श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2280, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/104-114 नौवाँ अध्याय 263 अनुवाद—यह कहकर राजा श्रीप्रतापरुद्र श्रीकाशीमिश्रको प्रणाम करके अपने राजभवनमें लौट गये और युवराज और श्रीगोपीनाथको बुलवाया॥104॥ राजा कहे,—“सब कौड़ि तोमारे छाड़िलुँ। सेइ मालजाठ्या-पाट तोमारे त' दिलुँ॥105॥ आर बार ऐछे ना खाइह राजधन। आजि हैते दिलुँ तोमाय द्विगुण वर्त्तन॥”106॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने श्रीगोपीनाथ पट्टनायकसे कहा,—“मैं तुम्हारे समस्त देय धनको छोड़ रहा हूँ और पुनः तुम्हें मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानका अधिकारी नियुक्त कर रहा हूँ। अब आगेसे तुम इस प्रकार राजधनको खा मत जाना। आजसे मैं तुम्हें दोगुणा वेतन प्रदान करूँगा॥” 105-106॥ एत बलि' नेतधटी तारे पराइल। “प्रभु-आज्ञा लञा याह, विदाय तोमा दिल॥” 107॥ अनुवाद—राजा प्रतापरुद्रने यह कहकर श्रीगोपीनाथको पुनः अधिकारी नियुक्त करनेके उपलक्ष्यमें रेशमी वस्त्र पहनाया और कहा,—“अब तुम अपना कार्य प्रारम्भ करनेसे पहले महाप्रभुकी आज्ञा लेकर जाओ। मैं तुम्हें विदायी देता हूँ, तुम जा सकते हो॥” 107॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'नेतधटी',—रेशमी वस्त्र॥107॥ गोपीनाथके दण्डके वर्णनके प्रसङ्गमें महाप्रभुकी कृपाके फलसे व्यवहारिक और पारमार्थिक उन्नति अथवा श्रेयके वैशिष्ट्यका वर्णन :— परमार्थे प्रभुर कृपा, सेह रहु दूरे। अनन्त ताहार फल, के बलिते पारे ?? 108॥ अनुवाद—परमार्थ पथपर महाप्रभुकी कृपाकी बात तो दूर रहे, उस कृपाके अनन्त फल हैं, इसे कौन बतला सकता है? 108॥ 'राज्य-विषय' फल एइ-कृपार 'आभासे'। ताहार गणना कारों, मने नाहि आइसे!! 109॥ अनुवाद—श्रीगोपीनाथको 'राज-अधिकारी पदकी प्राप्ति' रूपी फल तो महाप्रभुकी कृपाके आभाससे ही प्राप्त हो गया! महाप्रभुकी पूर्ण कृपाके फलकी गणना कौन कर सकता है! 109॥ काँहा चाङ्गे चड़ाञा लय धन-प्राण! काँहा सब छाड़ि' सेइ राज्यादि-प्रदान!! 110॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाकर उनके प्राण और समस्त धन लेनेकी बात! और कहाँ उनके सम्पूर्ण ऋणको क्षमा करके उन्हें पुनः राज्य-अधिकारीका पद आदि प्रदान करना! 110॥ काँहा सर्वस्व बेचि' लय, देया ना याय कौड़ि! काँहा द्विगुण वर्त्तन, पराय नेतधड़ि!! 111॥ अनुवाद—कहाँ तो श्रीगोपीनाथका सबकुछ बेचकर भी राजधन सम्पूर्ण रूपसे चुक नहीं रहा था, और कहाँ अब स्वयं राजाके द्वारा दो गुणा वेतन और उन्हींके हाथोंसे रेशमी वस्त्रकी प्राप्तिरूपी सम्मान! 111॥ प्रभुर इच्छा नाहि, तारे कौड़ि छोड़ाइबे। द्विगुण वर्त्तन करि' पुनः 'विषय' दिबे॥112॥ तथापि तार सेवक आसि' कैल निवेदन। ताते क्षुब्ध हैल यबे महाप्रभुर मन॥113॥ विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि मनोबल। निवेदन-प्रभावहे तबु फले एत फल॥114॥ अनुवाद—महाप्रभुकी इच्छा नहीं थी कि राजा श्रीगोपीनाथका ऋण क्षमा कर दें, उनका वेतन दोगुणा कर दें और उन्हें पुनः उसी स्थानका राजस्व अधिकारी बना दें। तथापि जब श्रीगोपीनाथके सेवकोंने आकर महाप्रभुसे निवेदन किया, तो उनकी स्थिति जानकर जब महाप्रभुका मन दुःखी हुआ, तब भी महाप्रभुकी उन्हें विषयरूपी सुखोंको प्रदान करनेकी इच्छा नहीं थी। किन्तु उनसे निवेदन करनेके प्रभावके फलस्वरूप ही