी राजधनकी चोरी करता है, शास्त्रोंके विचारके अनुसार ऐसा व्यक्ति राजदण्डके योग्य होता है। राजा केवल अपना धन ही तो चाहता है, वह कोई दण्ड नहीं देना चाहता! इसलिये राजा अवश्य ही महाधार्मिक है, किन्तु यह गोपीनाथ धोखा देनेवाला पापी है !! गोपीनाथ स्वयं ही राजधन नहीं दे रहा और वह मुझसे सहायताके लिये उच्च स्वरसे रो रहा है। यह तो महापापकी बात है, इसे कौन सहन कर सकता है? मैं तो आलालनाथ जाकर वहाँ निश्चिन्त होकर रहूँगा और विषयी लोगोंकी अच्छी-बुरी किसी भी बातको नहीं सुनूँगा ॥” 85-93 ॥ अनुभाष्य—'फुकारे',—उच्च स्वरसे रोदन करता है ॥ 92 ॥ महाप्रभु पुरीमें ही रहें इसके लिये राजाका सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- एत शुनि' कहे राजा पाञा मने व्यथा। “सब द्रव्य छाड़ौं, यदि प्रभु रहेन एथा ॥ 94 ॥

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262 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/94-104 ] क्षणकाल महाप्रभुका दर्शन भी परम लोभनीय :- एकक्षण प्रभुर यदि पाइये दरशन। कोटिचिन्तामणि-लाभ नहे तार सम ॥ 95 ॥ कोन् छार पदार्थ एइ दुइलक्ष काहन ? प्राण-राज्य करों प्रभुsingleपदे निर्मञ्छन ॥" 96 ॥ अनुवाद-यह सब विवरण सुनकर राजा मनमें बहुत दुःखी हुए और कहने लगे,-"यदि महाप्रभु यहीं रहें तो मैं गोपीनाथसे प्राप्य अपना सम्पूर्ण धन छोड़ दूँगा। यदि मुझे एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके दर्शन प्राप्त हों तो करोड़ों चिन्तामणियोंका लाभ भी उसके समान नहीं है। तब फिर दो लाख काहन जैसी तुच्छ राशिका तो कहना क्या? मैं महाप्रभुके चरणकमलोंमें अपने प्राण और राज्य दोनों ही न्यौछावर कर दूँगा ॥" 94-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निर्मञ्छन', - (आरती अथवा पूजाके समय) अर्घ्य प्रदान, विशेष अर्पण ॥ 96 ॥ भक्तके दुःखसे महाप्रभुका दुःख :- मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, -नहे प्रभुर मन। तारा दुःख पाय, -एइ ना याय सहन ॥ "97 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,- "महाप्रभु नहीं चाहते कि आप राजधन छोड़ दें। उनसे यह सहन नहीं हो रहा कि गोपीनाथ पट्टनायकादि दुःखी हो रहे हैं ॥ "97 ॥ राजाके द्वारा गोपीनाथको दण्ड देनेके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- राजा कहे, - "तारे आमि दुःख नाहि दिये। चाङ्गे चड़ा, खड्गे डारा, आमि ना जानिये ॥ 98 ॥ पुरुषोत्तम-जानारे तँह कैल परिहास। सेइ 'जाना' तारे देखाइल मिथ्या त्रास ॥ 99 ॥ श्रीमिश्रको महाप्रभुको सन्तुष्ट करनेके लिये और श्रीभवानन्दके वंशके व्यक्तियोंके प्रति अपनी स्वाभाविक प्रीतिके विषयमें बतलानेके लिये राजाका अनुरोध :- तुमि याह, प्रभुरे राखह यत्न करि'। एइ मुइ ताहारे छाड़िनु सब कौड़ि ॥" 100 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"मैंने गोपीनाथ पट्टनायकको दुःख नहीं दिया। उसे चाङ्गपर चढ़ाने तथा तलवारोंपर गिरानेके विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता था। उसने युवराज पुरुषोत्तम जानाके साथ परिहास किया था, इसलिये युवराजने गोपीनाथको केवल डरानेके लिये ऐसा मिथ्या नाटक किया था। आप जाकर महाप्रभुको यहाँ रोकनेके लिये प्रयास कीजिये। मैं गोपीनाथके द्वारा देय समस्त राशिको छोड़ रहा हूँ॥ "98-100 ॥ मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, नहे प्रभुर मने। कौड़ि छाड़िले प्रभु कदाचित् सुख माने ॥ "101 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,-"महाप्रभु नहीं चाहते कि आप प्राप्य राजधन छोड़ दें। धन छोड़नेपर महाप्रभुको कोई सुख नहीं होगा ॥ "101 ॥ राजा कहे, - "कौड़ि छाड़िमु, -इहा ना कहिबा। सहजे मोर प्रिय तांरा, -इहा जानाइबा ॥ 102 ॥ भवानन्द-राय-आमार पूज्य-गर्वित। ताँर पुत्रगणे आमार सहजेइ प्रीत ॥" 103 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"आप महाप्रभुसे ऐसा मत कहना कि मैंने धन छोड़ दिया है। आप उन्हें यह कहना कि भवानन्द राय और उनका परिवार तो स्वभावतः मेरे प्रिय हैं। श्रीभवानन्द राय मेरे पूज्य तथा गौरवके पात्र हैं, इसलिये उनके पुत्रोंके प्रति मेरी प्रीति होना स्वाभाविक ही है ॥ "102-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पूज्य-गर्वित',-पूज्य और सम्मानके पात्र ॥ 103 ॥ गोपीनाथको युवराजके अनुग्रहका प्रदर्शन और विदायी प्रदान :- एत बलि' मिश्रे नमस्करि' घरे गेला। गोपीनाथे 'बड़ जाना' डाकिया आनिला ॥ 104 ॥

[ 9/104-114 नौवाँ अध्याय 263 अनुवाद—यह कहकर राजा श्रीप्रतापरुद्र श्रीकाशीमिश्रको प्रणाम करके अपने राजभवनमें लौट गये और युवराज और श्रीगोपीनाथको बुलवाया॥104॥ राजा कहे,—“सब कौड़ि तोमारे छाड़िलुँ। सेइ मालजाठ्या-पाट तोमारे त' दिलुँ॥105॥ आर बार ऐछे ना खाइह राजधन। आजि हैते दिलुँ तोमाय द्विगुण वर्त्तन॥”106॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“मैं तुम्हारे समस्त देय धनको छोड़ रहा हूँ और पुनः तुम्हें मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानका अधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ। अब आगेसे तुम इस प्रकार राजधनको खा मत जाना। आजसे मैं तुम्हें दोगुणा वेतन प्रदान करूँगा॥” 105-106॥ एत बलि' नेतधटी तारे पराइल। “प्रभु-आज्ञा लञा याह, विदाय तोमा दिल॥” 107॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने यह कहकर श्रीगोपीनाथको पुनः अधिकारी नियुक्त करनेके उपलक्ष्यमें रेशमी वस्त्र पहनाया और कहा,—“अब तुम अपना कार्य प्रारम्भ करनेसे पहले महाप्रभुकी आज्ञा लेकर जाओ। मैं तुम्हें विदायी देता हूँ, तुम जा सकते हो॥” 107॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नेतधटी',—रेशमी वस्त्र॥107॥ गोपीनाथके दण्डके वर्णनके प्रसङ्गमें महाप्रभुकी कृपाके फलसे व्यवहारिक और पारमार्थिक उन्नति अथवा श्रेयके वैशिष्ट्यका वर्णन :— परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह रहु दूरे। अनन्त ताहार फल, के बलिते पारे ?? 108॥ अनुवाद—परमार्थ पथपर महाप्रभुकी कृपाकी बात तो दूर रहे, उस कृपाके अनन्त फल हैं, इसे कौन बतला सकता है? 108॥ 'राज्य-विषय' फल एइ-कृपार 'आभासे'। ताहार गणना कारों, मने नाहि आइसे!! 109॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथको 'राज-अधिकारी पदकी प्राप्ति' रूपी फल तो महाप्रभुकी कृपाके आभाससे ही प्राप्त हो गया! महाप्रभुकी पूर्ण कृपाके फलकी गणना कौन कर सकता है! 