श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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262 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/94-104 ] क्षणकाल महाप्रभुका दर्शन भी परम लोभनीय :- एकक्षण प्रभुर यदि पाइये दरशन। कोटिचिन्तामणि-लाभ नहे तार सम ॥ 95 ॥ कोन् छार पदार्थ एइ दुइलक्ष काहन ? प्राण-राज्य करों प्रभुsingleपदे निर्मञ्छन ॥" 96 ॥ अनुवाद-यह सब विवरण सुनकर राजा मनमें बहुत दुःखी हुए और कहने लगे,-"यदि महाप्रभु यहीं रहें तो मैं गोपीनाथसे प्राप्य अपना सम्पूर्ण धन छोड़ दूँगा। यदि मुझे एक क्षणके लिये भी महाप्रभुके दर्शन प्राप्त हों तो करोड़ों चिन्तामणियोंका लाभ भी उसके समान नहीं है। तब फिर दो लाख काहन जैसी तुच्छ राशिका तो कहना क्या? मैं महाप्रभुके चरणकमलोंमें अपने प्राण और राज्य दोनों ही न्यौछावर कर दूँगा ॥" 94-96 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'निर्मञ्छन', - (आरती अथवा पूजाके समय) अर्घ्य प्रदान, विशेष अर्पण ॥ 96 ॥ भक्तके दुःखसे महाप्रभुका दुःख :- मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, -नहे प्रभुर मन। तारा दुःख पाय, -एइ ना याय सहन ॥ "97 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,- "महाप्रभु नहीं चाहते कि आप राजधन छोड़ दें। उनसे यह सहन नहीं हो रहा कि गोपीनाथ पट्टनायकादि दुःखी हो रहे हैं ॥ "97 ॥ राजाके द्वारा गोपीनाथको दण्ड देनेके विषयमें अपनी अनभिज्ञता बतलाना :- राजा कहे, - "तारे आमि दुःख नाहि दिये। चाङ्गे चड़ा, खड्गे डारा, आमि ना जानिये ॥ 98 ॥ पुरुषोत्तम-जानारे तँह कैल परिहास। सेइ 'जाना' तारे देखाइल मिथ्या त्रास ॥ 99 ॥ श्रीमिश्रको महाप्रभुको सन्तुष्ट करनेके लिये और श्रीभवानन्दके वंशके व्यक्तियोंके प्रति अपनी स्वाभाविक प्रीतिके विषयमें बतलानेके लिये राजाका अनुरोध :- तुमि याह, प्रभुरे राखह यत्न करि'। एइ मुइ ताहारे छाड़िनु सब कौड़ि ॥" 100 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"मैंने गोपीनाथ पट्टनायकको दुःख नहीं दिया। उसे चाङ्गपर चढ़ाने तथा तलवारोंपर गिरानेके विषयमें मैं कुछ भी नहीं जानता था। उसने युवराज पुरुषोत्तम जानाके साथ परिहास किया था, इसलिये युवराजने गोपीनाथको केवल डरानेके लिये ऐसा मिथ्या नाटक किया था। आप जाकर महाप्रभुको यहाँ रोकनेके लिये प्रयास कीजिये। मैं गोपीनाथके द्वारा देय समस्त राशिको छोड़ रहा हूँ॥ "98-100 ॥ मिश्र कहे,-"कौड़ि छाड़िबा, नहे प्रभुर मने। कौड़ि छाड़िले प्रभु कदाचित् सुख माने ॥ "101 ॥ अनुवाद-श्रीकाशीमिश्रने कहा,-"महाप्रभु नहीं चाहते कि आप प्राप्य राजधन छोड़ दें। धन छोड़नेपर महाप्रभुको कोई सुख नहीं होगा ॥ "101 ॥ राजा कहे, - "कौड़ि छाड़िमु, -इहा ना कहिबा। सहजे मोर प्रिय तांरा, -इहा जानाइबा ॥ 102 ॥ भवानन्द-राय-आमार पूज्य-गर्वित। ताँर पुत्रगणे आमार सहजेइ प्रीत ॥" 103 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रने कहा, -"आप महाप्रभुसे ऐसा मत कहना कि मैंने धन छोड़ दिया है। आप उन्हें यह कहना कि भवानन्द राय और उनका परिवार तो स्वभावतः मेरे प्रिय हैं। श्रीभवानन्द राय मेरे पूज्य तथा गौरवके पात्र हैं, इसलिये उनके पुत्रोंके प्रति मेरी प्रीति होना स्वाभाविक ही है ॥ "102-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पूज्य-गर्वित',-पूज्य और सम्मानके पात्र ॥ 103 ॥ गोपीनाथको युवराजके अनुग्रहका प्रदर्शन और विदायी प्रदान :- एत बलि' मिश्रे नमस्करि' घरे गेला। गोपीनाथे 'बड़ जाना' डाकिया आनिला ॥ 104 ॥