भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2277

260 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/74-83 ] बिना उसके सेवकोंने स्वयं ही आकर आपको सूचित किया, क्योंकि गोपीनाथ आपके एकान्त शरणागत है॥ 74 ॥ शुद्धभक्तोंकी परिभाषा :- सेइ 'शुद्धभक्त', ये तोमा भजे तोमा लागि'। आपनार सुख-दुःखे हय भोग-भागी ॥ 75 ॥ अनुवाद-वही शुद्धभक्त है जो अनुकूल भावसे आपकी प्रसन्नताके लिये आपकी सेवा करता है। अपने सुख-दुःखको वह अपने ही द्वारा किये गये कर्मोंका फल मानकर उन भोगोंको भोगता है ॥ 75 ॥ शुद्धभक्तोंका आचार-व्यवहार :- तोमार अनुकम्पा चाहे, भजे अनुक्षण। अचिरात् मिले ताँरे तोमार चरण ॥ 76 ॥ अनुवाद-शुद्धभक्त आपकी कृपाको प्राप्त करनेके उद्देश्यसे निरन्तर आपका भजन करते हैं, इसलिये उन्हें अतिशीघ्र ही आपके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है ॥ 76 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/8) में- तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्। हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥ 77 ॥ अनुवाद-जो आपकी अनुकम्पा प्राप्तिके उद्देश्यसे अपने कर्मोंके मन्द फलोंको भोग करते-करते मन, वाक्य और शरीरके द्वारा आपके प्रति भक्ति करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे 'मुक्तिपदे दायभाक्' अर्थात् वे मुक्तिपदको प्राप्त करते हैं ॥ 77 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 6/261 संख्या देखें ॥ 77 ॥ काशीमिश्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें रहनेके लिये ही प्रार्थना :- तुमि बसि' रह, केने याबे आलालनाथ? केह तोमा ना शुनाबे विषयीर बात् ॥ 78 ॥ अनुवाद-कृपया आप यहीं श्रीजगन्नाथ पुरीमें ही वास कीजिये, आप आलालनाथ क्यों जायेंगे? आपको कोई भी विषयी व्यक्तिकी बात नहीं सुनायेगा ॥ 78 ॥ महाप्रभुकी कृपासे ही भविष्यकालमें गोपीनाथके द्वारा अपनी रक्षाकी निश्चयता :- यदि तोमार तारे राखिते हय मन। आजि ये राखिल, सेइ करिबे रक्षण ॥ ”79 ॥ अनुवाद-यदि आपकी गोपीनाथकी रक्षा करनेकी इच्छा है, तो आज जिन्होंने [भगवान् श्रीजगन्नाथने] उसकी रक्षा की है, वे आगे भी उसकी रक्षा करेंगे ॥ ”79 ॥ प्रतापरुद्रका अपने गुरु श्रीमिश्रके घरमें आगमन :- एत बलि' काशीमिश्र गेला स्व-मन्दिरे। मध्याह्ने प्रतापरुद्र आइला ताँर घरे ॥ 80 ॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीकाशीमिश्र अपने मन्दिरमें चले गये। मध्याह्नके समय राजा प्रतापरुद्र उनके घरपर आये ॥ 80 ॥ राजाका गुरुसेवाका नियम :- प्रतापरुद्रेर एक आछये नियमे। यत दिन रहे तँह श्रीपुरुषोत्तमे ॥ 81 ॥ नित्य आसि' करे मिश्रेर पाद-सम्वाहन। जगन्नाथ-सेवार करे भियान श्रवण ॥ 82 ॥ अनुवाद-राजा प्रतापरुद्रका एक नियम था कि जब तक वे श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्रमें रहते, तब तक वे प्रतिदिन श्रीकाशीमिश्रके वासस्थानपर आकर उनके चरणोंको दबाते थे और भगवान् श्रीजगन्नाथकी किस प्रकारसे भव्य सेवा होती है, इस विषयमें उनसे श्रवण करते थे ॥ 81-82 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'भियान',-परिपाटी अभिनय ॥ 82 ॥ राजा मिश्रेर चरण यबे चापिते लागिला। तबे मिश्र ताँरे किछु भङ्गीते कहिला ॥ 83 ॥