भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2281

264 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/112-122 ] श्रीगोपीनाथको इतने अधिक फलकी प्राप्ति हो गयी॥ 112-114॥ महाप्रभुका अद्भुत ऐश्वर्यमय स्वभाव :- के कहिते पारे गौरेर आश्चर्य स्वभाव ? ब्रह्मा-शिव आदि याँर ना पाय अन्तर्भाव ॥ 115 ॥ अनुवाद-श्रीगौरसुन्दरके आश्चर्यमय स्वभावका कौन अनुमान लगा सकता है? जिसका मर्म तो ब्रह्मा-शिव आदि भी नहीं जान पाते ॥ 115 ॥ महाप्रभु और श्रीकाशीमिश्रका गोपीनाथके प्रति राज्यव्यवहारके विषयमें वार्तालाप :- एथा काशीमिश्र आसि' प्रभुर चरणे। राजार चरित्र सब कैला निवेदने ॥ 116 ॥ अनुवाद-इधर श्रीकाशीमिश्रने महाप्रभुके चरणोंमें उपस्थित होकर राजाकी समस्त इच्छाके विषयमें बतलाया॥ 116 ॥ प्रभु कहे,—“काशीमिश्र, कि तुमि करिला? राज-प्रतिग्रह तुमि आमा' कराइला??” 117 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा, - “हे काशीमिश्र ! यह आपने क्या किया? आपने परोक्षरूपसे मुझे राजासे दान ग्रहण करवा दिया?” 117 ॥ अनुभाष्य-श्रीकाशीमिश्रकी यह बात सुनकर कि राजाने गोपीनाथसे प्राप्य अर्थको महाप्रभुके लिये छोड़ दिया है, तो महाप्रभुके विचारमें यह उनके द्वारा राजासे धनरूपी दान ग्रहण करना प्रमाणित हुआ॥ 117 ॥ मिश्र कहे, - “शुन, प्रभु, राजार वचने। अकपटे राजा एइ कैला निवेदने ॥ 118 ॥ 'प्रभु येन नाहि जानेन, - राजा आमार लागिया। दुइलक्ष काहन कौड़ि दिलेक छाड़िया ॥ 119 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा, - “हे महाप्रभु ! आप महाराज प्रतापरुद्रके वचन सुनिये। राजाने निष्कपट होकर यह निवेदन किया है, - 'महाप्रभुको इस प्रकारसे बतलाना कि वे कभी भी ना सोचें कि मैंने उनके कारण दो लाख काहन राशि छोड़ दी है ॥ 118-119 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मैंने महाप्रभुके लिये धन छोड़ दिया है, वे ऐसा न समझें, उन्हें इस प्रकारसे कहना ॥ 119 ॥ भवानन्देर पुत्र सब - मोर प्रियतम। इँहा-सबाकारे आमि देखि आत्मसम ॥ 120 ॥ अतएव याँहा ताँहा देइ अधिकार। खाय, पिये, लुटे, बिलाय, ना करौं विचार ॥ 121 ॥ पहले प्रतापरुद्रके अनुग्रहसे राजमहेन्द्रीके भूमि-अधिकारीके रूपमें श्रीराम-रायको लगाना :- राजमहीन्द्रे 'राजा' कैनु राम-राय। ये खाइल, येबा दिल, नाहि लेखा-दाय ॥ 122 ॥ अनुवाद-वास्तवमें श्रीभवानन्द रायके सभी पुत्र मुझे विशेष प्रिय हैं, मैं उन सभीको अपने परिवारके समान ही मानता हूँ। इसलिये मैंने उन्हें अपने राज्यमें इधर-उधर सर्वत्र राजस्व एकत्रित करनेका अधिकार दिया हुआ है। वे उस राजस्वको खायें, पियें, लूटें या बाँटें-मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। मैंने रामानन्द रायको राजमहेन्द्रीका राज्याधिकारी बनाया, उसने राजस्वमें-से जो अपने पास रखा, जो राजकोषमें दिया, मैंने उसका कोई लेखा-जोखा नहीं किया ॥ 120-122 ॥ अनुभाष्य-वर्तमान राजमहेन्द्री-नगर-गोदावरीके उत्तरी-तटपर अवस्थित है। रामानन्दरायके समयकी राजधानी 'विद्यानगर'- गोदावरीके दक्षिण-तटपर थी। विद्यानगर अथवा विद्यापुर गोदावरी नदीके सागर-सङ्गममें अर्थात् कोटदेशमें था। वह प्रदेश उस समय राजमहेन्द्रीके नामसे प्रसिद्ध था। कलिङ्ग देशका उत्तर-अंश ही उत्कलिङ्ग अथवा उत्कल-देश था। उत्कलिङ्ग-राज्यके दक्षिण-प्रदेशकी राजधानी ही 'राजमहेन्द्री' थी। वर्तमान