भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2286

[ 9/149–153 नौवाँ अध्याय 269 स्वयंको विरक्त संन्यासी कहकर उनकी उदासीनताका वर्णन किया है। किन्तु इस व्यवहार-भेदको समझना बहुत कठिन है॥149॥ काशीमिश्रे ना साधिल, राजारे ना साधिल। उद्योग बिना एतसब फल दिल॥150॥ अनुवाद—महाप्रभुने श्रीकाशीमिश्र अथवा राजा प्रतापरुद्रसे सीधे कोई सहायता माँगे बिना श्रीगोपीनाथ पट्टनायकको उपरोक्त समस्त फल प्रदान किये॥150॥ भगवान्‌के भक्तवात्सल्य-वृत्तान्तको श्रवण करनेसे अनर्थकी निवृत्ति और भगवान्‌के प्रति प्रेमका उदय :— येइ इँहा शुने प्रभुर वात्सल्य-प्रकाश। प्रेमभक्ति पाय, ताँर विपद याय नाश॥152॥ अनुवाद—जो महाप्रभुके द्वारा श्रीगोपीनाथ पट्टनायकके प्रति उनके वात्सल्यको प्रकाशित करनेवाले चरित्रका श्रवण करता है, उसे प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है और उसकी समस्त विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं॥152॥ कामभोगसे अविचलित श्रीचैतन्यके प्रति आकृष्ट व्यक्तिकी ही श्रीचैतन्यचरितके मर्मार्थको अनुभव करनेकी योग्यता :— चैतन्यचरित्र एइ परम गम्भीर। सेइ बुझे, ताँर पदे याँर मन 'धीर'॥151॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुका चरित्र परम गम्भीर है। महाप्रभुकी लीलाओंके उद्देश्यको केवल वही व्यक्ति समझ सकता है जिसका मन उनके चरणकमलोंमें स्थिर हो॥151॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥153॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे गोपीनाथपट्टनायकउद्धारो नाम नवमः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥153॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें गोपीनाथपट्टनायक-उद्धार नामक नवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।