भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2269, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2269

252 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 9/7-13 ] अनुवाद—त्रिभुवनके लोग आकर महाप्रभुके दर्शन करते और जो कोई भी उनके दर्शन करता, उसको कृष्णप्रेमधनकी प्राप्ति हो जाती॥7॥ मनुष्यके वेषमें अनन्त ब्रह्माण्डवासियोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- मनुष्येर वेशे आसि' गन्धर्व-किन्नर। सप्तपातालेर यत दैत्य विषधर॥8॥ अनुवाद—सात उच्च लोकोंसे गन्धर्व-किन्नर आदि और पातालादि सात निम्न लोकोंसे दैत्य तथा नाग आदि मनुष्यके वेशमें आकर महाप्रभुका दर्शन करते॥8॥ अनुभाष्य—'विषधर',—नागलोक॥8॥ सप्तद्वीपे नवखण्डे वैसे यत जन। नाना-वेशे आसि' करे प्रभुर दरशन॥9॥ अनुवाद—सात द्वीपों और नौ खण्डोंमें रहनेवाले लोग भी विविध वेश धारण करके महाप्रभुके दर्शन करने आते॥9॥ अनुभाष्य—अन्त्यलीला 2/10 संख्या देखें॥9॥ वैष्णवोंके द्वारा महाप्रभुका दर्शन :- प्रह्लाद, बलि, व्यास, शुक आदि मुनिगण। आसि' प्रभु देखि' प्रेमे हय अचेतन॥10॥ अनुवाद—श्रीप्रह्लाद महाराज, श्रीबलि महाराज, श्रीव्यासदेव, श्रीशुकदेव गोस्वामी आदि मुनिगण आकर महाप्रभुके दर्शन करते और प्रेममें मूर्च्छित होकर गिर पड़ते॥10॥ अनुभाष्य—'प्रह्लाद',—किसी-किसी ऐतिहासिक-मतमें ये त्रेतायुगमें पंजाब प्रदेशकी राजधानी मुलतानमें कश्यपवंशीय राजा हिरण्यकशिपुके वैष्णव-पुत्रके रूपमें आविर्भूत हुए थे। पिता हिरण्यकशिपुके विष्णु-विद्वेषके फलसे पुत्र प्रह्लादको अनेक प्रकारके कष्ट सहन करने पड़े थे, बादमें भगवान् श्रीनृसिंहदेवने आविर्भूत होकर वैष्णव-विद्वेषी असुर सम्राट्का वध किया था। 'बलि',—प्रह्लादके पुत्र विरोचनके पुत्र ही बलि हैं; भगवान्ने वामनके रूपमें अवतीर्ण होकर तीन पग भूमिकी प्रार्थनाके छलसे आत्मसमर्पण करनेवाले बलिपर कृपा की थी। इनके सौ पुत्रोंमें-से बाण सबसे बड़े थे। 'व्यास',—पाराशरके पुत्र, सात्यवतेय [सत्यवतीके पुत्र] अथवा कृष्ण-द्वैपायन बादरायण-मुनि; ये वेदोंका विभाग करके 'वेदव्यास'के नामसे कहलाये और इन्होंने अठारह महापुराण एवं ब्रह्मसूत्र और उसके भाष्य श्रीमद्भागवत ग्रन्थका प्रणयन किया; ये ब्रह्म-सम्प्रदायके अन्तर्गत श्रीनारद ऋषिके शिष्य थे। 'शुक',—व्यासके पुत्र, पहले आकुमार ब्रह्मज्ञानी और नैष्ठिक ब्रह्मचारीकी लीला दिखलाकर इन्होंने एकान्तिक रूपसे कृष्णकी 'कीर्तनाख्या' भक्तिका आश्रय ग्रहण किया॥10॥ गृहके भीतर बैठे हुए महाप्रभुके दर्शनार्थियोंका बाहरमें कोलाहल, महाप्रभुके द्वारा दर्शन देना, सभीको कृष्णकथा-कीर्तन करनेका आदेश :- बाहिरे फुकारे लोक, दर्शन ना पाञा। “कृष्ण कह” बलेन प्रभु बाहिरे आसिया॥11॥ अनुवाद—दर्शनार्थी भक्त उनके दर्शन नहीं पाकर उनके वासस्थानके बाहर कोलाहल करते। तब महाप्रभु बाहर आकर उन्हें कहते,—“कृष्ण बोलो॥”11॥ महाप्रभुके दर्शनोंसे सभीमें कृष्णप्रेम :- प्रभुर दर्शने सब लोक प्रेमे भासे। एइमत याय प्रभुर रात्रि-दिवसे॥12॥ अनुवाद—महाप्रभुके दर्शन करके समस्त लोग प्रेममें निमग्न हो जाते। इसी प्रकार महाप्रभुके रात-दिन व्यतीत होते॥12॥ महाप्रभुको राजा प्रतापरुद्रके पुत्रके द्वारा श्रीभवानन्दके पुत्र गोपीनाथको मृत्यु-दण्डके विषयमें बतलाना :- एकदिन लोक आसि' प्रभुरे निवेदिल। “गोपीनाथेरे 'बड़ जाना' चाङ्गे चढ़ाइल॥13॥

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