श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें268 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/147-149 ] महाप्रभुके व्यवहारको नहीं समझ पानेके कारण सभीको विस्मय :- प्रभुर कृपा देखि' सबार हैल चमत्कार। ताहारा बुझिते नारे प्रभुर व्यवहार ॥ 147 ॥ गोपीनाथके उद्धारकी लीलामें महाप्रभुके गूढ़-आचरणके रहस्य और तात्पर्यका वर्णन-(1) सर्वप्रथम गोपीनाथके उद्धारमें असम्मति, (2) गोपीनाथके उद्धारके बाद उसका अशुक्ल (काले) धनके अर्जनके लिये तिरस्कार, (3) विरक्त संन्यासी वैष्णवके आदर्श-रूपमें विषयकथारूपी निर्जनता अथवा दुःसङ्गके त्यागकी इच्छा, (4) गोपीनाथके विषयका वर्धन, (5) विषय भोगोंसे भयभीत गोपीनाथको घरमें रहने अथवा घरको त्याग करने, सभी अवस्थाओंमें ही कृष्णभजनकी योग्यताकी शिक्षा देना :- तारा सबे यदि कृपा करिते साधिल। 'आमा हैते किछु नहे' - प्रभु तब कहिल ॥ 148 ॥ अनुवाद-महाप्रभुकी श्रीभवानन्द रायके परिवारपर की गयी कृपाको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। वे महाप्रभुके व्यवहारको समझ नहीं पाये, क्योंकि जब उन सभीने आकर महाप्रभुसे गोपीनाथ पट्टनायकपर कृपा करनेके लिये प्रार्थना की, तब महाप्रभुने कहा था कि 'मेरे द्वारा कुछ भी करना सम्भवपर नहीं है॥' 147-148 ॥ अनुभाष्य-जीव होनेके कारण गोपीनाथ यदि विषयोंकी सेवा करेगा, तो उससे उसका अमङ्गल अनिवार्य है। लौकिक-मङ्गल-साधनको भगवान्की गौण कृपा ही समझना होगा। श्रीगौरसुन्दरके स्वयं विरक्त भक्तके रूपमें होकर विषयीका उपकार करनेपर महाप्रभुके वैसे चरित्रके अनुसरणके फलसे विरक्त वैष्णवका आदर्श तुच्छ और घृणित हो जाता; इसलिये निरपेक्ष त्यागी वेषको धारण करनेवाले भागवत व्यक्ति कभी भी विषयीके कार्यमें व्रती (नियुक्त) नहीं होंगे ॥ 147-148 ॥ नौवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। गोपीनाथेर निन्दा, आर आपन-निर्वेद। एइमात्र कहिल, - इहार ना बुझिल भेद ॥ 149 ॥ अनुवाद-मैंने (ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासने) केवल महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायककी निन्दा और