श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/83-94 नौवाँ अध्याय 261 श्रीमिश्रके द्वारा राजाको महाप्रभुके पुरी-त्यागका समाचार देना :- “देव, शुन, आर एक अपरूप बात़्! महाप्रभु क्षेत्र छाड़ि' याबेन आलालनाथ !!” 84 ॥ अनुवाद—जब राजा श्रीकाशीमिश्रके चरणोंकी सेवा करने लगे, तब श्रीकाशीमिश्रने कुछ सङ्केतके द्वारा उनसे कहा,—“हे राजन्! आप एक अद्भुत बात श्रवण कीजिये ! महाप्रभु श्रीजगन्नाथपुरीको छोड़कर आलालनाथ चले जायेंगे !” 83-84 ॥ राजाका दुःख और उसके कारणकी जिज्ञासा, उत्तरमें श्रीमिश्रके द्वारा गोपीनाथके वृत्तान्तका वर्णन :- शुनि' राजा दुःखी हैला, पुछिलेन कारण। तबे मिश्र कहे ताँरे सब विवरण ॥ 85 ॥ “गोपीनाथ-पट्टनायके चाङ्गे चढ़ाइला। तार सेवक आसि' प्रभुरे कहिला ॥ 86 ॥ राज-सम्पत्तिका अपहरण करनेवाले गोपीनाथका धर्मविग्रह और धर्मरक्षक महाप्रभुके द्वारा तीव्र तिरस्कार; लौकिक, राजनैतिक और अर्थनैतिक अथवा शुक्लवित्तको अर्जित करनेकी विधिका वर्णन :- शुनिया क्षोभित हैल महाप्रभुर मन। क्रोधे गोपीनाथे कैला बहुत भर्त्सन ॥ 87 ॥ 'अजितेन्द्रिय हञा करे राजविषय। नाना असत्पथे करे राजद्रव्य व्यय ॥ 88 ॥ ब्रह्मस्व-अधिक एइ हय राजधन। ताहा हरि' भोग करे महापापी जन ॥ 89 ॥ राजार वर्त्तन खाय, आर चुरि करे। राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर विचारे ॥ 90 ॥ निज-कौड़ि मागे, राजा नाहि करे दण्ड। राजा-महाधार्मिक, एइ हय पापी भण्ड ! !91 ॥ राज-कड़ि ना देय, आमारे फुकारे। एइ महादुःख इँहा के सहिते पारे ? ?92 ॥ निर्जनवासकी इच्छा अर्थात् जहाँ विषयकी बातें हों, ऐसे स्थानरूपी दुःसङ्गका त्याग :- आलालनाथ याइ' ताँहा निश्चिन्ते रहिमु। विषयीर भाल मन्द वार्त्ता ना शुनिमु ॥” 93 ॥ अनुवाद—यह सुनकर राजा प्रतापरुद्र बहुत दुःखी हुए और उन्होंने श्रीकाशीमिश्रसे इसका कारण पूछा। तब श्रीकाशीमिश्रने महाराज प्रतापरुद्रको समस्त विवरण बतलाया,—“जब गोपीनाथ पट्टनायकको चाङ्गपर चढ़ाया गया, तब उसके सेवकोंने आकर महाप्रभुको यह सूचना दी। इसे सुनकर महाप्रभुका मन बहुत दुःखी हुआ और उन्होंने क्रोधित होकर गोपीनाथकी बहुत भर्त्सना करते हुए कहा,—'गोपीनाथ अजितेन्द्रिय होनेपर भी राजसम्पत्तिका रक्षक बनता है और अनेक असत् कार्योंमें राजधनका व्यय करता है। राजधन ब्राह्मणके धनसे भी अधिक पूजनीय है। महापापी लोग ही राजधनका हरण करके उसका भोग करते हैं। जो जीवन निर्वाह करनेके लिये राजासे वेतन लेकर भी राजधनकी चोरी करता है, शास्त्रोंके विचारके अनुसार ऐसा व्यक्ति राजदण्डके योग्य होता है। राजा केवल अपना धन ही तो चाहता है, वह कोई दण्ड नहीं देना चाहता! इसलिये राजा अवश्य ही महाधार्मिक है, किन्तु यह गोपीनाथ धोखा देनेवाला पापी है !! गोपीनाथ स्वयं ही राजधन नहीं दे रहा और वह मुझसे सहायताके लिये उच्च स्वरसे रो रहा है। यह तो महापापकी बात है, इसे कौन सहन कर सकता है? मैं तो आलालनाथ जाकर वहाँ निश्चिन्त होकर रहूँगा और विषयी लोगोंकी अच्छी-बुरी किसी भी बातको नहीं सुनूँगा ॥” 85-93 ॥ अनुभाष्य—'फुकारे',—उच्च स्वरसे रोदन करता है ॥ 92 ॥ महाप्रभु पुरीमें ही रहें इसके लिये राजाका सर्वस्व त्याग करनेकी प्रतिज्ञा :- एत शुनि' कहे राजा पाञा मने व्यथा। “सब द्रव्य छाड़ौं, यदि प्रभु रहेन एथा ॥ 94 ॥