109॥ काँहा चाङ्गे चड़ाञा लय धन-प्राण! काँहा सब छाड़ि' सेइ राज्यादि-प्रदान!! 110॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाकर उनके प्राण और समस्त धन लेनेकी बात! और कहाँ उनके सम्पूर्ण ऋणको क्षमा करके उन्हें पुनः राज्य-अधिकारीका पद आदि प्रदान करना! 110॥ काँहा सर्वस्व बेचि' लय, देया ना याय कौड़ि! काँहा द्विगुण वर्त्तन, पराय नेतधड़ि!! 111॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथका सबकुछ बेचकर भी राजधन सम्पूर्ण रूपसे चुक नहीं रहा था, और कहाँ अब स्वयं राजाके द्वारा दो गुणा वेतन और उन्हींके हाथोंसे रेशमी वस्त्रकी प्राप्तिरूपी सम्मान! 111॥ प्रभुर इच्छा नाहि, तारे कौड़ि छोड़ाइबे। द्विगुण वर्त्तन करि' पुनः 'विषय' दिबे॥112॥ तथापि तार सेवक आसि' कैल निवेदन। ताते क्षुब्ध हैल यबे महाप्रभुर मन॥113॥ विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि मनोबल। निवेदन-प्रभावहे तबु फले एत फल॥114॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इच्छा नहीं थी कि राजा श्रीगोपीनाथका ऋण क्षमा कर दें, उनका वेतन दोगुणा कर दें और उन्हें पुनः उसी स्थानका राजस्व अधिकारी बना दें। तथापि जब श्रीगोपीनाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया, तो उनकी स्थिति जानकर जब महाप्रभुका मन दुःखी हुआ, तब भी महाप्रभुकी उन्हें विषयरूपी सुखोंको प्रदान करनेकी इच्छा नहीं थी। किन्तु उनसे निवेदन करनेके प्रभावके फलस्वरूप ही

264 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/112-122 ] श्रीगोपीनाथको इतने अधिक फलकी प्राप्ति हो गयी॥ 112-114॥ महाप्रभुका अद्भुत ऐश्वर्यमय स्वभाव :- के कहिते पारे गौरेर आश्चर्य स्वभाव ? ब्रह्मा-शिव आदि याँर ना पाय अन्तर्भाव ॥ 115 ॥ अनुवाद-श्रीगौरसुन्दरके आश्चर्यमय स्वभावका कौन अनुमान लगा सकता है? जिसका मर्म तो ब्रह्मा-शिव आदि भी नहीं जान पाते ॥ 115 ॥ महाप्रभु और श्रीकाशीमिश्रका गोपीनाथके प्रति राज्यव्यवहारके विषयमें वार्तालाप :- एथा काशीमिश्र आसि' प्रभुर चरणे। राजार चरित्र सब कैला निवेदने ॥ 116 ॥ अनुवाद-इधर श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित होकर राजाकी समस्त इच्छाके विषयमें बतलाया॥ 116 ॥ प्रभु कहे,—“काशीमिश्र, कि तुमि करिला? राज-प्रतिग्रह तुमि आमा' कराइला??” 117 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे काशीमिश्र ! यह आपने क्या किया? आपने परोक्षरूपसे मुझे राजासे दान ग्रहण करवा दिया?” 117 ॥ अनुभाष्य-श्रीकाशीमिश्रकी यह बात सुनकर कि राजाने गोपीनाथसे प्राप्य अर्थको महाप्रभुके लिये छोड़ दिया है, तो महाप्रभुके विचारमें यह उनके द्वारा राजासे धनरूपी दान ग्रहण करना प्रमाणित हुआ॥ 117 ॥ मिश्र कहे, - “शुन, प्रभु, राजार वचने। अकपटे राजा एइ कैला निवेदने ॥ 118 ॥ 'प्रभु येन नाहि जानेन, - राजा आमार लागिया। दुइलक्ष काहन कौड़ि दिलेक छाड़िया ॥ 119 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा, - “हे महाप्रभु ! आप महाराज प्रतापरुद्रके वचन सुनिये। राजाने निष्कपट होकर यह निवेदन किया है, - 'महाप्रभुको इस प्रकारसे बतलाना कि वे कभी भी ना सोचें कि मैंने उनके कारण दो लाख काहन राशि छोड़ दी है ॥ 