श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2282, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 9/122-132 नौवाँ अध्याय 265 समयमें 'राजमहेन्द्री'-नगरका स्थान-परिवर्तन हो गया है॥ 122 ॥ गोपीनाथ एइमत 'विषय' करिया। दुइचारि-लक्ष काहन रहे त' खाञा॥ 123 ॥ किछु देय, किछु ना देय, ना करि विचार। 'जाना'-सहित अप्रीत्ये दुःख पाइल एइबार ॥ 124 ॥ 'जाना' एत कैला, - इहा मुइ नाहि जानौं। भवानन्देर पुत्र-सबे आत्मसम मानौं ॥ 125 ॥ ताँहा लागि' द्रव्य छाड़ि, - इहा मात् माने। सहजेइ मोर प्रीति हय ताहा-सने ॥" 126 ॥ अनुवाद - गोपीनाथने भी इसी प्रकार राजस्व संग्रह करके उसमें-से दो-चार लाख काहन राशि ही तो अपने पास रखी है। वे राजकोषमें कुछ देता है अथवा कुछ नहीं देता है, मैं इस सबका कोई विचार नहीं करता। युवराज जानासे परिहास करके उसे रुष्ट करनेके कारण ही उसने इस बार दुःख पाया है। युवराजने इतना सब किया, मुझे उसकी कोई जानकारी नहीं थी। मैं तो श्रीभवानन्द रायके समस्त पुत्रोंको अपने परिवारका सदस्य ही मानता हूँ। आप महाप्रभुसे कहना कि वे यह नहीं मानें कि मैंने उनके कारण गोपीनाथके ऋणको क्षमा कर दिया है, मैंने जो कुछ भी किया है वह श्रीभवानन्द रायके परिवारके प्रति मेरी स्वाभाविक प्रीतिके कारण ही है।'॥" 123-126 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'मात्', - (हिन्दीका शब्द) मत अर्थात् नहीं ॥ 126 ॥ राजाके दैन्यके विषयमें सुनकर महाप्रभुकी प्रसन्नता, सपुत्र श्रीराय-भवानन्दका आगमन, दीनतासहित महाप्रभुकी कृपाके माहात्म्यके विषयमें बतलाना :- शुनिया राजार विनय प्रभुर आनन्द। हेनकाले आइला तथा राय-भवानन्द ॥ 127 ॥ पञ्चपुत्र-सहिते आसि' पड़िला चरणे। उठाञा प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गने ॥ 128 ॥ अनुवाद - श्रीकाशीमिश्रके मुखसे राजा प्रतापरुद्रके विनीत वचनोंको सुनकर महाप्रभु आनन्दित हुए। उसी समय वहाँपर श्रीभवानन्द राय आये। वे अपने पाँचों पुत्रों सहित आकर महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े, महाप्रभुने उन्हें उठाकर उनका आलिङ्गन किया ॥ 127-128 ॥ रामानन्द-राय आदि सबाइ मिलिला। भवानन्द-राय तबे बलिते लागिला ॥ 129 ॥ सपरिवार श्रीभवानन्दकी महाप्रभुके चरणोंमें अपने आपको बेच देनेवाली उक्ति :- “तोमार किङ्कर एइ सब मोर कुल। ए विपदे राखि' प्रभु, पुनः निला मूल ॥ 130 ॥ पाँच-पाण्डवोंके विपत्तिसे उद्धारकी उपमा देकर महाप्रभुके भक्तवात्सल्यका वर्णन :- भक्तवात्सल्य एबे प्रकट करिला। पूर्वे येन पञ्चपाण्डवे विपदे तारिला ॥" 131 ॥ अनुवाद - श्रीरामानन्दराय आदि सभी भाई महाप्रभुसे मिले। तब श्रीभवानन्द रायने महाप्रभुसे कहा, - “मेरा यह पूरा परिवार ही आपका दास है। ऐसी विपत्तिमें आपने हमारी रक्षा करके हमें पुनः मूल्य देकर खरीद लिया है। आपने अब वैसा ही भक्त-वात्सल्य प्रकटित किया है, जैसे आपने पूर्वकालमें पाँचों पाण्डवोंका विपत्तिसे उद्धार करके प्रकटित किया था ॥" 129-131 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'निला मूल', - पुनः मूल्य देकर खरीद लिया ॥ 130 ॥ गोपीनाथके उद्धार-हेतु कृतज्ञता जतलाना, महाप्रभुकी महिमाका गान :- 'नेतधटी'-माथे गोपीनाथ चरणे पड़िला। राजार कृपा-वृत्तान्त सकल कहिला ॥ 132 ॥