भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2284

[ 9/140-146 नौवाँ अध्याय 267 सिद्ध गौरदासोंको गृहस्थ और संन्यास-वेशसे निरपेक्ष रहकर सभी अवस्थाओंमें कृष्णभजनकी शिक्षा प्रदान :- महाविषय कर, किबा विरक्त उदास। जन्मे जन्मे तुमि पञ्च-मोर 'निजदास' ॥ 141 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"जब तुम पाँचों भाई ही संन्यासी बन जाओगे, तब फिर तुम लोगोंके इतने बड़े परिवारका भरण-पोषण कौन करेगा? तुम सब बड़े विषय कार्य करो अथवा विषयोंसे पूर्ण विरक्त हो जाओ, तुम पाँचों भाई जन्म-जन्मान्तरमें मेरे 'नित्यदास' हो॥ 140-141 ॥ अनुभाष्य-मैं-भगवान्का नित्य-निजदास हूँ ऐसा शुद्ध अभिमान होनेपर-बाहरीरूपसे संन्यास-ग्रहण अथवा बाहरीरूपसे बृहत् विषयोंकी सेवा,-कुछ भी जीवका बाहरी अमङ्गल नहीं कर पाते; क्योंकि कृष्णसुखको भूलकर लौकिक निज-भोग-परायण होनेपर ही जीवोंका बन्धन होता है और कृष्णसेवापरायण अप्राकृत होनेपर गृहमें रहनेपर भी महासंन्यास होता है; उस अवस्थामें सब समय कृष्णमें आविष्ट होनेके कारण लोक-भयङ्कर महा-महाविषय भी कोई असुविधा उत्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, सभी अवस्थाओंमें ही वे-समभावसे कृष्णसेवक हैं।" 141 ॥ गोपीनाथको राजाके प्रति अपनी कर्तव्यता और शुक्ल-धन अर्जन करके व्ययादिके लिये नैतिक धर्मोपदेश :- किन्तु मोर करिह एक 'आज्ञा'-पालन। 'व्यय ना करिह किछु राजार मूलधन ॥' 142 ॥ राजार मूलधन दिया ये किछु लभ्य हय। सेइ धन करिह नाना धर्मे-कर्मे व्यय ॥ 143 ॥ असद्व्यय ना करिह,-याते दुइ लोक याय।" एत बलि' सबाकारे दिलेन विदाय ॥ 144 ॥ अनुवाद-किन्तु तुम लोग मेरी एक आज्ञाका पालन करना। तुम राजाके मूलधनमें-से कुछ भी व्यय नहीं करना। राजाको मूलधन देनेके पश्चात् आपको जो कुछ मिले, उसी धनको ही विभिन्न धर्म-कर्ममें व्यय करना। धनका असत् व्यय मत करना-इससे यह लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं।" यह कहकर महाप्रभुने सभीको विदायी दी ॥ 142-144 ॥ अनुभाष्य-अप्राकृत भगवत् दासके अभिमानको भूलकर सांसारिक-विषय-भोगी बननेपर ही जीव धर्म और नीतिके विरुद्ध पापोंमें प्रवृत्त होता है; उसीका निषेध कर रहे हैं। जीवके पापमें प्रवृत्त होनेपर, उसे लौकिक मङ्गल और अप्राकृत अनुभव-इन दोनों वस्तुओंको प्राप्त करनेमें ही असुविधा होती है ॥ 142-144 ॥ विषयोंके वर्धित होनेके साथ महाप्रभुकी अमन्दोदय-दया ही कृपा-विवर्त्त; उसमें महाप्रभुकी भक्तवश्यताके विषयमें बतलाना :- रायेर घरे प्रभुर 'कृपा-विवर्त्त' कहिल। भक्तवात्सल्य-गुण याते व्यक्त हैल ॥ 145 ॥ अनुवाद-इस प्रसङ्गमें श्रीभवानन्द रायके परिवारपर हुई महाप्रभुकी कृपा-विवर्त्तके विषयमें वर्णन किया गया है, जिसमें महाप्रभुका भक्त-वात्सल्यरूपी गुण व्यक्त हुआ है॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'कृपा-विवर्त्त', - विषय-मङ्गल (उन्नति) रूपी कृपा वास्तविक कृपा नहीं है, किन्तु विषय-बुद्धिसे वह एक वस्तुमें अन्य वस्तुका प्रतीति रूपी 'विवर्त्त' (भ्रम) प्रतीत हुआ ॥ 145 ॥ नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा विदायी प्रदान :- सबाय आलिङ्गिया विदाय यबे दिला। हरिध्वनि करि' सब भक्त उठि' गेला ॥ 146 ॥ अनुवाद-जब महाप्रभुने उपस्थित अन्य भक्तोंको आलिङ्गन करके विदायी दी, तब सब भक्त हरिध्वनि करते हुए उठकर चले गये ॥ 146 ॥