118-119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैंने महाप्रभुके लिये धन छोड़ दिया है, वे ऐसा न समझें, उन्हें इस प्रकारसे कहना ॥ 119 ॥ भवानन्देर पुत्र सब - मोर प्रियतम। इँहा-सबाकारे आमि देखि आत्मसम ॥ 120 ॥ अतएव याँहा ताँहा देइ अधिकार। खाय, पिये, लुटे, बिलाय, ना करौं विचार ॥ 121 ॥ पहले प्रतापरुद्रके अनुग्रहसे राजमहेन्द्रीके भूमि-अधिकारीके रूपमें श्रीराम-रायको लगाना :- राजमहीन्द्रे 'राजा' कैनु राम-राय। ये खाइल, येबा दिल, नाहि लेखा-दाय ॥ 122 ॥ अनुवाद-वास्तवमें श्रीभवानन्द रायके सभी पुत्र मुझे विशेष प्रिय हैं, मैं उन सभीको अपने परिवारके समान ही मानता हूँ। इसलिये मैंने उन्हें अपने राज्यमें इधर-उधर सर्वत्र राजस्व एकत्रित करनेका अधिकार दिया हुआ है। वे उस राजस्वको खायें, पियें, लूटें या बाँटें-मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। मैंने रामानन्द रायको राजमहेन्द्रीका राज्याधिकारी बनाया, उसने राजस्वमें-से जो अपने पास रखा, जो राजकोषमें दिया, मैंने उसका कोई लेखा-जोखा नहीं किया ॥ 120-122 ॥ अनुभाष्य-वर्तमान राजमहेन्द्री-नगर-गोदावरीके उत्तरी-तटपर अवस्थित है। रामानन्दरायके समयकी राजधानी 'विद्यानगर'- गोदावरीके दक्षिण-तटपर थी। विद्यानगर अथवा विद्यापुर गोदावरी नदीके सागर-सङ्गममें अर्थात् कोटदेशमें था। वह प्रदेश उस समय राजमहेन्द्रीके नामसे प्रसिद्ध था। कलिङ्ग देशका उत्तर-अंश ही उत्कलिङ्ग अथवा उत्कल-देश था। उत्कलिङ्ग-राज्यके दक्षिण-प्रदेशकी राजधानी ही 'राजमहेन्द्री' थी। वर्तमान

[ 9/122-132 नौवाँ अध्याय 265 समयमें 'राजमहेन्द्री'-नगरका स्थान-परिवर्तन हो गया है॥ 122 ॥ गोपीनाथ एइमत 'विषय' करिया। दुइचारि-लक्ष काहन रहे त' खाञा॥ 123 ॥ किछु देय, किछु ना देय, ना करि विचार। 'जाना'-सहित अप्रीत्ये दुःख पाइल एइबार ॥ 124 ॥ 'जाना' एत कैला, - इहा मुइ नाहि जानौं। भवानन्देर पुत्र-सबे आत्मसम मानौं ॥ 125 ॥ ताँहा लागि' द्रव्य छाड़ि, - इहा मात् माने। सहजेइ मोर प्रीति हय ताहा-सने ॥" 126 ॥ अनुवाद - गोपीनाथने भी इसी प्रकार राजस्व संग्रह करके उसमें-से दो-चार लाख काहन राशि ही तो अपने पास रखी है। वे राजकोषमें कुछ देता है अथवा कुछ नहीं देता है, मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। युवराज जानासे परिहास करके उसे रुष्ट करनेके कारण ही उसने इस बार दुःख पाया है। युवराजने इतना सब किया, मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं थी। मैं तो श्रीभवानन्द रायके समस्त पुत्रोंको अपने परिवारका सदस्य ही मानता हूँ। आप महाप्रभुसे कहना कि वे यह नहीं मानें कि मैंने उनके कारण गोपीनाथके ऋणको क्षमा कर दिया है, मैंने जो कुछ भी किया है वह श्रीभवानन्द रायके परिवारके प्रति मेरी स्वाभाविक प्रीतिके कारण ही है।'॥" 123-126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'मात्', - (हिन्दीका शब्द) मत अर्थात् नहीं ॥ 126 ॥ राजाके दैन्यके विषयमें सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता, सपुत्र श्रीराय-भवानन्दका आगमन, दीनतासहित महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यके विषयमें बतलाना :- शुनिया राजार विनय प्रभुर आनन्द। हेनकाले आइला तथा राय-भवानन्द ॥ 127 ॥ पञ्चपुत्र-सहिते आसि' पड़िला चरणे। उठाञा प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने ॥ 128 ॥ अनुवाद - श्रीकाशीमिश्रके मुखसे राजा प्रतापरुद्रके विनीत वचनोंको सुनकर महाप्रभु आनन्दित हुए। उसी समय वहाँपर श्रीभवानन्द राय आये। वे अपने पाँचों पुत्रों सहित आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े, महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 127-128 ॥ रामानन्द-राय आदि सबाइ मिलिला। भवानन्द-राय तबे बलिते लागिला ॥ 129 ॥ सपरिवार श्रीभवानन्दकी महाप्रभुके चरणोंमें अपने आपको बेच देनेवाली उक्ति :- “तोमार किङ्कर एइ सब मोर कुल। ए विपदे राखि' प्रभु, पुनः निला मूल ॥ 130 ॥ पाँच-पाण्डवोंके विपत्तिसे उद्धारकी उपमा देकर महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन :- भक्तवात्सल्य एबे प्रकट करिला। पूर्वे येन पञ्चपाण्डवे विपदे तारिला ॥" 131 ॥ अनुवाद - श्रीरामानन्दराय आदि सभी भाई महाप्रभुसे मिले। तब श्रीभवानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “मेरा यह पूरा परिवार ही आपका दास है। ऐसी विपत्तिमें आपने हमारी रक्षा करके हमें पुनः मूल्य देकर खरीद लिया है। आपने अब वैसा ही भक्त-वात्सल्य प्रकटित किया है, जैसे आपने पूर्वकालमें पाँचों पाण्डवोंका विपत्तिसे उद्धार करके प्रकटित किया था ॥" 129-131 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'निला मूल', - पुनः मूल्य देकर खरीद लिया ॥ 130 ॥ गोपीनाथके उद्धार-हेतु कृतज्ञता जतलाना, महाप्रभुकी महिमाका गान :- 'नेतधटी'-माथे गोपीनाथ चरणे पड़िला। राजार कृपा-वृत्तान्त सकल कहिला ॥ 132 ॥

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266 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/132-140 ] “बाकी कौड़ि बाद, आर द्विगुण वर्त्तन कैला। पुनः ‘विषय’ दिया ‘नेतधटी’ पराइला ॥ 133 ॥ काँहा चाङ्गेर उपर सेइ मरण-प्रमाद ! काँहा ‘नेतधटी’ पुनः,—ए सब प्रसाद ! ! 134 ॥ अनुवाद—रेशमी वस्त्रको सिरपर धारण किये गोपीनाथ पट्टनायक भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने महाप्रभुको स्वयं पर राजा प्रतापरुद्रके द्वारा की गयी कृपाके वृत्तान्तको सम्पूर्ण रूपसे कह सुनाया,—“राजाने मुझे देय राजधनसे मुक्त कर दिया है और उन्होंने मेरा वेतन भी दो गुणा कर दिया है। उन्होंने मुझे पुनः मालजाठ्या दण्डपाटका दायित्व प्रदान करके मुझे अपने हाथोंसे रेशमी वस्त्र ओढ़ाया। कहाँ तो चाङ्गेके ऊपर मरनेका भय ! और कहाँ रेशमी वस्त्रके द्वारा सम्मान, यह सब आपकी कृपा है ! 132-134 ॥ चाङ्गेर उपरे तोमार चरण ध्यान कैलुँ। चरण-स्मरण-प्रभावे एइ फल पाइलुँ ॥ 135 ॥ लोके चमत्कार मोर ए सब देखिया। प्रशंसे तोमार कृपा-महिमा गाञा ॥ 136 ॥ श्रीगौर-स्मरणका मुख्य फल-श्रीगौरप्रीति, गौणफल-विषय-सुख :- किन्तु तोमार स्मरणेर नहे एइ ‘मुख्यफल’। ‘फलाभास’ एइ, —याते ‘विषय’ चञ्चल ॥ 137 ॥ अनुवाद—मैंने चाङ्गेके ऊपर आपके चरणकमलोंका ध्यान किया था और मुझे आपके चरणकमलोंके स्मरणके प्रभावसे ही यह फल प्राप्त हुआ है। मेरे साथ जो कुछ हुआ उसे देखकर लोग चमत्कृत हो गये हैं और वे आपकी कृपा-महिमाको गाकर आपकी प्रशंसा कर रहे हैं। किन्तु यह आपके स्मरणका मुख्य फल नहीं है, यह तो आपके स्मरणके फलका आभासमात्र है, क्योंकि भौतिक वैभव तो अनित्य है ॥ 135-137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके चरणकमलोंको स्मरण करनेका मुख्य फल—आपके प्रति प्रीति उत्पन्न होना है। जीवन, मान और धनकी रक्षा—उस सत्कर्मका (आपके चरणकमलोंकी सेवाका) फलाभास-मात्र है; क्योंकि जड़ीय विषय—स्वयं ही चञ्चल हैं, इसलिये उनसे सम्बन्धित फल ‘मुख्य’ नहीं है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके स्मरणसे सर्वसिद्धि हो सकती है। त्रिवर्ग—धर्म-अर्थ-काम और अपवर्ग-मोक्षादि गौण फल ही चञ्चल विषयोंकी उग्र कामनासे युक्त व्यक्तियोंके प्राप्य ‘फलाभास’ हैं, वे—परिपूर्ण नित्यसिद्ध फल कृष्णप्रेमकी प्राप्तिकी तुलनामें अत्यन्त तुच्छ और अल्प लाभमात्र ही हैं ॥ 137 ॥ श्रीगौरकृपाके फलसे श्रीरामानन्द और श्रीवाणीनाथकी निष्किञ्चनता :- राम-राये, वाणीनाथे कैला ‘निर्विषय’। सेइ कृपा आमाते नाहि, याते ऐछे हय ! ! 138 ॥ विषयकी वृद्धिके दर्शनसे महाप्रभुकी सेवाके सौभाग्यके अभावकी आशङ्कासे महाप्रभुके चरणोंमें गोपीनाथके द्वारा अप्राकृत-कृपा और विषयभोग-बुद्धिसे मुक्तिकी प्रार्थना :- शुद्ध कृपा कर, गोसाञि, घुचाह ‘विषय’। निर्विण्ण हइनु, मोते ‘विषय’ ना हय ॥” 139 ॥ अनुवाद—आपकी वास्तविक कृपा रामानन्द राय और वाणीनाथपर हुई है, क्योंकि आपने उन्हें राजकार्यसे मुक्त करा दिया है। किन्तु आपकी वैसी कृपा मुझपर नहीं हुई है जो मुझे भी विषयोंसे मुक्त करवा दे ! हे श्रीचैतन्य गोसांई ! आप मुझपर अपनी शुद्ध कृपा करके मेरे विषयोंको भी छुड़ाइए। वैराग्यके कारण अब मुझे विषय भोगोंकी इच्छा नहीं है ॥” 138-139 ॥ बाह्य संन्यास-वेशके प्रति महाप्रभुका अनादर, गोपीनाथको गृहस्थ आश्रमका अधिकारी जानकर उसीमें रहकर ही हरिभजन करनेका आदेश :- प्रभु कहे, —“संन्यासी यबे हइबा पञ्चजन। कुटुम्ब-बाहुल्य तोमार के करे भरण ? ? 140 ॥

[ 9/140-146 नौवाँ अध्याय 267 सिद्ध गौरदासोंको गृहस्थ और संन्यास-वेशसे निरपेक्ष रहकर सभी अवस्थाओंमें कृष्णभजनकी शिक्षा प्रदान :- महाविषय कर, किबा विरक्त उदास। जन्मे जन्मे तुमि पञ्च-मोर 'निजदास' ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"जब तुम पाँचों भाई ही संन्यासी बन जाओगे, तब फिर तुम लोगोंके इतने बड़े परिवारका भरण-पोषण कौन करेगा? तुम सब बड़े विषय कार्य करो अथवा विषयोंसे पूर्ण विरक्त हो जाओ, तुम पाँचों भाई जन्म-जन्मान्तरमें मेरे 'नित्यदास' हो॥ 140-141 ॥ अनुभाष्य-मैं-भगवान्का नित्य-निजदास हूँ ऐसा शुद्ध अभिमान होनेपर-बाहरीरूपसे संन्यास-ग्रहण अथवा बाहरीरूपसे बृहत् विषयोंकी सेवा,-कुछ भी जीवका बाहरी अमङ्गल नहीं कर पाते; क्योंकि कृष्णसुखको भूलकर लौकिक निज-भोग-परायण होनेपर ही जीवोंका बन्धन होता है और कृष्णसेवापरायण अप्राकृत होनेपर गृहमें रहनेपर भी महासंन्यास होता है; उस अवस्थामें सब समय कृष्णमें आविष्ट होनेके कारण लोक-भयङ्कर महा-महाविषय भी कोई असुविधा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, सभी अवस्थाओंमें ही वे-समभावसे कृष्णसेवक हैं।" 