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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2283, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2283

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266 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/132-140 ] “बाकी कौड़ि बाद, आर द्विगुण वर्त्तन कैला। पुनः ‘विषय’ दिया ‘नेतधटी’ पराइला ॥ 133 ॥ काँहा चाङ्गेर उपर सेइ मरण-प्रमाद ! काँहा ‘नेतधटी’ पुनः,—ए सब प्रसाद ! ! 134 ॥ अनुवाद—रेशमी वस्त्रको सिरपर धारण किये गोपीनाथ पट्टनायक भी महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़े और उन्होंने महाप्रभुको स्वयं पर राजा प्रतापरुद्रके द्वारा की गयी कृपाके वृत्तान्तको सम्पूर्ण रूपसे कह सुनाया,—“राजाने मुझे देय राजधनसे मुक्त कर दिया है और उन्होंने मेरा वेतन भी दो गुणा कर दिया है। उन्होंने मुझे पुनः मालजाठ्या दण्डपाटका दायित्व प्रदान करके मुझे अपने हाथोंसे रेशमी वस्त्र ओढ़ाया। कहाँ तो चाङ्गेके ऊपर मरनेका भय ! और कहाँ रेशमी वस्त्रके द्वारा सम्मान, यह सब आपकी कृपा है ! 132-134 ॥ चाङ्गेर उपरे तोमार चरण ध्यान कैलुँ। चरण-स्मरण-प्रभावे एइ फल पाइलुँ ॥ 135 ॥ लोके चमत्कार मोर ए सब देखिया। प्रशंसे तोमार कृपा-महिमा गाञा ॥ 136 ॥ श्रीगौर-स्मरणका मुख्य फल-श्रीगौरप्रीति, गौणफल-विषय-सुख :- किन्तु तोमार स्मरणेर नहे एइ ‘मुख्यफल’। ‘फलाभास’ एइ, —याते ‘विषय’ चञ्चल ॥ 137 ॥ अनुवाद—मैंने चाङ्गेके ऊपर आपके चरणकमलोंका ध्यान किया था और मुझे आपके चरणकमलोंके स्मरणके प्रभावसे ही यह फल प्राप्त हुआ है। मेरे साथ जो कुछ हुआ उसे देखकर लोग चमत्कृत हो गये हैं और वे आपकी कृपा-महिमाको गाकर आपकी प्रशंसा कर रहे हैं। किन्तु यह आपके स्मरणका मुख्य फल नहीं है, यह तो आपके स्मरणके फलका आभासमात्र है, क्योंकि भौतिक वैभव तो अनित्य है ॥ 135-137 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आपके चरणकमलोंको स्मरण करनेका मुख्य फल—आपके प्रति प्रीति उत्पन्न होना है। जीवन, मान और धनकी रक्षा—उस सत्कर्मका (आपके चरणकमलोंकी सेवाका) फलाभास-मात्र है; क्योंकि जड़ीय विषय—स्वयं ही चञ्चल हैं, इसलिये उनसे सम्बन्धित फल ‘मुख्य’ नहीं है ॥ 137 ॥ अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके स्मरणसे सर्वसिद्धि हो सकती है। त्रिवर्ग—धर्म-अर्थ-काम और अपवर्ग-मोक्षादि गौण फल ही चञ्चल विषयोंकी उग्र कामनासे युक्त व्यक्तियोंके प्राप्य ‘फलाभास’ हैं, वे—परिपूर्ण नित्यसिद्ध फल कृष्णप्रेमकी प्राप्तिकी तुलनामें अत्यन्त तुच्छ और अल्प लाभमात्र ही हैं ॥ 137 ॥ श्रीगौरकृपाके फलसे श्रीरामानन्द और श्रीवाणीनाथकी निष्किञ्चनता :- राम-राये, वाणीनाथे कैला ‘निर्विषय’। सेइ कृपा आमाते नाहि, याते ऐछे हय ! ! 138 ॥ विषयकी वृद्धिके दर्शनसे महाप्रभुकी सेवाके सौभाग्यके अभावकी आशङ्कासे महाप्रभुके चरणोंमें गोपीनाथके द्वारा अप्राकृत-कृपा और विषयभोग-बुद्धिसे मुक्तिकी प्रार्थना :- शुद्ध कृपा कर, गोसाञि, घुचाह ‘विषय’। निर्विण्ण हइनु, मोते ‘विषय’ ना हय ॥” 139 ॥ अनुवाद—आपकी वास्तविक कृपा रामानन्द राय और वाणीनाथपर हुई है, क्योंकि आपने उन्हें राजकार्यसे मुक्त करा दिया है। किन्तु आपकी वैसी कृपा मुझपर नहीं हुई है जो मुझे भी विषयोंसे मुक्त करवा दे ! हे श्रीचैतन्य गोसांई ! आप मुझपर अपनी शुद्ध कृपा करके मेरे विषयोंको भी छुड़ाइए। वैराग्यके कारण अब मुझे विषय भोगोंकी इच्छा नहीं है ॥” 138-139 ॥ बाह्य संन्यास-वेशके प्रति महाप्रभुका अनादर, गोपीनाथको गृहस्थ आश्रमका अधिकारी जानकर उसीमें रहकर ही हरिभजन करनेका आदेश :- प्रभु कहे, —“संन्यासी यबे हइबा पञ्चजन। कुटुम्ब-बाहुल्य तोमार के करे भरण ? ? 140 ॥

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