141 ॥ गोपीनाथको राजाके प्रति अपनी कर्तव्यता और शुक्ल-धन अर्जन करके व्ययादिके लिये नैतिक धर्मोपदेश :- किन्तु मोर करिह एक 'आज्ञा'-पालन। 'व्यय ना करिह किछु राजार मूलधन ॥' 142 ॥ राजार मूलधन दिया ये किछु लभ्य हय। सेइ धन करिह नाना धर्मे-कर्मे व्यय ॥ 143 ॥ असद्व्यय ना करिह,-याते दुइ लोक याय।" एत बलि' सबाकारे दिलेन विदाय ॥ 144 ॥ अनुवाद-किन्तु तुम लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करना। तुम राजाके मूलधनमें-से कुछ भी व्यय नहीं करना। राजाको मूलधन देनेके पश्चात् आपको जो कुछ मिले, उसी धनको ही विभिन्न धर्म-कर्ममें व्यय करना। धनका असत् व्यय मत करना-इससे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं।" यह कहकर महाप्रभुने सभीको विदायी दी ॥ 142-144 ॥ अनुभाष्य-अप्राकृत भगवत् दासके अभिमानको भूलकर सांसारिक-विषय-भोगी बननेपर ही जीव धर्म और नीतिके विरुद्ध पापोंमें प्रवृत्त होता है; उसीका निषेध कर रहे हैं। जीवके पापमें प्रवृत्त होनेपर, उसे लौकिक मङ्गल और अप्राकृत अनुभव-इन दोनों वस्तुओंको प्राप्त करनेमें ही असुविधा होती है ॥ 142-144 ॥ विषयोंके वर्धित होनेके साथ महाप्रभुकी अमन्दोदय-दया ही कृपा-विवर्त्त; उसमें महाप्रभुकी भक्तवश्यताके विषयमें बतलाना :- रायेर घरे प्रभुर 'कृपा-विवर्त्त' कहिल। भक्तवात्सल्य-गुण याते व्यक्त हैल ॥ 145 ॥ अनुवाद-इस प्रसङ्गमें श्रीभवानन्द रायके परिवारपर हुई महाप्रभुकी कृपा-विवर्त्तके विषयमें वर्णन किया गया है, जिसमें महाप्रभुका भक्त-वात्सल्यरूपी गुण व्यक्त हुआ है॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कृपा-विवर्त्त', - विषय-मङ्गल (उन्नति) रूपी कृपा वास्तविक कृपा नहीं है, किन्तु विषय-बुद्धिसे वह एक वस्तुमें अन्य वस्तुका प्रतीति रूपी 'विवर्त्त' (भ्रम) प्रतीत हुआ ॥ 145 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा विदायी प्रदान :- सबाय आलिङ्गिया विदाय यबे दिला। हरिध्वनि करि' सब भक्त उठि' गेला ॥ 146 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुने उपस्थित अन्य भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी दी, तब सब भक्त हरिध्वनि करते हुए उठकर चले गये ॥ 146 ॥

268 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/147-149 ] महाप्रभुके व्यवहारको नहीं समझ पानेके कारण सभीको विस्मय :- प्रभुर कृपा देखि' सबार हैल चमत्कार। ताहारा बुझिते नारे प्रभुर व्यवहार ॥ 147 ॥ गोपीनाथके उद्धारकी लीलामें महाप्रभुके गूढ़-आचरणके रहस्य और तात्पर्यका वर्णन-(1) सर्वप्रथम गोपीनाथके उद्धारमें असम्मति, (2) गोपीनाथके उद्धारके बाद उसका अशुक्ल (काले) धनके अर्जनके लिये तिरस्कार, (3) विरक्त संन्यासी वैष्णवके आदर्श-रूपमें विषयकथारूपी निर्जनता अथवा दुःसङ्गके त्यागकी इच्छा, (4) गोपीनाथके विषयका वर्धन, (5) विषय भोगोंसे भयभीत गोपीनाथको घरमें रहने अथवा घरको त्याग करने, सभी अवस्थाओंमें ही कृष्णभजनकी योग्यताकी शिक्षा देना :- तारा सबे यदि कृपा करिते साधिल। 'आमा हैते किछु नहे' - प्रभु तब कहिल ॥ 148 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीभवानन्द रायके परिवारपर की गयी कृपाको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। वे महाप्रभुके व्यवहारको समझ नहीं पाये, क्योंकि जब उन सभीने आकर महाप्रभुसे गोपीनाथ पट्टनायकपर कृपा करनेके लिये प्रार्थना की, तब महाप्रभुने कहा था कि 'मेरे द्वारा कुछ भी करना सम्भवपर नहीं है॥' 147-148 ॥ अनुभाष्य-जीव होनेके कारण गोपीनाथ यदि विषयोंकी सेवा करेगा, तो उससे उसका अमङ्गल अनिवार्य है। लौकिक-मङ्गल-साधनको भगवान्‌की गौण कृपा ही समझना होगा। श्रीगौरसुन्दरके स्वयं विरक्त भक्तके रूपमें होकर विषयीका उपकार करनेपर महाप्रभुके वैसे चरित्रके अनुसरणके फलसे विरक्त वैष्णवका आदर्श तुच्छ और घृणित हो जाता; इसलिये निरपेक्ष त्यागी वेषको धारण करनेवाले भागवत व्यक्ति कभी भी विषयीके कार्यमें व्रती (नियुक्त) नहीं होंगे ॥ 147-148 ॥ नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गोपीनाथेर निन्दा, आर आपन-निर्वेद। एइमात्र कहिल, - इहार ना बुझिल भेद ॥ 149 ॥ अनुवाद-मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासने) केवल महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायककी निन्दा और

[ 9/149–153 नौवाँ अध्याय 269 स्वयंको विरक्त संन्यासी कहकर उनकी उदासीनताका वर्णन किया है। किन्तु इस व्यवहार-भेदको समझना बहुत कठिन है॥149॥ काशीमिश्रे ना साधिल, राजारे ना साधिल। उद्योग बिना एतसब फल दिल॥150॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्र अथवा राजा प्रतापरुद्रसे सीधे कोई सहायता माँगे बिना श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको उपरोक्त समस्त फल प्रदान किये॥150॥ भगवान्‌के भक्तवात्सल्य-वृत्तान्तको श्रवण करनेसे अनर्थकी निवृत्ति और भगवान्‌के प्रति प्रेमका उदय :— येइ इँहा शुने प्रभुर वात्सल्य-प्रकाश। प्रेमभक्ति पाय, ताँर विपद याय नाश॥152॥ अनुवाद—जो महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके प्रति उनके वात्सल्यको प्रकाशित करनेवाले चरित्रका श्रवण करता है, उसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और उसकी समस्त विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं॥152॥ कामभोगसे अविचलित श्रीचैतन्यके प्रति आकृष्ट व्यक्तिकी ही श्रीचैतन्यचरितके मर्मार्थको अनुभव करनेकी योग्यता :— चैतन्यचरित्र एइ परम गम्भीर। सेइ बुझे, ताँर पदे याँर मन 'धीर'॥151॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र परम गम्भीर है। महाप्रभुकी लीलाओंके उद्देश्यको केवल वही व्यक्ति समझ सकता है जिसका मन उनके चरणकमलोंमें स्थिर हो॥151॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥153॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे गोपीनाथपट्टनायकउद्धारो नाम नवमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥153॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें गोपीनाथपट्टनायक-उद्धार नामक नवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।

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